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Monday, March 9, 2020

।। न्याय दर्शन ।। न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम्


समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः च विशेषापेक्षः विमर्शः संशयः ।।१.१.२३।।
यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।१.१.२४।।
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।१.१.२५।।
सूत्रार्थ - समानानेकधर्मोपपत्तेः = समान तथा अनेक धर्म को प्राप्ति, विप्रतिपत्तेः = अप्राप्ति, च = और, उपलब्ध्यनुपलब्ध्य = उपलब्धि और अनुपलब्धि की, व्यवस्थातः = व्यवस्था होने से, विशेषापेक्षाः = विशेष धर्म के प्रत्यक्ष न होने से, विमर्शः = एक वस्तु में विपरीत ज्ञान का होना ही, संशय = संदेह है ।  यम् = जिस, अर्थम् = अर्थ के, अधिकृत्य = अधकार से  प्रवर्तते = प्रवृत्ति होती है, तत् = उस अधिकार को, प्रयोजनम् = प्रयोजन कहते हैं । यस्मिन् = जिस, अर्थे = पदार्थ में, लौकिकपरीक्षकाणाम् = सांसारिक और परीक्षा करने वाले मनुष्य की, बुद्धि साम्यम् = बुद्धिसमान पाई जाय, सः = वह, दृष्टान्तः = दृष्टान्त है ।
व्याख्या - एक ही वस्तु में समान धर्म के प्रत्यक्ष होने और उमके विशेष धर्म अप्रत्यक्ष रहने से उसी वस्तु में दो, परस्पर विरोधी भावों का उत्पन्न होना संशय अयवा भ्रम है । जैसे अंधेरे में रस्सी को देखा और उसे सर्प के आकार का पाकर उसके सर्प होने का भ्रम हो गया । उस समय रस्सी के धर्म अप्रत्यक्ष हो जाते हैं और सर्प के लक्षण ही दिखाई देते हैं इसीलिये, सूत्रकार ने इस अवस्था को 'संशय' कहा है । ग्रहण और त्याग रूप प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाली इच्छा ही अर्थ - अधिकार है । क्योंकि उस अर्थ अधिकार के द्वारा ही हानि या लाभ की प्राप्ति कराने से सम्बन्धित विषय में प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । इसी को सूत्रकार ने प्रयोजन कहा है ।
सांसारिक तो सभी जीव हैं, परन्तु इस सूत्र में सांसारिक शब्द का विशेष प्रयोग इस अर्थ का सूचक है कि जिसको शास्त्र आदि का ज्ञान न हुआ हो और परीक्षक उसे कहा है जिसे सभी पदार्थों का ज्ञान हो । इस प्रकार सांसारिक और परीक्षक दोनों प्रकार के मनुष्य की बुद्धि जिस विषय में समान हो, उसे दृष्टान्त समझना चाहिये । 
*विशेष - अनिश्चयात्मक ज्ञान को संशय कहते हैं । यह तीन प्रकार का है-
(१) दो वस्तुओं में कोई धर्म साधारण होने के कारण होने वाला संशय, जैसे - यह स्थाणु है कि पुरुष । स्थाणु ( खम्भे ) और पुरुष, दोनों में सामान्य धर्म एक ही है- ऊंचा होना । विशेषतायें स्पष्ट नहीं हैं- स्थाणुत्व का निर्णय करने वाली विशेषतायें जैसे वक्रता या कोटरादि होना अथवा पुरुषत्व का निर्णय करने वाली विशेषतायें जैसे हाथ, पैर आदि- कोई भी स्पष्ट नहीं हैं, इसीसे संशय होता है ।
(२) किसी वस्तु के असाधारण धर्म दिये जाने के कारण होने वाला संशय, जैसे प्रथिवी नित्य है कि अनित्य । पृथिवी का असाधारण ( अपना ) धर्म है गन्ध से युक्त होना । यह 'गन्धवत्त्व' न तो अनित्य पदार्थों में है न नित्य में ही, केवल पृथिवी में ही इसकी सत्ता है । पृथिवी की नित्यता या अनित्यता के ज्ञान का साधन न होने के कारण ही ऐसा संशय हुआ ।
(३) विभिन्न शास्त्रकारों में मतभेद होने के कारण उत्पन्न संशय, जैसे- कुछ लोग कहते हैं कि शब्द नित्य है, दूसरे कहते हैं कि शब्द अनित्य है । इन दोनों का मतभेद देखकर बीच वाला घबरा उठता है और संशय होता है ।
जिस कार्य को ध्यान में रखकर पुरुषों की प्रवृत्ति होती है वही प्रयोजन है । यह दो प्रकार का है- दृष्ट प्रयोजन और अदृष्ट प्रयोजन । कोई वस्तु त्याज्य या ग्राह्य होती है । उसे त्यागने या ग्रहण करने को मनुष्य उपाय करता है । वह वस्तु ही प्रयोजन कही जाती है । दृष्ट प्रयोजन प्रत्यक्ष होता है जैसे अवघात करने का प्रयोजन है भूसों को पृथक् करना । अदृष्ट प्रयोजन विहित तथा परोक्ष होता है जैसे- ज्योतिष्टोम- याग का प्रयोजन स्वर्गप्राप्ति ।
