Sunday, March 8, 2020

।। न्याय दर्शन ।। [प्रमाणप्रकरणम्]


प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥१.१.३॥
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥१.१.४॥
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववत्शेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥१.१.५॥
प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनमुपमानम् ॥१.१.६॥
आप्तोपदेशः शब्दः ॥१.१.७॥
सः द्विविधः दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥१.१.८।।

सूत्रार्थ - प्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दा : = प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द, प्रमाणानि = यह चारों प्रमाण कहे गये हैं । इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नम् = इन्द्रिय और उसके विषय के संयोग से उत्पन्न होने वाला, ज्ञानम् = ज्ञान, अव्यपदेश्यम् = न कहा गया, अव्यभिचारि = व्यभिचार दोष से रहित और, व्यवसायात्मकम् = संदेह से रहित होने के कारण, प्रत्यक्षम् प्रत्यक्ष सिद्ध प्रमाण है । तत्पूर्वकम् लक्षण के द्वारा पदार्थ का जो ज्ञान होता है, वह, अनुमानम् = अनुमान है, च = और वह अनुमान, पूर्ववत् = कारण से कार्य का तथा, शेषवत् कार्य से कारण का प्रयोजन होने से, सामान्यतोदृष्टम् = सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहा गया है । यह अनुमान, त्रिविधम् = तीन प्रकार का है । प्रसिद्ध साधात प्रसिद्ध पदार्थों के समान धर्म से, साध्यसाधनम् = साध्य के साधन को, उपमानम् = उपमान प्रमाण कहा गया है । आप्तोपदेशः = आप्त पुरुषों का उपदेश, शब्दः = शब्द प्रमाण समझना चाहिये । दृष्टादृष्टार्थत्वात् = दृष्ट और अदृष्ट के भेद से , सः = वह , द्विविधः = दो प्रकार का माना जाता है ।

व्याख्या - प्रमाण के चार भेद हैं - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द । जब किसी पदार्थ को सिद्ध करना होता है, तब इन चार प्रकारों से ही उस पदार्थ का ज्ञान हो सकता है । इन्द्रिय और उसके विषय से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह प्रत्यक्ष दिखाई देता है । जैसे अमुक व्यक्ति चल रहा है, अमुक व्यक्ति भोजन कर रहा है । जब नेत्र इन विषयों को प्रत्यक्ष देखता है, तब उसमें सन्देह का प्रश्न ही नहीं उठता । नेत्र जिस दृश्य को होते हुए प्रत्यक्ष देख रहा है, वह पहिले से कहा गया भी नहीं होता और प्रत्यक्ष घटित होने से वह ज्यों का त्यों दिखाई देगा, इसलिये उसके घटने - बढ़ने का दोष भी नहीं होता । इसीलिए जो प्रत्यक्ष है, वह प्रमाण सर्वोपरि और अकाट्य माना जाता है । लक्षण को देखकर जिस किसी वस्तु का ज्ञान होता है उसे अनुमान कहते हैं । जैसे सींग, पूछ के अन्त में बाल, चार पांव, कंधा उठा हुआ और कण्ठ के नीचे मांस लटकता हुआ होने से गौ का अनुमान होता है । ऐसे पशु को देखते ही सामान्य रूप से सभी लोग उसे गाय समझ लेते हैं, इसलिए इसे सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहा गया है । जहाँ कारण को देखकर कार्य का अनुमान हो अर्थात् आम के वृक्ष को देखकर यह अनुमान किया जाय कि इस पर तो फल लगेंगे, वे आम के ही होंगे - यह पूर्ववत् अनुमान है तथा कार्य को देखकर कारण का अनुमान