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।। न्याय दर्शन ।। [अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्]


।। अथ प्रथमः अध्यायः ।।
[अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्]
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात्निःश्रेयसाधिगमः ॥१.१.१॥
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायातपवर्गः ॥१.१.२॥

सूत्रार्थ - प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह और स्थान इनके, तत्वज्ञानात् तत्वज्ञान के होने से, निःश्रेयस = मोक्ष की, अधिगमः = प्राप्ति होती है । दुःख जन्मप्रवृत्तिदोपमिथ्याज्ञानानाम् = दुःख, जन्म, प्रवृत्ति दोष और मिथ्या ज्ञान, में, उत्तरोत्तरापाये एक के पश्चात् दूसरे से छुटकारा पाने पर, तदन्तरापायात् = उसमें अन्तर की प्राप्ति से, अपवर्गः = मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

व्याख्या - प्रमेय, संशय आदि सोलह प्रकार के प्रमाण कहे गये हैं । न्याय में यही सोलह पदार्य माने जाते हैं । जिस साधन से प्रमाता विषय को प्राप्त करता है, उस साधन को प्रमाण और ग्रहण किये जाने चाले विषय को प्रमेय कहते हैं । इन सबके तत्व को भले प्रकार जान लेने से मोक्ष की प्राप्ति सुलभ हो जाती है । तत्व ज्ञान के प्राप्त होने से मिथ्या ज्ञान दूर हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के मिटने पर राग - द्वेष आदि का नाश होता है, जब राग - द्वेष नष्ट हो जाते हैं तब विषयों की प्रवृत्ति भी रुक जाती है और प्रवृत्ति के नष्ट होने पर तो मनुष्य की कर्म से भी निवृत्ति हो जाती है । कर्म नहीं होता तो प्रारब्ध नहीं बनता और प्रारब्ध के न बनने से जन्म मरण भी नहीं होता । जन्म - मरण ही सुख - दुःख रूप है, जब सुख - दुःख नहीं तो मोक्ष सिद्ध हो गया । इस प्रकार सुख - दुःख का अत्यन्त अभाव हो जाने को ही मोक्ष की प्राप्ति समझना चाहिए 

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