व्याप्ति की स्थापना का जो आधार होता है वही व्याप्ति है । इसके दो भेद हैं- साधर्म्य दृष्टान्त और वैधर्म्य दृष्टान्त । न्यायसूत्र में कहा गया है कि लौकिक परीक्षकों की बुद्धि जिस विषय पर एकमत हो जाय वही दृष्टान्त है । दृष्टान्त का अपना अर्थ है- जिसके द्वारा अन्त या निश्चय देखा गया हो, पाया गया हो । 'यत्र धूमः तत्राग्निः' इस व्याप्ति का निश्चय करने के लिए महानस ( रसोईघर ) का उदाहरण देते हैं- यही दृष्टान्त है । रसोईघर अपने पक्ष का पोषक होने के कारण साधर्म्य दृष्टान्त है । इसी व्याप्ति में 'सरोवर' वैधर्म्य दृष्टान्त होगा क्योंकि जब व्यतिरेक- विधि से व्याप्ति पर आयेंगे- ' जहाँ अग्नि नहीं वहाँ धूम नहीं जैसे सरोवर', तब यह दृष्टान्त काम देगा । फलतः अन्वय विधि का दृष्टान्त साधर्म्य है, व्यतिरेक-विधि का दृष्टान्त वैधर्म्य ।
*विशेष - वाचस्पति मिश्र ने अपने न्यायसूचीनिबन्ध में उक्त तीन पदार्थों को न्यायपूर्वांग कहा है क्योंकि ये न्याय अर्थात् पंचावयव अनुमान की भूमिका के रूप में हैं । न्यायसूत्र में संशय के पाँच भेद माने गये हैं क्योंकि वहाँ लक्षण ही कुछ दूसरे ढंग का है, यद्यपि फल दोनों का एक ही है- समानानेकधर्मोपपत्ते विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः ।।१।१।२३।। संशय वह ज्ञान है जिसमें विशेष धर्म की अपेक्षा रहती है । निम्नलिखित पाँच कारणों से उत्पन्न होने के कारण संशय पाँच प्रकार का है-
(१) समानधर्मोपपत्ति - जब समान धर्मों की प्राप्ति कई वस्तुओं में हो और विशेष धर्म की अपेक्षा हो तब ऐसा ज्ञान संशय है । उच्चता-धर्म स्थाणु और पुरुष दोनों में है । निविकल्पक ज्ञान के अनन्तर दोनों वस्तुओं में संशय हो गया । जब हाथ-पैर आदि के रूप में विशेष धर्मों का ज्ञान हो जायगा तब संशय की निवृत्ति होगी कि यह मनुष्य है ।
(२) अनेकधर्मोपपत्ति- अनेक का अर्थ है सजातीय और विजातीय । जब असामान्य धर्मों का ज्ञान होता है तब भी संशय होता है । शब्द का श्रवण करके यह पूछना कि यह नित्य है या अनित्य, संशय है । शब्द का धर्म मनुष्य, पशु आदि अनित्य पदार्थों में भी नहीं है और न नित्य परमाणुओं में ही है । गन्धवती होने के कारण पृथिवी, जल आदि द्रव्यों से भी विशिष्ट है, गुणकर्म से भी विशिष्ट है । अब संशय हो गया कि पृथिवी द्रव्य है कि गुण या कर्म ।
(३) विप्रतिपत्ति - शास्त्रों में परस्पर विवाद होने से भी संशय होता है । शब्द की नित्यता और अनित्यता का उदाहरण प्रचलित ही है।
(४) उपलब्ध्यव्यवस्था- कभी-कभी हम देखते हैं कि प्रत्यक्ष की अव्यवस्था से भी संशय होता है । तडागादि में तो विद्यमान होने पर जल का प्रत्यक्ष होता है पर मृगमरीचिका ( Mirage ) में अविद्यमान होने पर भी इसका प्रत्यक्ष होता है । अब संशय हआ कि जल का प्रत्यक्ष क्या केवल विद्यमान अवस्था में ही होता है या अविद्यमान होने पर भी ।
(५) अनुपलब्ध्यव्यवस्था- कभी-कभी अप्रत्यक्ष की अव्यवस्था से संशय होता है । मूली में ( Radish ) जल है पर दिखलाई नहीं पड़ता है । पत्थर में भी जल नहीं दीखता पर वहाँ वास्तव में नहीं है । क्या जल विद्यमान या अविद्यमान दोनों ही दशाओं में दिखलाई नहीं पड़ता ? यही संशय है ।


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।। न्याय दर्शन ।। प्रमेयप्रकरणम्


आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।१.१.९।।
इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गमिति ।।१.१.१०।।
चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।।१.१.११।।
घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ।।१.१.१२।।
पृथिवी आपः तेजः वायुः आकाशमिति भूतानि ।।१.१.१३।।
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणाः तदर्थाः ।।१.१.१४।।
बुद्धिः उपलब्धिः ज्ञानमिति अनर्थान्तरम् ।।१.१.१५।।
युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।।१.१.१६।।
प्रवृत्तिः वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ।।१.१.१७।।
प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ।।१.१.१८।।
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ।।१.१.१९।।
प्रवृत्तिदोषजनितः अर्थः फलम् ।।१.१.२०।।
बाधनालक्षणं दुःखम् ।।१.१.२१।।
तदत्यन्तविमोक्षः अपवर्गः ।।१.१.२२।।

