अपने लक्ष्य को मेहनत से वरण करना ही प्रत्येक विद्यार्थी का एकमात्र ध्येय होना चाहिए - विकास विद्यालंकार
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Sunday, September 26, 2021
Monday, May 4, 2020
त्रुटियों का संयोजन Propagation of Errors
जब कोई भौतिक राशि दो या दो से अधिक भौतिक राशियों पर निर्भर करती है तो उस राशि की माप में त्रुटि मान ज्ञात करना त्रुटियों का संयोजन कहलाता है। जोड़, घटाव, गुणा भाग व घतीय गणनाओं के आधार पर त्रुटियों का संयोजन भी 5 प्रकार का होता है जो निम्न प्रकार है-
मापन में त्रुटि Errors of Measurement
मापन की सार्थकता मापन उपकरण के अल्पतमांक पर निर्भर करती है। जितना छोटा अल्पतमांक होगा उतना ही सार्थक मापन होगा। इसके अलावा हमारे बहुत प्रयासों के बावजूद मापन की प्रक्रिया में स्वयं से भी कुछ न कुछ त्रुटि भी अवश्य हो जाती है। इन त्रुटियों के कारण राशि के वास्तविक मान तथा प्रायोगिक मान में जो अन्तर प्राप्त होता है उसे मापन की त्रुटि कहते है। यह चार प्रकार की होती है-
परिमाण की कोटि Order of Magnitude
संख्याओं के वैज्ञानिक निरूपण में संख्याओं को 10 घातों के रूप में लिखा जाता है। 10 की घात का रूप ही परिमाण की कोटि कहलाती है। किसी राशि के परिमाण की कोटि लिखने के लिए निम्नलिखित नियम होते है-
- यदि 10 की घात के साथ गुणित संख्या 5 से छोटी है तो इसे छोड़ देते है।
- यदि 10 की घात के साथ गुणित संख्या 5 अथवा 5 से बढ़ी है तो उसे छोड़ने से पहले 10 की एक घात को बढ़ा देते है।
गणना में सार्थक अंक Significant Figures in Calculation
जोड़, घटाव, गुणा एवं भाग की गणना के बाद जो परिणाम प्राप्त होता है उसको सार्थक अंकों में लिखने के निम्नलिखित नियम होते है-
- राशियों को जोड़ने अथवा घटाने के बाद प्राप्त परिणाम में दशमलव के बाद केवल उतने ही अंक लेने चाहिए जितने कि जोड़ने अथवा घटाने वाली किसी राशि में दशमलव के बाद कम से कम होते है।
- दो मापी गई राशियों के गुणनफल अथवा भागफल में कुल उतने ही सार्थक अंक जितने कि कम से कम किसी दी गई राशि में है।
निश्चित सार्थक अंक Rounding Off Figures
किसी दी गई राशि को निश्चित सार्थक अंकों में व्यक्त करने के निम्नलिखित नियम होते है-
- यदि निश्चित सार्थक अंकों के बाद छोड़ी जाने वाली संख्या 5 से कम है तो उसके पूर्व की संख्या को अपरिवर्तित रहने देते है।
- यदि छोड़ी जाने वाली संख्या 5 से अधिक है तो उससे पूर्व की संख्या को एक बढ़ा देते है।
- यदि छोड़ी जाने वाली संख्या 5 है तथा उसके बाद कोई अशून्य संख्या आती है तो उसके पूर्व की संख्या को एक बढ़ा देते है।
- यदि छोड़ी जाने वाली संख्या 5 है तथा उसके बाद कोई शून्य आता है तो उसके पूर्व की संख्या को अपरिवर्तित रहने देते है यदि यह सम संख्या है।
- यदि छोड़ी जाने वाली संख्या 5 है तथा उसके बाद कोई शून्य आता है तो उसके पूर्व की संख्या को बढ़ा देते है यदि यह विषम संख्या है।
सार्थक अंक Significant Figures
किसी दी गई राशि के मापन में सार्थक अंकों की संख्या ज्ञात करते समय कुछ नियमों का पालन किया जाता है, जो कि निम्न प्रकार है-
- गणना में सभी अशून्य अंक सार्थक होते है।
- दो अशून्य अंकों के बीच आने वाला शून्य अंक सार्थक होता है।
