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Showing posts from April, 2020

स्वप्रेरण गुणांक का विमीय सूत्र

परिभाषा जब किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित की जा रही हो और उसका मान समय के साथ बदल रहा हो तो उसी कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है ऐसे स्वप्रेरण कहते हैं। लेंज के नियम के अनुसार उत्पन्न हुई प्रेरित धारा अपने उत्पन्न होने के कारण का विरोध करती है अर्थात धारा के परिवर्तन का विरोध करती है।   उत्पन्न हुई प्रेरित धारा मुख्यधारा के विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है जिससे इसका मान नहीं बढ़ सके। स्वप्रेरण पर मुख्यधारा का मान निर्भर नहीं करता यहां पर मुख्यधारा के मान में परिवर्तन पर प्रेरित धारा का मान निर्भर करता है की धारा में परिवर्तन कितना हुआ उसी पर प्रेरित धारा की तीव्रता निर्भर करेगी। कुंडली में प्रवाहित की जा रही विद्युत धारा के कारण कुंडली के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र पैदा हो जाता है जिससे कुंडली में से चुंबकीय बल रेखाएं या चुंबकीय फ्लक्स गुजरने लगता है यह चुंबकीय फ्लक्स कुंडली में प्रवाहित की गई धारा के समानुपाती होता है। यदि प्रवाहित की गई धारा I हो और चुम्बकीय फ्लक्स   ϕ   हो तब   ϕ  = LI हेनरी।   यह L एक स्थिरांक है इसे स्वप्रेरण गुणांक ...

विशिष्ठ प्रतिरोध का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी पदार्थ की प्रतिरोधकता उस पदार्थ का वह गुण है, जो यह दर्शाता है कि वह कितनी तीव्रता के साथ धारा का प्रतिरोध करेगा। प्रतिरोधकता चालक के पदार्थ पर निर्भर करता है, जिस करना इसे चालक का विशिष्ठ प्रतिरोध भी कहते है। इसे  ρ  से प्रदर्शित करते है। इसका मात्रक ओम-मीटर होता है। यदि किसी चालक का प्रतिरोध R, चालक की लम्बाई l तथा चालक के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A हो तो चालक का विशिष्ठ प्रतिरोध ρ  = RA/l ओम-मीटर विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

प्रतिरोध का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी प्रतिरोधक के सिरों के बीच विभवान्तर तथा उससे प्रवाहित विद्युत धारा के अनुपात को उसका विद्युत प्रतिरोध कहते हैं।इसे R से प्रदर्शित करते है। इसको मात्रक ℧ ओह्म में मापा जाता है। यदि किसी चालक के सिरों के बीच विभवान्तर V तथा उसमें प्रवाहित धारा I हो तो चालक का प्रतिरोध R = V/I ओह्म विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

परावैद्युतांक नियतांक का विमीय सूत्र

परिभाषा उन कुचालक पदार्थों को परावैद्युत कहते हैं जिनके अन्दर विद्युत क्षेत्र पैदा करने पर या जिन्हें विद्युत क्षेत्र में रखने पर वे ध्रुवित हो जाते हैं। कुचालक से आशय उन सभी पदार्थों से है जिनकी प्रतिरोधकता अधिक या विद्युत चालकता कम होती है किन्तु परावैद्युत पदार्थ वे हैं जो कुचालक होने के साथ-साथ पर्याप्त मात्रा में ध्रुवण का गुण भी प्रदर्शित करते हैं। किसी पदार्थ के ध्रुवण की मात्रा को उसके परावैद्युत स्थिरांक अर्थात परावैद्युतांक से मापा जाता है। परावैद्युत पदार्थों का एक प्रमुख उपयोग संधारित्र की प्लेटों के बीच में किया जाता है ताकि समान आकार में अधिक धारिता मिले। पॉलीप्रोपीलीन एक परावैद्युत पदार्थ है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना किसी पदार्थ का परावैद्युतांक एक आनुपातिक राशि है, जिसका मान उस पदार्थ की वैद्युतशीलता पर निर्भर करता है। इसे K से प्रदर्शित करते है। इसका भौतिक रूप K =  ε/ ε 0 जहाँ  ε  = माध्यम की विद्युतशीलता तथा  ε 0  = निर्वात की विद्युतशीलता चूँकि यह एक ही प्रकार की भौतिक राशि का आनुपातिक मान होता है अतः इसकी कोई विमा नहीं होगी। ...