सूत्रार्थ - आत्म शरीरेन्द्रियार्थ = आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और मोक्ष, तु = यह बारह, प्रमेयम प्रमेय कहे गये हैं । इच्छाद्वेषप्रयत्न सुखदुःख ज्ञानान्य - इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान, इति = यह, आत्मानः = आत्मा के, लिङ्गम् = लक्षण कहे गये हैं । चेष्ट - इन्द्रियार्थ - आश्रयः = जो चेष्टा, इन्द्रिय और उसके विषयों के लिये आधार रूप है, उसे , शरीरम् = शरीर अथवा देह कहा जाता है । घ्राणरसनचक्षुः = घ्राण, रसना, चक्षु, त्वक् श्रोत्राणि - त्वचा और श्रोत्र, यह पाँचों, इन्द्रियाणि - इन्द्रियाँ, भूतेभ्यः = भूतों से उत्पन्न हुई हैं । पृथिवी = पृथिवी, आपः = जल, तेजः = अग्नि, वायुः - वायु, आकाशम् = आकाश, इति = यह पांच, भूतानि = भूत कहे जाते है । गन्धरसरूपस्पर्शशब्द : - गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द यह पाँचों, पृथिव्यादिगुणाः = पृथिवी आदि पंचभूतों के गुण हैं और, तदर्थाः = उन पंच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं । बुद्धिः = बुद्धि, उपलब्धिः = प्राप्ति, ज्ञानम् =  ज्ञान, इत्यनर्थान्तरम् = यह पर्यायवाची शब्द हैं । युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिः = इन्द्रियों का अपने विषयों से जो सम्बन्ध है, उससे भिन्न ज्ञान को उत्पत्ति, मनसः = मन के, लिङ्गम् = लक्षण समझने चाहिये । वाग्बुद्धि शरोरारम्भः = वाणी , मन और शरीर से होने वाला कर्म, इति = यह, प्रवृत्तिः = प्रवृत्ति द्वारा ही होना समझना चाहिये । प्रवर्त्तना =  प्रवृत्ति के, लक्षणा = लक्षण वाला, दोष : = दोष कहा गया है । पुनः = बारम्बार, उत्पत्तिः = जन्म लेना, मरना, प्रेत्यभावः = प्रेत्यभाव कहा गया है । प्रवृत्तिदोषजनितः = प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न हुआ, अर्थः = विषय, फलम् = फल है । बाधना = इच्छित वस्तु की प्राप्ति में बाधा, दुःखम् = दुःख का, लक्षणम् = लक्षण है । तदत्यन्त विमोक्षः = उस दुःख की अत्यन्त निवृत्ति का नाम ही, अपवर्गः = मोक्ष है ।

व्याख्या - आत्मा, शरीर आदि बारह प्रकार के प्रमेय बताये हैं । परन्तु, यथार्थ रूप में जिसके ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति हो, और जिसके ज्ञान में विपरीतता होने पर बन्धन की प्राप्ति हो, वही प्रमेय है । जैसे आत्मा और परमात्मा इस प्रकार आत्मा के दो भेद हैं । इनमें परमात्मा तो निर्लिप्त है और आत्मा अपने कर्म का फल भोगने वाला है । उन कर्मों के फल को भोगने के साधन रूप में इन्द्रियाँ हैं और भोगने योग्य पदार्थ इन्द्रियों के विषय हैं, इनका अनुभव इन्द्रियों से ही होता है । परन्तु, इन्द्रियों से सब पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, इसलिये परोक्ष पदार्थों का ज्ञान कराने वाला मन है । मन में राग और द्वेष दो प्रकार के भावों की उत्पत्ति होती रहती है । यह दोनों दोष हैं, जिनमें पदार्थों को त्यागने और ग्रहण करने की प्रवृत्ति होती रहती है । जन्म - मरण प्रेत्यभाव हैं और अच्छे या बुरे कर्मों का उपभोग ही फल है । यह फल भी दो प्रकार का है - बुरे कर्मों से दुःख और अच्छे कर्मों से सुख की प्राप्ति होती है । अत्यधिक सुख की प्राप्ति ही मोक्ष है, जिसमें दुःख का अत्यन्त अभाव हो जाता है । आत्मा के छः लक्षण हैं –
(१) इच्छा - जिस वस्तु से पहिले सुख मिला, उसी वस्तु की प्राप्ति का विचार इच्छा कहा जाता है ।
(२) द्वष - जिस वस्तु से पहिले कष्ट प्राप्त हुआ हो, उस वस्तु को देखकर उससे बचने के विचार को द्वेष कहा गया है ।
(३) प्रयत्न - दुःख के कारणों को दूर करने और सुख के कारणों को प्राप्त करने वाले कार्य को प्रयत्न कहते हैं ।
(४) सुख - जो शरीर को कष्ट न दे वह सुख है ।
(५) दुःख - जिसकी प्राप्ति से शरीर को कष्ट हो वह दुःख और
(६) ज्ञान - आत्मा या देह के अनुकूल तथा प्रतिकूल पदार्थों का जानना ही ज्ञान कहा गया है ।
जीव को अपने प्रारब्ध कर्म का भोग करने के लिये जन्म धारण करना होता है । सुख और दुःख की प्राप्ति को भोग कहा गया है और जिस आधार में रहकर आत्मा उस भोग को प्राप्त कर सके, वह आधार ही शरीर है । पांचों इन्द्रियाँ पंचभूतों से बनी कही जाती हैं । यह इन्द्रियां ही शरीर के आश्रित आत्मा को विभिन्न विषयों का ग्रहण कराती हैं । घ्राण अर्थात् नासिका का कार्य सूघना और गन्ध ग्रहण करना है, इसके द्वारा आत्मा को गन्ध का ज्ञान होता है । रसना अर्थात् जिह्वा खाद्य पदार्थों का स्वाद ग्रहण करती है । नेत्र उपस्थित दृश्य को देखते हैं । त्वचा से स्पर्श का ज्ञान होता है । श्रोत्र अर्थात् कान शब्द को ग्रहण करते हैं । इस प्रकार यह पांचों इन्द्रियां आत्मा को गन्ध, रस, दृश्य, स्पर्श और शब्द का ज्ञान कराती रहती हैं । यह पाँचों भूत परस्पर समवाय सम्बन्ध अर्थात् संयुक्त रूप से रहते हैं । यह पंचभूत बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होकर आत्मा को अपने - अपने गुण का ज्ञान कराने में समर्थ हैं ।