हो, जैसे पुत्र है तो पिता अवश्य होगा - ऐसा अनुमान शेषवत् कहा गया है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि अनुमान प्रमाण के जो तीन भेद न्याय में कहे गये हैं वे उचित हैं । किसी पदार्थ में प्रसिद्ध पदार्थ के से लक्षण हों और उसकी पहिचान उस प्रसिद्ध पदार्थ का नाम लेकर कह देने मात्र से हो जाय, उसे उपमान प्रमाण कहा जायगा। जैसे किसी नील गाय को देख कर कह दें कि यह गौ के समान है अयवा नील गाय को गाय के समान देखकर यह समझ लें कि नील गाय होगी तो ऐसा अनुमान उपमान प्रमाण कहा जाता है । आप्त पुरुष उन्हें कहते हैं जो सदाचारी, ज्ञानी, विद्वान और मोक्ष की कामना वाले तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हों । ऐसे व्यक्ति कभी मिथ्या भाषण नहीं करते और योग आदि के साधनों में लगे रहने से उन्हें जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसके द्वारा वे सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्वों को जानने में भी पूर्ण समर्थ होते हैं । वे अपने योगबल से अप्राप्त विषयों का भी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । ऐसे पुरुष जो बात कहें, उसे प्रामाणिक माना जाता है । इसीलिये सूत्रकार ने आप्तजनों के उपदेश को ' शब्द प्रमाण ' कहा है । आप्त शब्द के भी दो भेद हैं - दृष्ट और अदृष्ट । जो विषय प्रत्यक्ष दिखाई देता हो, उसके संबन्ध में कहा गया शब्द ' दृष्ट ' कहा जाता है तथा जिस विषय को अनुमान से बताया गया हो, उसे अदृष्ट शब्द कहा गया है । जैसे कोई कहे कि "पुत्र की कामना वाला पुरुष यज्ञ करें' इसमें यज्ञ करने से उसके फल रूप पुत्र का उत्पन्न होना नेत्र से प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेगा । परन्तु, यदि कहा जाय कि 'स्वर्ग की कामना वाला पुरुष यज्ञ करें' यो यज्ञ द्वारा स्वर्ग की प्राप्ति का देखा जाना इस शरीर से सम्भव नहीं है । इसलिये इसे अदृष्ट शब्द कहा गया है ।
*विशेष- प्रमाण को परिभाषित करते हुये वात्स्यायन लिखते है, "प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तो" अर्थात प्रमाण से अर्थ की प्रतीति होती है। अर्थ को परिभाषित करते हुये वात्स्यायन पुनः लिखते है, "अर्थस्तु –सुखं सुखहेतुश्च , दुःखं दुःखहेतुश्च" अर्थात जो सुख, सुख का हेतु और दुःख, दुःख का हेतु है वह अर्थ है।" आगे वात्स्यायन जी कहते है की प्रमाण सप्रयोजन होता है उसमें प्रवृत्ति सामर्थ्य होनी चाहिए अर्थात “प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत्प्रमाणम्”। इस सप्रयोजन प्रमाण में प्रमाता, प्रमेय और प्रमिति- ये तीनों मिलकर होते है, क्योंकि इनमे से किसी एक के न होने पर अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । प्रमाता को परिभाषित करते हुये वात्स्यायन जी लिखते है, “तत्र यस्येप्साजिहासाप्रयुक्तस्य प्रवृत्तिः स प्रमाता” अर्थात जिस पुरुष की ईप्सा या जिहासा को लेकर प्रवृत्ति होती है, वह प्रमाता कहलाता है । इसी प्रकार प्रमेय के विषय लिखा है, “योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्” अर्थात जो अर्थ समझा जाता है वह प्रमेय है । आगे प्रमिति के विषय में कहते है, “यदर्थविज्ञानं सा प्रमितिः” अर्थात यथार्थ ज्ञान ही प्रमिति है । इस प्रकार प्रमाण को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है, “जिस साधन के द्वारा प्रमाता प्रमेय की प्रमिति प्राप्त करता है वह प्रमाण कहलाता है।“