निर्वात की विद्युतशीलता का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी पदार्थ की विद्युतशीलता पदार्थ का वह गुण है जो उस पदार्थ में विद्युत क्षेत्र उत्पन्न किये जाने पर उस पदार्थ द्वारा प्रदर्शित 'विरोध' की माप बताता है। इसे  ε 0 से प्रदर्शित करते है। इसका प्रयोग सर्वप्रथम कूलॉम ने अपने नियम में किया था, जिसके अनुसार, निर्वात में दो आवेशों के बीच लगने वाला आवेशित बल विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

विद्युत विभव का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी ईकाई धनावेश को अनन्त से किसी बिन्दु तक लाने में जितना कार्य करना पड़ता है उसे उस बिन्दु का विद्युत विभव कहते हैं। अतः V = W/q जूल/कूलॉम दूसरे शब्दों में, किसी बिन्दु पर स्थित ईकाई बिन्दुवत धनावेश में संग्रहित वैद्युत स्थितिज ऊर्जा, उस बिन्दु के विद्युत विभव के बराबर होती है। विद्युत विभव को V के द्वारा दर्शाया जाता है। इसकी अन्तर्राष्ट्रीय इकाई वोल्ट है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

विद्युत धारिता का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी चालक की वैद्युत धारिता, उस चालक की वैद्युत आवेश का संग्रहण करने की क्षमता की माप होती है। जब किसी चालक को आवेश दिया जाता है तो उसका वैद्युत विभव आवेश के अनुपात में बढता जाता है। यदि किसी चालक को q आवेश देने पर उसके विभव में V वृद्धि हो, तो, q α V या q = CV जहाँ C एक नियतांक है जिसका मान चालक के आकार, समीपवर्ती माध्यम तथा पास में अन्य चालकोँ की उपस्थिति पर निर्भर करता है। इस नियतांक को 'वैद्युत धारिता' कहते हैँ। अतः ऊपर के समीकरण से C = q / V, इसका मात्रक कूलॉम/वॉल्ट होता है जिसे फैरड़ कहते है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

विद्युत धारा का विमीय सूत्र

परिभाषा आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं। ठोस चालकों में आवेश का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानान्तरण के कारण होता है, जबकि द्रवों जैसे- अम्लों, क्षारों व लवणों के जलीय विलयनों तथा गैसों में यह प्रवाह आयनों की गति के कारण होता है। साधारणः विद्युत धारा की दिशा धन आवेश के गति की दिशा की ओर तथा ॠण अवेश के गति की विपरीत दिशा में मानी जाती है। ठोस चालकों में विद्युत धारा की दिशा, इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की दिशा के विपरीत मानी जाती है। एस. आई. पद्धति में विद्युत धारा का मात्रक एम्पियर होता है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना विद्युत मूलभूत भौतिक राशि है, जिसका मान प्रति सेकण्ड किसी चालक से गुजरने वाले अनुप्रस्थ क्षेत्रफल पर आवेश के बराबर होता है, अतः धारा की इस परिभाषा से, i = q/t चूँकि धारा एक मूलभूत भौतिक राशि है अतः इसकी विमा कोई प्रतीक होगा। अतः i का विमीय सूत्र =[A]