पांच भूतों के पाँच गुणं हैं । पृथिवी का गुण गन्ध है, जल का गुण रस है, अग्नि का गुण रूप है, वायु का गुण स्पर्श है और आकाश का गुण शब्द है । यह पाँचों गुण ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं नासिका का विषय गन्ध, जिह्वा का विषय रस, नेत्र का विषय रूप, त्वचा का विषय स्पर्श और कान का विषय शब्द है । बुद्धि, उपलब्धि और ज्ञान इन तीनों के अर्थ में कोई अन्तर नहीं है । यह घट है, यह पट है इस प्रकार का ज्ञान कराने वाली वृत्ति बुद्धि का धर्म है और इसी को ज्ञान कहा जाता है । ‘मैं’ घड़े को जानता हूँ 'इस प्रकार का बोध उपलब्धि' है । इससे सिद्ध होता है कि बुद्धि, उपलब्धि और ज्ञान में कोई भेद नहीं है । आत्मा की प्रेरणा से ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों का सम्बन्ध रूप, रस, गंध आदि गुणों के साथ समान ज्ञान होना ही विषय ज्ञान है । तात्पर्य यह है कि मन को एक समय में दो ज्ञान नहीं हो सकते । जब गंध का ज्ञान होगा, तब अन्य गुणों का नहीं होगा, रूप का होगा तब गंध आदि का नहीं होगा । इस प्रकार एक समय में एक विषय का ज्ञान होना मन का लक्षण है । इच्छापूर्वक होने वाले शरीर आदि के कार्यों को प्रवृत्तिजनक समझना चाहिये । क्योंकि यह कार्य मन, वाणी और शरीर से होता है । जो कार्य केवल मन मे होता है, उसे मानसिक कार्य कहते हैं, मन और वाणी दोनों के संयोग से होने वाला कर्म वाचिक है, तथा मन, इन्द्रिय और शरीर के संयोग से जो कार्य होता है, वह शारीरिक कहा गया है । जिस कर्म का फल सुख रूप हो, वह पुण्य कर्म है और जिमका फलं दुःख रूप हो उमे पाप कर्म समझना चाहिये । इस प्रकार पुण्य और पाप भेद वाली दश वृत्तियाँ होती हैं । धर्म या अधर्म के हेतु प्रवृत्ति का होना दोष है अर्थात् जिस प्रवृत्ति से धर्म या अधर्म कार्य की सिद्धि होती हो, उसे दोष मानना चाहिये । प्रवृत्ति के कारण रूप राग, द्वेष और मोह हैं । इनके होने पर ही धर्म या या अधर्म कार्यों में प्रवृत्ति होती है । एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जन्म लेना प्रेत्यभाव है । पुनर्जन्म या पुनरुत्पत्ति पर्यायवाची शब्द हैं । शरीर से इन्द्रिय और मन का सम्बन्ध टूट जाने को प्रेत कहते हैं । पुनः जन्म लेने को प्रेत्यभाव अर्थात् मर कर जन्म लेना कहते हैं । तात्पर्य यह है कि सूक्ष्म शरीर सहित जीवात्मा का शरीर से निकलना प्रयाण है और प्रयाण करने वाले को प्रेत कहते हैं और उस प्रेत का दूसरे शरीर से सम्बन्ध हो जाना प्रेत्यभाव है । सुख या दुःख की प्राप्ति को ही फल कहते हैं, इसकी उत्पत्ति प्रवृत्ति और दोष से होती है । धार्मिक प्रवृत्ति से किया गया कार्य सुखदायक और अधार्मिक प्रवृत्ति वाला कार्य दुःख उत्पन्न करने वाला होता है । मन जिस किसी वस्तु को प्राप्त करना चाहे और वह वस्तु न मिले तो उससे दुःख होता है ।
दुःख के तीन भेद हैं आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों प्रकार के दुःखों से अत्यन्त छुटकारा मिल जाय, वही मोक्ष है । इन दुःखों से छुटकारा तभी हो सकता है, जब जन्म - मरण का चक्र समाप्त हो जाय और यह चक्र तभी समाप्त होगा जबकि प्रारब्ध कर्मों का क्षय हो जायगा । कुछ लोग शंका करते हैं कि सुषुप्ति को ही मुक्ति क्यों न मानले ? क्योंकि उसमें भी दुःखों से निवृत्ति हो जाती है तो इसका समाधान यह है कि सुषुप्ति में दुःखों का आधार सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है, मुक्तावस्था में सूक्ष्म शरीर भी नहीं रहता ।
*विशेष - प्रमा अर्थात् यथार्थ अनुभव में जो दिखलाई पड़े वही प्रमेय ( Knowable ) है । इसके बारह भेद हैं - आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग । विशेष - प्रमेयों के लक्षण न्यायसूत्र में प्रथम अध्याय में नवम सूत्र से लेकर २२ वे सूत्र तक दिये गये है । तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में इनकी परीक्षा हुई है ।
(१) आत्मा ( Soul )- ज्ञान से युक्त आत्मा है, यह सबों को देखने वाली, सर्वज्ञ तथा सबों का अनुभव करने वाली है । यह विभु और नित्य है । ईश्वर और जीव के रूप में इसके दो भेद हैं । सर्वज्ञ ईश्वर एक ही है, जीव प्रत्येक शरीर के लिए भिन्न-भिन्न है । आत्मा के लिए कुछ चिह्न हैं जैसे- इच्छा ( जिस तरह की वस्तु से आत्मा को सुख मिलता है उसी तरह की वस्तु की इच्छा उसे होती है ), द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान । दुःखप्रद वस्तु से द्वेष होता है, उन्हें हटाने या सुखद पदार्थों को लाने के लिए प्रयत्न होता है । भोग करने पर या बोध होने पर यह मालूम होता है कि यह अमुक पदार्थ है ।