महर्षि गौतम ने अपने न्याय-सूत्र में चार प्रमाण कहे है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ।
१. प्रत्यक्ष - जो ज्ञान इन्द्रियों और पदार्थ के संनिकर्ष से उत्पन्न होता है । तथा भ्रम से रहित ( अव्यभिचारी ) होकर नाम लेने योग्य (व्यपदेश्य) न हो तथा निश्चयात्मक हो । जब हम आँखों से घट का ज्ञान प्राप्त करते हैं तब यह शुद्ध ज्ञान है; ज्ञान के समय घट शब्द का कोई प्रयोजन नहीं क्योंकि ज्ञान अशाब्द अर्थात् निविकल्पक है । दूसरे, प्रत्यक्ष ज्ञान निश्चयात्मक होता है, दूर से देखकर किसी पदार्थ को धूम या धूल मानने की भूल होने पर उसे प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं कहेंगे । कुछ निश्चय होने पर ही उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कह सकते हैं । वात्स्यायन इन्द्रियों के साथ वस्तु के सन्निकर्ष का तथ्य निरूपित करते हए कहते हैं कि आत्मा का संबन्ध मन से होता है, मन का इन्द्रियों से और इन्द्रियों का वस्तुओं से । तभी प्रत्यक्ष होता है । किन्तु यह प्रक्रिया कारण का अवधारण ( Determination ) करना है - विशिष्ट कारण तो इन्द्रिय - विषय - संयोग ही है । प्रत्यक्ष में छह प्रकार के संनिकर्ष हुआ करते हैं । चूंकि प्रत्यक्ष का साधन इन्द्रिय है इसलिए इन्द्रिय को ही प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं । निविकल्पक और सविकल्पक के भेद से प्रत्यक्ष दो प्रकार का है । निविकल्पक में प्रकार या विशेषण का ज्ञान नहीं रहता है जैसे- यह कुछ है । सविकल्पक में प्रकार का ज्ञान हो जाता है जेसे- यह श्याम है ।
२. अनुमान - लिङ्ग ( Middle term ) का परामर्श होना अनुमान है । व्याप्ति की सहायता से वस्तु का बोध कराने वाले को लिंग या हेतु कहते हैं जैसे धूम अग्नि का लिग है । व्याप्ति का अर्थ साहचर्य-नियम ( Universal relation ) है जैसे; जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ - वहाँ अग्नि भी है । जब व्याप्ति से विशिष्ट लिंग का ज्ञान पक्ष ( Minor term )जैसे; पर्वत में उत्पन्न होता है उसे ही लिंग का परामर्श कहते हैं । तर्कसंग्रह में परामर्श के विषय में कहा गया है कि व्याप्ति से विशिष्ट पक्षधर्मता का ज्ञान ही परामर्श है । उदाहरण के लिए, 'अग्नि के द्वारा व्याप्य धूम से युक्त' यह पर्वत है । ऐसा ज्ञान परामर्श है । इस परामर्श से 'पर्वत भी अग्निमान है' यह ज्ञान (निष्कर्ष या निगमन) उत्पन्न हुआ, यही अनुमिति है । नीचे लिखे रूप में इसे स्पष्टतर किया जा सकता है
(१) यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र अमिः (व्याप्ति या Major premise)
(२) पर्वतो धूमवान् (पक्षधर्मता या Minor premise)
(३) पर्वतोऽग्निमान् (अनुमिति या Conclusion)