- संख्या के बायीं ओर के शून्य कभी सार्थक नहीं होते।
- संख्या के दायीं ओर के शून्य सार्थक अंक होते है।
- चरघातांकी निरूपण में दी गई संख्या का अंकिक भाग ही सार्थक अंक होता है।
विमीय विश्लेषण की सीमायें Limitations of Dimensional Analysis
यद्यपि विमीय विश्लेषण बहुत उपयोगी है लेकिन इसकी भी कुछ सीमायें हैं-
1- यदि किसी भौतिक राशि की विमायें दी हैं, तो वह राशि अद्वितीय नहीं हो सकती क्योंकि कई भौतिक राशियों की विमायें समान होती हैं। उदाहरण के लिए,
2- आंकिक नियतांक [ K ] जैसे ( 1 / 2 ), 1 अथवा 2π आदि की कोई विमायें नहीं होती अतः इन्हें विमीय विश्लेषण विधि द्वारा ज्ञात नहीं किया जा सकता ।
3- विमीय विधि का प्रयोग गुणनफल से प्राप्त होने वाले अन्य फलनों के अतिरिक्त फलनों को व्युत्पन्न करने के लिये नहीं किया जा सकता है । जैसे –
4- यदि यांत्रिकी में कोई भौतिक राशि तीन से अधिक राशियों पर निर्भर करती है तो विमीय विश्लेषण की विधि से सूत्र को व्युत्पन्न नहीं किया जा सकता क्योंकि इस स्थिति में बनने वाले समीकरणों की संख्या (=3) अज्ञात चरों (> 3) की तुलना में कम होती है । फिर भी हम दिये गये समीकरण की सत्यता की जाँच कर सकते हैं । उदाहरण के लिए,
5- यदि कोई भौतिक राशि तीन भौतिक राशियों पर निर्भर करती है, और उनमें से दो की विमायें समान हों तो विमीय विश्लेषण विधि से इसके लिए सूत्र व्युत्पन्न नहीं किया जा सकता।
उदाहरण के लिए,
1- यदि किसी भौतिक राशि की विमायें दी हैं, तो वह राशि अद्वितीय नहीं हो सकती क्योंकि कई भौतिक राशियों की विमायें समान होती हैं। उदाहरण के लिए,
2- आंकिक नियतांक [ K ] जैसे ( 1 / 2 ), 1 अथवा 2π आदि की कोई विमायें नहीं होती अतः इन्हें विमीय विश्लेषण विधि द्वारा ज्ञात नहीं किया जा सकता ।
3- विमीय विधि का प्रयोग गुणनफल से प्राप्त होने वाले अन्य फलनों के अतिरिक्त फलनों को व्युत्पन्न करने के लिये नहीं किया जा सकता है । जैसे –
4- यदि यांत्रिकी में कोई भौतिक राशि तीन से अधिक राशियों पर निर्भर करती है तो विमीय विश्लेषण की विधि से सूत्र को व्युत्पन्न नहीं किया जा सकता क्योंकि इस स्थिति में बनने वाले समीकरणों की संख्या (=3) अज्ञात चरों (> 3) की तुलना में कम होती है । फिर भी हम दिये गये समीकरण की सत्यता की जाँच कर सकते हैं । उदाहरण के लिए,
5- यदि कोई भौतिक राशि तीन भौतिक राशियों पर निर्भर करती है, और उनमें से दो की विमायें समान हों तो विमीय विश्लेषण विधि से इसके लिए सूत्र व्युत्पन्न नहीं किया जा सकता।
उदाहरण के लिए,
दिये गये भौतिक सम्बंध की विमीय रूप से सत्यता की जाँच करना
दिये गये भौतिक सम्बंध की विमीय रूप से सत्यता की जाँच करना
यह " विमीय ऐक्यता के सिद्धांत ” पर आधारित है । इस सिद्धांत के अनुसार समीकरण के दोनों ओर के प्रत्येक पदों की विमायें अवश्य समान होनी चाहिए ।
यदि दोनों ओर के प्रत्येक पद की विमायें समान हैं तो समीकरण विमीय रूप से शुद्ध होगा अन्यथा नहीं । विमीय रूप से शुद्ध समीकरण आंकिक रूप से शुद्ध हो सकता है और नहीं भी ।
उदाहरण :
1- अभिकेन्द्र बल के सूत्र की जाँच करना-
2- गति के द्वितीय समीकरण की जाँच करना-
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