(२) शरीर ( Body )- आत्मा के भोग का अधिष्ठान ( आधार ) शरीर है । शरीर विभिन्न चेष्टाओं, इन्द्रियों और उनके अर्थों का भी आश्रय हैं । किसी वस्तु को छोड़ने या पाने के लिए चेष्टायें शरीर में ही होती हैं । शरीर के अनुग्रह से इन्द्रियाँ अनुगृहीत होती हैं, उसी में कोई उपघात होने पर ये भी उपहत होती हैं अपने-अपने अच्छे या बुरे विषयों की प्रवृत्ति दिखलाती हैं, उन इन्द्रियों का आश्रय भी शरीर ही है । शरीररूपी आयतन में इन्द्रियों और उनके अर्थों के संनिकर्ष से उत्पन्न होने वाले सुख और दुःख की संवेदना होती है । इसीलिए शरीर अर्थों का भी आश्रय है ।
(३) इन्द्रियाँ ( Senses ) - इन्द्रियाँ भोग का साधन हैं जो शरीर से संयुक्त रहती हैं । ये पाँच है- घ्राण, रसन, चक्षु, त्वचा और श्रोत्र जिनसे क्रमशः सूंघना, स्वाद लेना, देखना, छूना, और सुनना - ये काम होते हैं । इन इन्द्रियों में शक्तिदान करने वाले ये हैं - पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें भूत भी कहते हैं ।
(४) अर्थ ( Objects ) - उपर्युक्त इन्द्रियों के द्वारा भोग्य ( Enjoyable ) वस्तुओं को अर्थ कहते हैं । प्राणेन्द्रिय का अर्थ गन्ध है, रसनेन्द्रिय का रस, चक्षुरिन्द्रिय का रूप, त्वगिन्द्रिय का स्पर्श और श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द ।
(५) बुद्धि ( Intellect )- बुद्धि, ज्ञान और उपलब्धि ( Understanding ) इन तीनों को गौतम अनर्थान्तर अर्थात् पर्याय मानते हैं। यह चेतन है और शरीर तथा इन्द्रियों के संघात से पृथक है ।
(६) मन ( Mind )- सुखादि ज्ञानों का साधन इन्द्रिय मन है । इसी को अन्तःकरण अर्थात् आन्तरिक भावों को जानने वाली इन्द्रिय भी कहते हैं। इसका चिह्न ( लिङ्ग या पहचान ) है एक साथ कई ज्ञान की उत्पत्ति न होने देना । केवल इन्द्रियार्थसंनिकर्ष से यदि ज्ञान उत्पन्न होता तो घ्राणेन्द्रिय का सम्बन्ध गन्ध से तथा श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द से एक ही साथ होकर दोनों ज्ञान ( गन्धज्ञान और शब्दज्ञान ) साथ-साथ उत्पन्न होने पर ऐसा नहीं होता क्योंकि मन नियामक रूप से पृथक् करने के लिए प्रस्तुत रहता है । मन गन्धज्ञान कराने पर ही शब्द का ज्ञान करा सकता है ।
(७) प्रवृत्ति ( Volition )- वाचिक, मानसिक और शारीरिक क्रिया को प्रवृत्ति कहते हैं । फिर शुभ और अशुभ के भेद से छह प्रकार की हो जाती है । वात्स्यायन शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों में प्रत्येक के दस-दस भेद मानते हैं । अशुभ प्रवृत्तियों में शरीर से प्रवृत्त हिंसा, अस्तेय और प्रतिषिद्ध मैथुन, वचन से प्रवृत्त अनृत, परुष, सूचन ( चुगली, शिकायत, निन्दा ) और असम्बद्ध भाषण करना; मन से प्रवृत्त परद्रोह, परधन को हडपने की इच्छा और नास्तिकता । शुभ प्रवृत्तियों में शरीर के द्वारा दान, रक्षा और सेवा; वचन से सत्य, हित, प्रिय और स्वाध्याय; मन से दया, अस्पृहा और श्रद्धा । प्रवृत्तियों के ही कारण जन्म लेना पड़ता है ।
(८) दोष ( Faults ) - प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले दोष कहलाते हैं । ये तीन हैं- राग, द्वेष और मोह । ये ही ज्ञाता को पुण्य या पाप की ओर प्रवृत्त करते हैं । जहाँ मिथ्याज्ञान होता है वहाँ राग और द्वेष रहते हैं । इन दोषों की संवेदना प्रत्येक आत्मा को होती है । राग, द्वेष या मोह के वश में प्राणी वह काम करता है जिससे सुख या दुःख मिलता है ।
(९) प्रेत्यभाव ( Transmigration )- उत्पन्न होने के बाद मर कर फिर जन्म लेना ही प्रेत्यभाव है । उत्पन्न प्राणी का सम्बन्ध देह, इन्द्रिय, बुद्धि और संवेदना के साथ होता है । मर जाने पर ये सम्बन्ध छूट जाते हैं । जब पुनः उत्पत्ति होती है तब दूसरे शरीरादि का सम्बन्ध स्थापित होता है । जन्म मरण के प्रबन्ध का यह अभ्यास ( आवृत्ति ) तब तक चलता रहता है जब तक अपवर्ग की प्राप्ति न हो जाय ।