विद्युत आवेश का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी पदार्थ का वह गुण जिसके कारण उसमें विद्युत तथा चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न होते हैं विद्युत आवेश कहलाता है इसे q से प्रदर्शित करते हैं। यह एक अदिश राशि है, जिसका मात्रक कूलॉम होता है। किसी आवेशित पदार्थ में आवेश की मात्रा q = ne कूलॉम होती है, जहाँ n पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा e = इलेक्ट्रॉन पर आवेश होता है जिसका आंकिक मान आवेश दो प्रकार का होता है- धनात्मक आवेश ( Positive Charge ) ऋणात्मक आवेश ( Negative Charge ) काँच की छड़ अथवा बिल्ली के समूर पर आवेश धनात्मक कहलाता है तथा प्लास्टिक-छड़ अथवा रेशम पर आवेश ऋणात्मक कहलाता है। जब किसी वस्तु पर कोई आवेश होता है तो वह वस्तु विद्युन्मय अथवा आवेशित (आविष्ट) कही जाती है। जब उस पर कोई आवेश नहीं होता तब उसे अनावेशित कहते हैं। विमीय-सूत्र ज्ञात करना  विद्युत मूलभूत भौतिक राशि है, जिसका मान प्रति सेकण्ड किसी चालक से गुजरने वाले अनुप्रस्थ क्षेत्रफल पर आवेश के बराबर होता है, अतः धारा की इस परिभाषा से, q = it q का विमीय सूत्र = it का विमीय सूत्र

वाण्डर वाल्स् नियतांक{a, b} का विमीय सूत्र

परिभाषा वान डर वाल्स समीकरण, गैसों के अवस्था का समीकरण है जिसे वान डर वाल्स ने 1877 में प्रस्तुत किया था। वास्तविक गैसें, आदर्श गैस समीकरण का ठीक से पालन नहीं करतीं, जबकि वान डर वाल्स का समीकरण काफी सीमा तक वास्तविक गैसों के व्यवहार का ठीक से वर्णन करता है। इसका भौतिक समीकरण जहाँ R सार्वत्रिक गैस नियतांक है, T गैस का ताप है, P दाब है तथा V आयतन तथा a और b वान डर वाल्स गैस नियतांक है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक का विमीय सूत्र

परिभाषा यह संकल्पना कहती है कि गति का ऊष्मा में और ऊष्मा का गति में परिवर्तन किया जा सकता है तथा प्रत्येक स्थिति में समान मात्रा के कार्य के द्वारा समान मात्रा की ऊष्मा उत्पन्न होगी परन्तु शर्त केवल यह होगी कि किया गया कार्य पूर्णतः ऊष्मा में बदल जाय। इस संकल्पना के परिणामस्वरूप ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त विकसित हुआ और उसे स्वीकृति मिली। इसी के परिणामस्वरूप ऊष्मागतिकी के विज्ञान की स्थापना हुई और एक नवीन शाखा के रूप में यह विकसित हुआ। सन् 1850 में अंग्रेज भौतिकशास्त्री जेम्स प्रेस्कॉट जूल ने एक प्रसिद्ध प्रयोग किया जिससे पहली बार ऊष्मा के यांत्रिक तुल्यांक का मान प्राप्त हुआ। जूल द्वारा प्राप्त मान 4.18 जूल प्रति कैलरी था जो उस समय के लिये अति परिशुद्ध मान माना जा सकता है। बाद में अधिक जटिल विद्युतचुम्बकीय प्रयोगों से और भी अधिक परिशुद्ध मान प्राप्त किया गया जो 4.1855 जूल प्रति कैलरी है। इसे j से प्रदर्शित करते है, इसका भौतिक सूत्र, j = W/Q जूल/कैलोरी यह वह उपकरण है जिससे जूल ने यह प्रयोग सिद्ध किया था।  विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

