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Showing posts with the label न्याय दर्शन

।। न्याय दर्शन ।। न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम्

समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः च विशेषापेक्षः विमर्शः संशयः  ।।१.१.२३।। यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।१.१.२४।। लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।१.१.२५।। सूत्रार्थ - समानानेकधर्मोपपत्तेः = समान तथा अनेक धर्म को प्राप्ति , विप्रतिपत्तेः = अप्राप्ति , च = और , उपलब्ध्यनुपलब्ध्य =  उपलब्धि और अनुपलब्धि की , व्यवस्थातः = व्यवस्था होने से , विशेषापेक्षाः = विशेष धर्म के प्रत्यक्ष न होने से , विमर्शः = एक वस्तु में विपरीत ज्ञान का होना ही , संशय = संदेह है ।   यम् = जिस , अर्थम् = अर्थ के , अधिकृत्य = अधकार से   प्रवर्तते = प्रवृत्ति होती है , तत् = उस अधिकार को , प्रयोजनम् = प्रयोजन कहते हैं । यस्मिन् = जिस , अर्थे = पदार्थ में , लौकिकपरीक्षकाणाम् = सांसारिक और परीक्षा करने वाले मनुष्य की , बुद्धि साम्यम् = बुद्धिसमान पाई जाय , सः = वह , दृष्टान्तः = दृष्टान्त है । व्याख्या - एक ही वस्तु में समान धर्म के प्रत्यक्ष होने और उमके विशेष धर्म अप्रत्यक्ष रहने से उसी वस्तु में दो , परस्पर विरोधी भावों...

।। न्याय दर्शन ।। प्रमेयप्रकरणम्

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।१.१.९।। इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गमिति ।।१.१.१०।। चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।।१.१.११।। घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ।।१.१.१२।। पृथिवी आपः तेजः वायुः आकाशमिति भूतानि ।।१.१.१३।। गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणाः तदर्थाः ।।१.१.१४।। बुद्धिः उपलब्धिः ज्ञानमिति अनर्थान्तरम् ।।१.१.१५।। युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।।१.१.१६।। प्रवृत्तिः वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ।।१.१.१७।। प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ।।१.१.१८।। पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ।।१.१.१९।। प्रवृत्तिदोषजनितः अर्थः फलम् ।।१.१.२०।। बाधनालक्षणं दुःखम् ।।१.१.२१।। तदत्यन्तविमोक्षः अपवर्गः ।।१.१.२२।। सूत्रार्थ - आत्म शरीरेन्द्रियार्थ = आत्मा , शरीर , इन्द्रिय , अर्थ , बुद्धि , मन , प्रवृत्ति , दोष , प्रेत्यभाव , फल , दुःख और मोक्ष , तु = यह बारह , प्रमेयम प्रमेय कहे गये हैं । इच्छाद्वेषप्रयत्न सुखदुःख ज्ञानान्य - इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , सुख , दुःख और ज्ञान , इति = यह , आत...

।। न्याय दर्शन ।। [प्रमाणप्रकरणम्]

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥१.१.३॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥१.१.४॥ अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववत्शेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥१.१.५॥ प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनमुपमानम् ॥१.१.६॥ आप्तोपदेशः शब्दः ॥१.१.७॥ सः द्विविधः दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥१.१.८।। सूत्रार्थ - प्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दा : = प्रत्यक्ष , अनुमान , उपमान और शब्द , प्रमाणानि = यह चारों प्रमाण कहे गये हैं । इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नम् = इन्द्रिय और उसके विषय के संयोग से उत्पन्न होने वाला , ज्ञानम् = ज्ञान , अव्यपदेश्यम् = न कहा गया , अव्यभिचारि = व्यभिचार दोष से रहित और , व्यवसायात्मकम् = संदेह से रहित होने के कारण , प्रत्यक्षम् प्रत्यक्ष सिद्ध प्रमाण है । तत्पूर्वकम् लक्षण के द्वारा पदार्थ का जो ज्ञान होता है , वह , अनुमानम् = अनुमान है , च = और वह अनुमान , पूर्ववत् = कारण से कार्य का तथा , शेषवत् कार्य से कारण का प्रयोजन होने से , सामान्यतोदृष्टम् = सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहा गया है । यह अनुमान , त्रिविधम् = तीन प्रकार का है । प्...

।। न्याय दर्शन ।। [अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्]

।। अथ प्रथमः अध्यायः ।। [अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्] प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात्निःश्रेयसाधिगमः ॥१.१.१॥ दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायातपवर्गः ॥१.१.२॥ सूत्रार्थ - प्रमाण , प्रमेय , संशय , प्रयोजन , दृष्टान्त , सिद्धान्त , अवयव , तर्क , निर्णय , वाद , जल्प , वितण्डा , हेत्वाभास , छल , जाति , निग्रह और स्थान इनके , तत्वज्ञानात् तत्वज्ञान के होने से , निःश्रेयस = मोक्ष की , अधिगमः = प्राप्ति होती है । दुःख जन्मप्रवृत्तिदोपमिथ्याज्ञानानाम् = दुःख , जन्म , प्रवृत्ति दोष और मिथ्या ज्ञान , में , उत्तरोत्तरापाये एक के पश्चात् दूसरे से छुटकारा पाने पर , तदन्तरापायात् = उसमें अन्तर की प्राप्ति से , अपवर्गः = मोक्ष की प्राप्ति होती है । व्याख्या - प्रमेय , संशय आदि सोलह प्रकार के प्रमाण कहे गये हैं । न्याय में यही सोलह पदार्य माने जाते हैं । जिस साधन से प्रमाता विषय को प्राप्त करता है , उस साधन को प्रमाण और ग्रहण किये जाने चाले विषय को प्रमेय कहते हैं । इन सब...