(१०) फल ( Fruit ) - प्रवृत्तियों और दोषों से उत्पन्न होने वाले अर्थ को फल कहते हैं । फल में सुख और दुःख की संवेदना होती है । हम जो भी कर्म करते हैं उनमें कुछ तो सुख का फल देते हैं, कुछ दुःख का । देह, इन्द्रिय, विषय और बुद्धि के होने पर ही फल मिलता है इसलिए इन सबों को फल में गिन लेते हैं । इन फलों को लेने या त्यागने में ही सारा संसार व्यस्त है । इनका अन्त नहीं है ।
(११) दुःख ( Pain ) - जिससे पीड़ा या सन्ताप हो वही दुःख है । जब लोग देखते हैं कि सारा संसार ही दुःख से पूर्ण है तो दुःख को हटाने की इच्छा से जन्म को दुख के रूप में समझ कर निर्विण्ण ( निर्मम ) हो जाते हैं, तब विरक्त होते हैं और विरक्त होने पर मुक्त भी हो जाते हैं । दुःख तीन प्रकार के हैं- आध्यात्मिक, आधिभौतिकऔर आधिदैविक । वात, पित्त और कफ के दोषों की विषमता से उत्पन्न शारीरिक अथवा काम, क्रोधादि से उत्पन्न मानसिक दुःखों को आध्यात्मिक कहते हैं । आन्तरिक उपायों से ही इसका निवारण सम्भव है । सर्प, व्याघ्र आदि जीवों से उत्पन्न दुःख आधिभौतिक है । यक्ष, राक्षस, ग्रहादि के आवेश से आया हुआ दुःख आधिदैविक है । ये दोनों दुःख बाहरी उपाय से ही हटाये जा सकते हैं । दूसरे मत से दुःख इक्कीस तरह के हैं- शरीर, छह इन्द्रियाँ, छह विषय, छह बुद्धियाँ, सुख और दुःख । दुःख से सम्बन्ध होने के कारण सुख भी दुःख ही है । शरीरादि दुःख के साधन हैं, इसलिए दुःख के ही अन्दर हैं । दूसरे स्थान में बाहरी दुःखसाधन १६ प्रकार के माने गये हैं- परतन्त्रता, आधि ( मनःकष्ट ), व्याधि, मानच्युति, शत्रु, दरिद्रता, दो स्त्री होना, अधिक पुत्रियाँ होना, दुष्ट स्त्री, दुष्ट नौकर, कुग्रामवास, कुस्वामिसेवा, वार्धक्य, परगृह में रहना, वर्षा में परदेश रहना, बुरे हल से खेती । वस्तुतः दर्शनों का मूल ही दुःख है ।
(१२) अपवर्ग ( Emancipation )- दुःखों से बिलकुल मुक्त हो जाना अपवर्ग है । मिला हुआ जीवन जब नष्ट हो जाय और अप्राप्त जीवन न मिले तभी अपवर्ग है । इस प्रकार नैयायिक अपवर्ग की व्याख्या निषेधात्मक शब्दों में करते हैं ।



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Sunday, March 8, 2020

।। न्याय दर्शन ।। [प्रमाणप्रकरणम्]


प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥१.१.३॥
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥१.१.४॥
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववत्शेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥१.१.५॥
प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनमुपमानम् ॥१.१.६॥
आप्तोपदेशः शब्दः ॥१.१.७॥
सः द्विविधः दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥१.१.८।।

सूत्रार्थ - प्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दा : = प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द, प्रमाणानि = यह चारों प्रमाण कहे गये हैं । इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नम् = इन्द्रिय और उसके विषय के संयोग से उत्पन्न होने वाला, ज्ञानम् = ज्ञान, अव्यपदेश्यम् = न कहा गया, अव्यभिचारि = व्यभिचार दोष से रहित और, व्यवसायात्मकम् = संदेह से रहित होने के कारण, प्रत्यक्षम् प्रत्यक्ष सिद्ध प्रमाण है । तत्पूर्वकम् लक्षण के द्वारा पदार्थ का जो ज्ञान होता है, वह, अनुमानम् = अनुमान है, च = और वह अनुमान, पूर्ववत् = कारण से कार्य का तथा, शेषवत् कार्य से कारण का प्रयोजन होने से, सामान्यतोदृष्टम् = सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहा गया है । यह अनुमान, त्रिविधम् = तीन प्रकार का है । प्रसिद्ध साधात प्रसिद्ध पदार्थों के समान धर्म से, साध्यसाधनम् = साध्य के साधन को, उपमानम् = उपमान प्रमाण कहा गया है । आप्तोपदेशः = आप्त पुरुषों का उपदेश, शब्दः = शब्द प्रमाण समझना चाहिये । दृष्टादृष्टार्थत्वात् = दृष्ट और अदृष्ट के भेद से , सः = वह , द्विविधः = दो प्रकार का माना जाता है ।