रेखीय प्रसार गुणांक का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी पदार्थ की एकांक लम्बाई की छड का ताप 1°C बढ़ाने पर छड की लम्बाई मे होने वाली वृद्धि को उस पदार्थ का रेखीय प्रसार गुणांक अथवा दैर्ध्य प्रसार गुणां अल्फा कहते है। इसका मात्रक प्रति°C है। माना किसी वस्तु की प्रारम्भिक लम्बाई  l  है, यदि ΔT ताप परिवर्तन करने से इसकी लम्बाई में Δ l  वृद्धि हो जाती है तो, रेखाय प्रसार गुणांक = लम्बाई में वृद्धि / मूल लम्बाई × ताप वृद्धि अर्थात            α =Δ l / l ΔT विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

प्लांक नियतांक का विमीय सूत्र

परिभाषा प्लांक के अनुसार विकिरण का उत्सर्जन अथवा अवशोषण सतत न होकर निश्चित ऊर्जा के बंडलों या पेकिटो के रूप में होता है। जिसे फोटोन कहते है। प्रत्येक फोटोन में निश्चित संवगे निहित होता है, जिसका मान विकिरण की आवृति के समानुपती होता है। यदि विकिरण की आवृति v है तो प्रत्येक फोटोन से सम्बन्धित ऊर्जा E=hv तथा संवेग P=hv/c जहाँ विमीय-सूत्र ज्ञात करना

वीन नियतांक का विमीय सूत्र

परिभाषा वीन विस्थापन नियम के अनुसार, किसी कृष्णिका से उत्सर्जित विकिरण की अधिकतम तरंगधैर्ध्य 𝜆max कृष्णिका के परम ताप T के व्युत्क्रमनुपाती होती है। अर्थात या विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

स्टीफन नियतांक का विमीय सूत्र

परिभाषा स्टीफन के विकिरण सम्बन्धी नियम से इकाई समय में सभी तरंगदैर्घ्य परास में कृष्णिका द्वारा प्रति इकाई पृष्ठिय क्षेत्रफल द्वारा विकरित कुल ऊर्जा j कृष्णिका के ऊष्मगतिकीय ताप T के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती होता है। अतः या अनुक्रमानुपाती नियतांक σ को स्टीफन स्थिरांक अथवा स्टीफन नियतांक कहा जाता है जिसे अन्य ज्ञात मूलभूत भौतिक नियतांकों से व्युत्पन किया जाता है। इसका अंकिक मान निम्न होता है- विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

ऊष्मा चालकता गुणांक का विमीय सूत्र

परिभाषा भौतिकी में, ऊष्मा चालकता पदार्थों का वह गुण है जो दिखाती है कि पदार्थ से होकर ऊष्मा आसानी से प्रवाहित हो सकती है या नहीं। ऊष्मा चालकता को k, λ, या κ से निरूपित करते हैं। जिन पदार्थों की ऊष्मा चालकता अधिक होती है उनसे होकर समान समय में अधिक ऊष्मा प्रवाहित होती है तथा जिन पदार्थों की ऊष्मा चालकता बहुत कम होती हैं उन्हें ऊष्मा का कुचालक कहा जाता है। ऊष्मा चालकता गुणांक का मात्रक जूल/मीटर-सेकण्ड-कैल्विन होता है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

अक्षर

अक्षर - क्षर धातु से अच् प्रत्यय करने पर क्षर शब्द बनता है। निषेधार्थक नञ् से संयुक्त होकर यह शब्द अक्षर कहलाता है। ‘न क्षरमिति अक्षरम्’ अर्थात् जो अपने स्वरूप से विचलित नहीं होता , उसे अक्षर कहते हैं। यह वर्ण के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है।  ‘अक्षर वर्ण निर्माणं वर्णमप्यक्षर विदुः’ ( वाच स्पत्यम् )।  बृहदारण्यक उपनिषद् ( ३ . ८ . ६ ) में कहा गया है — एतस्य अक्षरस्य प्रशासने मागि द्यावापृथिव्यो विधतेतिष्ठतः। आशय यह है कि इस अक्षर के प्रशासन में सूर्य और चन्द्रमा अपने-अपने पक्ष में स्थित रहते हैं। यहां पर यह शब्द परमात्मा के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। मुण्डकोपनिषद् ( १ . १ . ७ ) में इस अक्षर के द्वारा ही जगत की रचना का वर्णन है — ‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च , यथापृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथासतः पुरुषात्केशलोमानि , तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्। अर्थात् मकड़ी जैसे अपने शरीर के भीतर विद्यमान जाले को बाहर निकाल कर बुनती है और फिर निगल लेती है , पथ्वी जैसे विभिन्न प्रकार की औषधियां उत्पन्न करती है , मनुष्य से जैसे केश और लोम प्रकट होते हैं , वैसे ही इस अक्षर से विश्व प...