इस अनुमिति तक पहुंचने का जो साधन ( करण, असाधारण कारण ) हो वही अनुमान है । न्यायदर्शन में अनुमान के तीन भेद किये गये हैं - पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट । जहाँ कारण को देखकर कार्य का अनुमान हो, वह पूर्ववत् है । जैसे मेघों को आकाश में घिरते देखकर वृष्टि होने का अनुमान । जब कार्य को देखकर कारण का अनुमान हो, वह शेषवत् है जैसे चारों ओर पानी ही पानी देखकर 'वर्षा हुई है' इसका अनुमान । सामान्य रूप से अनुमान करना कि जिस वस्तु को एक जगह देखा था, दूसरी जगह पर है तो वह वस्तु अवश्य चलती होगी । इस आधार पर अप्रत्यक्ष होने पर भी सूर्य की गति का अनुमान कर लेते हैं । दूसरे अंग से भी इनका विवेचन होता है जैसा कि वात्स्यायन ने किया है । नव्य नैयायिक अनुमान के दो भेद करते हैं - स्वार्थ और परार्थ । स्वार्थ का अभिप्राय है जो एक व्यक्ति को अपने आप में संतुष्ट कर सके, अनुमिति करा सके । जब कोई व्यक्ति स्वयं ही बार-बार रसोईघर, कल-कारखाने आदि में देखकर व्याप्ति ग्रहण कर लेता है कि 'जहाँ धूम है वहाँ अग्नि है', तब पर्वत के पास जाकर वहाँ की अग्नि के विषय में सन्देह होने पर, पर्वत में धूम देखकर व्याप्ति का स्मरण करता है कि जहाँ धूम है वहाँ अग्नि होती है । तब यह ज्ञान ( लिंग - परामर्श ) उत्पन्न होता है कि अग्नि के द्वारा व्याप्य धूम से युक्त ( वह्नि व्याप्यधूमवान् ) यह पर्वत है । अन्त में यह ज्ञान होता है कि पर्वत अग्नि से युक्त हैं । यही स्वार्थानुमान है । जब स्वयं धूम से अग्नि का अनुमान करके दूसरों को समझाने के लिए पांच अवयव - वाक्यों ( Members ) का प्रयोग किया जाय तो उसे परार्थानुमान कहते हैं ।
(३) उपमान - जब सादृश्य ( अतिदेश ) का बोध कराने वाले वाक्य का स्मरण करके सदृश वस्तु का ज्ञान होता है उसे ही उपमान कहते हैं । न्यायसूत्र में कहा है कि प्रसिद्ध वस्तु के साधर्म्य से ज्ञेय वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना उपमान है । जैसे कोई आदमी 'गवय' नामक जंगली जीव को नहीं जानता किन्तु जब एक अतिदेश ( सादृश्य ) वाक्य सुनता है कि गवय गौ के समान होता है, तभी उसे गवय को पहचानने में देर नहीं लगती। उपमिति-ज्ञान होता है कि यही गवय है ।
(४) शब्द - यथार्थवक्ता ( आप्त ) के द्वारा उच्चरित वाक्य ही शब्द है जैसे वेद के वाक्य या भूगोल में कहे गये वाक्य । न्यायसूत्र में शब्द के दो भेद किये गये हैं दृष्टार्थ शब्द और अदृष्टार्थ शब्द । जब आप्तवाक्य की संगति इस संसार के तथ्यों से बैठाई जा सके जैसे यह कहना कि साईबेरिया में बर्फ जमी हुई रहती है । तब उसे दृष्टार्थ कहते हैं । किन्तु आप्तवाक्यों से परलोक की बातों का ज्ञान होने पर उसे अदृष्टार्थ शब्द कहते हैं । इस प्रकार लौकिक वाक्यों और ऋषि के वाक्यों में भेद किया जा सकता है । इसे ही लौकिक और वैदिक भी कहते हैं ।
इस प्रकार प्रमाणों से ही प्रमेयों का ज्ञान तथा परीक्षण होता है । न्याय में प्रमाण शास्त्र ( Epistemology ) पर बहुत अधिक जोर दिया गया है । नव्यन्याय तो विशुद्ध प्रमाणशास्त्र ही है । प्रमाणों के विषय में जितना विश्लेषण भारतीय दर्शन में हुआ है विश्व के किसी भी दर्शन में मिलना असम्भव है - न्याय का तो यह विषय ही है । अन्य दर्शन इस दृष्टि से न्याय के ऋणी हैं । अपने विषयों के प्रतिपादन के लिए न्याय के कितने ही शब्द अन्य दर्शनकारों ने लिये हैं । इस दृष्टि से यदि न्याय - दर्शन को ' दर्शनों का दर्शन ' कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी ।

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