व्याख्या - प्रमाण के चार भेद हैं - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द । जब किसी पदार्थ को सिद्ध करना होता है, तब इन चार प्रकारों से ही उस पदार्थ का ज्ञान हो सकता है । इन्द्रिय और उसके विषय से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह प्रत्यक्ष दिखाई देता है । जैसे अमुक व्यक्ति चल रहा है, अमुक व्यक्ति भोजन कर रहा है । जब नेत्र इन विषयों को प्रत्यक्ष देखता है, तब उसमें सन्देह का प्रश्न ही नहीं उठता । नेत्र जिस दृश्य को होते हुए प्रत्यक्ष देख रहा है, वह पहिले से कहा गया भी नहीं होता और प्रत्यक्ष घटित होने से वह ज्यों का त्यों दिखाई देगा, इसलिये उसके घटने - बढ़ने का दोष भी नहीं होता । इसीलिए जो प्रत्यक्ष है, वह प्रमाण सर्वोपरि और अकाट्य माना जाता है । लक्षण को देखकर जिस किसी वस्तु का ज्ञान होता है उसे अनुमान कहते हैं । जैसे सींग, पूछ के अन्त में बाल, चार पांव, कंधा उठा हुआ और कण्ठ के नीचे मांस लटकता हुआ होने से गौ का अनुमान होता है । ऐसे पशु को देखते ही सामान्य रूप से सभी लोग उसे गाय समझ लेते हैं, इसलिए इसे सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहा गया है । जहाँ कारण को देखकर कार्य का अनुमान हो अर्थात् आम के वृक्ष को देखकर यह अनुमान किया जाय कि इस पर तो फल लगेंगे, वे आम के ही होंगे - यह पूर्ववत् अनुमान है तथा कार्य को देखकर कारण का अनुमान हो, जैसे पुत्र है तो पिता अवश्य होगा - ऐसा अनुमान शेषवत् कहा गया है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि अनुमान प्रमाण के जो तीन भेद न्याय में कहे गये हैं वे उचित हैं । किसी पदार्थ में प्रसिद्ध पदार्थ के से लक्षण हों और उसकी पहिचान उस प्रसिद्ध पदार्थ का नाम लेकर कह देने मात्र से हो जाय, उसे उपमान प्रमाण कहा जायगा। जैसे किसी नील गाय को देख कर कह दें कि यह गौ के समान है अयवा नील गाय को गाय के समान देखकर यह समझ लें कि नील गाय होगी तो ऐसा अनुमान उपमान प्रमाण कहा जाता है । आप्त पुरुष उन्हें कहते हैं जो सदाचारी, ज्ञानी, विद्वान और मोक्ष की कामना वाले तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हों । ऐसे व्यक्ति कभी मिथ्या भाषण नहीं करते और योग आदि के साधनों में लगे रहने से उन्हें जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसके द्वारा वे सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्वों को जानने में भी पूर्ण समर्थ होते हैं । वे अपने योगबल से अप्राप्त विषयों का भी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । ऐसे पुरुष जो बात कहें, उसे प्रामाणिक माना जाता है । इसीलिये सूत्रकार ने आप्तजनों के उपदेश को ' शब्द प्रमाण ' कहा है । आप्त शब्द के भी दो भेद हैं - दृष्ट और अदृष्ट । जो विषय प्रत्यक्ष दिखाई देता हो, उसके संबन्ध में कहा गया शब्द ' दृष्ट ' कहा जाता है तथा जिस विषय को अनुमान से बताया गया हो, उसे अदृष्ट शब्द कहा गया है । जैसे कोई कहे कि "पुत्र की कामना वाला पुरुष यज्ञ करें' इसमें यज्ञ करने से उसके फल रूप पुत्र का उत्पन्न होना नेत्र से प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेगा । परन्तु, यदि कहा जाय कि 'स्वर्ग की कामना वाला पुरुष यज्ञ करें' यो यज्ञ द्वारा स्वर्ग की प्राप्ति का देखा जाना इस शरीर से सम्भव नहीं है । इसलिये इसे अदृष्ट शब्द कहा गया है ।
*विशेष- प्रमाण को परिभाषित करते हुये वात्स्यायन लिखते है, "प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तो" अर्थात प्रमाण से अर्थ की प्रतीति होती है। अर्थ को परिभाषित करते हुये वात्स्यायन पुनः लिखते है, "अर्थस्तु –सुखं सुखहेतुश्च , दुःखं दुःखहेतुश्च" अर्थात जो सुख, सुख का हेतु और दुःख, दुःख का हेतु है वह अर्थ है।" आगे वात्स्यायन जी कहते है की प्रमाण सप्रयोजन होता है उसमें प्रवृत्ति सामर्थ्य होनी चाहिए अर्थात “प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत्प्रमाणम्”। इस सप्रयोजन प्रमाण में प्रमाता, प्रमेय और प्रमिति- ये तीनों मिलकर होते है, क्योंकि इनमे से किसी एक के न होने पर अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । प्रमाता को परिभाषित करते हुये वात्स्यायन जी लिखते है, “तत्र यस्येप्साजिहासाप्रयुक्तस्य प्रवृत्तिः स प्रमाता” अर्थात जिस पुरुष की ईप्सा या जिहासा को लेकर प्रवृत्ति होती है, वह प्रमाता कहलाता है । इसी प्रकार प्रमेय के विषय लिखा है, “योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्” अर्थात जो अर्थ समझा जाता है वह प्रमेय है । आगे प्रमिति के विषय में कहते है, “यदर्थविज्ञानं सा प्रमितिः” अर्थात यथार्थ ज्ञान ही प्रमिति है । इस प्रकार प्रमाण को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है, “जिस साधन के द्वारा प्रमाता प्रमेय की प्रमिति प्राप्त करता है वह प्रमाण कहलाता है।“
महर्षि गौतम ने अपने न्याय-सूत्र में चार प्रमाण कहे है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ।