अंकन

अंकन - ईश्वर सेवा का भेद। पूर्णप्रज्ञ दर्शन के अनुसार जब ईश्वर के रूप के स्मरण के लिए उनके आयुध ( अस्त्र-शस्त्र ) आदि का चिह्न शरीर के किसी भाग पर अंकित कर दिया जाता है , तब उसे अंकन कहते हैं (सर्व० सं० , पृ० २६३)।

अकृतकर्मभोग

अकृतकर्मभोग  अकृतकर्मभोग का अर्थ है – “नहीं किये गये कर्मफल की प्राप्ति है”।  जब हम कहते हैं कि देवदत्त द्वारा किये गये कर्म का फल भोगता है- यज्ञदत्त, तो इसमें देवदत्त द्वारा किये गये कर्मफल का भोग यज्ञदत्त द्वारा करना ही अकृत कर्मभोग कहलाता है।

बोल्ट्जमेन नियतांक का विमीय सूत्र

परिभाषा बोल्ट्जमेन नियतांक (Boltzmann constant , kB or k), एक भौतिक नियतांक है। इसका नामकरण लुडविग बोल्ट्जमेन के नाम पर किया गया है। इसका मान गैस नियतांक R तथा आवोगाद्रो संख्या N A के अनुपात के बराबर होता है.। अतः k = R/NA विमीय-सूत्र ज्ञात करना

गैस नियतांक का विमीय सूत्र

सार्वत्रिक गैस नियतांक एक भौतिक नियतांक है जो विज्ञान के कई मूलभूत समीकरणों में सम्मिलित है- जैसे, आदर्श गैस समीकरण PV = nRT, इसे R से निरूपित करते हैं। अतः  सार्वत्रिक गैस नियतांक R = PV/nT, इसका मात्रक जुल/मोल-कैल्विन होता है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना-

गुप्त ऊष्मा का विमीय सूत्र

परिभाषा स्थिर तापमान पर किसी पदार्थ की सिर्फ अवस्‍था में परिवर्तन लाने के लिये आवश्‍यक उष्‍मा की मात्रा को हम पदार्थ की गुप्‍त उष्‍मा कहते हैं। इसे L से प्रदर्शित करते है तथा इसका मात्रक जूल प्रति किग्रा होता है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

ऊष्मा धारित का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी पदार्थ के द्रव्यमान का ताप एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की ऊष्मा धारिता (Heat capacity) कहते हैं। इसे C से प्रदर्शित करते है तथा इस भौतिक राशि का एस आई मात्रक जूल प्रति केल्विन (J/K) है। विमीय-सूत्र ज्ञात करना 

विशिष्ठ ऊष्मा का विमीय सूत्र

परिभाषा किसी 1 ग्राम वस्तु में 1° सेल्सियस ताप-परिवर्तन करनेवाली उष्मा को उसकी विशिष्ट उष्मा (स्पेसिफ़िक हीट) कहते हैं । इसे s के प्रदर्शित करते है इसका मात्रक जुल/किग्रा-केल्विन होता है । विमीय-सूत्र ज्ञात करना किसी वस्तु की विशिष्ट उष्मा s हो तो उसके m ग्राम का ताप Δt डिग्री सेल्सियस बढ़ाने में mSΔt कैलोरी ऊर्जा व्यय होती हैं।