१. प्रत्यक्ष - जो ज्ञान इन्द्रियों और पदार्थ के संनिकर्ष से उत्पन्न होता है । तथा भ्रम से रहित ( अव्यभिचारी ) होकर नाम लेने योग्य (व्यपदेश्य) न हो तथा निश्चयात्मक हो । जब हम आँखों से घट का ज्ञान प्राप्त करते हैं तब यह शुद्ध ज्ञान है; ज्ञान के समय घट शब्द का कोई प्रयोजन नहीं क्योंकि ज्ञान अशाब्द अर्थात् निविकल्पक है । दूसरे, प्रत्यक्ष ज्ञान निश्चयात्मक होता है, दूर से देखकर किसी पदार्थ को धूम या धूल मानने की भूल होने पर उसे प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं कहेंगे । कुछ निश्चय होने पर ही उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कह सकते हैं । वात्स्यायन इन्द्रियों के साथ वस्तु के सन्निकर्ष का तथ्य निरूपित करते हए कहते हैं कि आत्मा का संबन्ध मन से होता है, मन का इन्द्रियों से और इन्द्रियों का वस्तुओं से । तभी प्रत्यक्ष होता है । किन्तु यह प्रक्रिया कारण का अवधारण ( Determination ) करना है - विशिष्ट कारण तो इन्द्रिय - विषय - संयोग ही है । प्रत्यक्ष में छह प्रकार के संनिकर्ष हुआ करते हैं । चूंकि प्रत्यक्ष का साधन इन्द्रिय है इसलिए इन्द्रिय को ही प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं । निविकल्पक और सविकल्पक के भेद से प्रत्यक्ष दो प्रकार का है । निविकल्पक में प्रकार या विशेषण का ज्ञान नहीं रहता है जैसे- यह कुछ है । सविकल्पक में प्रकार का ज्ञान हो जाता है जेसे- यह श्याम है ।
२. अनुमान - लिङ्ग ( Middle term ) का परामर्श होना अनुमान है । व्याप्ति की सहायता से वस्तु का बोध कराने वाले को लिंग या हेतु कहते हैं जैसे धूम अग्नि का लिग है । व्याप्ति का अर्थ साहचर्य-नियम ( Universal relation ) है जैसे; जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ - वहाँ अग्नि भी है । जब व्याप्ति से विशिष्ट लिंग का ज्ञान पक्ष ( Minor term )जैसे; पर्वत में उत्पन्न होता है उसे ही लिंग का परामर्श कहते हैं । तर्कसंग्रह में परामर्श के विषय में कहा गया है कि व्याप्ति से विशिष्ट पक्षधर्मता का ज्ञान ही परामर्श है । उदाहरण के लिए, 'अग्नि के द्वारा व्याप्य धूम से युक्त' यह पर्वत है । ऐसा ज्ञान परामर्श है । इस परामर्श से 'पर्वत भी अग्निमान है' यह ज्ञान (निष्कर्ष या निगमन) उत्पन्न हुआ, यही अनुमिति है । नीचे लिखे रूप में इसे स्पष्टतर किया जा सकता है
(१) यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र अमिः (व्याप्ति या Major premise)
(२) पर्वतो धूमवान् (पक्षधर्मता या Minor premise)
(३) पर्वतोऽग्निमान् (अनुमिति या Conclusion)
इस अनुमिति तक पहुंचने का जो साधन ( करण, असाधारण कारण ) हो वही अनुमान है । न्यायदर्शन में अनुमान के तीन भेद किये गये हैं - पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट । जहाँ कारण को देखकर कार्य का अनुमान हो, वह पूर्ववत् है । जैसे मेघों को आकाश में घिरते देखकर वृष्टि होने का अनुमान । जब कार्य को देखकर कारण का अनुमान हो, वह शेषवत् है जैसे चारों ओर पानी ही पानी देखकर 'वर्षा हुई है' इसका अनुमान । सामान्य रूप से अनुमान करना कि जिस वस्तु को एक जगह देखा था, दूसरी जगह पर है तो वह वस्तु अवश्य चलती होगी । इस आधार पर अप्रत्यक्ष होने पर भी सूर्य की गति का अनुमान कर लेते हैं । दूसरे अंग से भी इनका विवेचन होता है जैसा कि वात्स्यायन ने किया है । नव्य नैयायिक अनुमान के दो भेद करते हैं - स्वार्थ और परार्थ । स्वार्थ का अभिप्राय है जो एक व्यक्ति को अपने आप में संतुष्ट कर सके, अनुमिति करा सके । जब कोई व्यक्ति स्वयं ही बार-बार रसोईघर, कल-कारखाने आदि में देखकर व्याप्ति ग्रहण कर लेता है कि 'जहाँ धूम है वहाँ अग्नि है', तब पर्वत के पास जाकर वहाँ की अग्नि के विषय में सन्देह होने पर, पर्वत में धूम देखकर व्याप्ति का स्मरण करता है कि जहाँ धूम है वहाँ अग्नि होती है । तब यह ज्ञान ( लिंग - परामर्श ) उत्पन्न होता है कि अग्नि के द्वारा व्याप्य धूम से युक्त ( वह्नि व्याप्यधूमवान् ) यह पर्वत है । अन्त में यह ज्ञान होता है कि पर्वत अग्नि से युक्त हैं । यही स्वार्थानुमान है । जब स्वयं धूम से अग्नि का अनुमान करके दूसरों को समझाने के लिए पांच अवयव - वाक्यों ( Members ) का प्रयोग किया जाय तो उसे परार्थानुमान कहते हैं ।
(३) उपमान - जब सादृश्य ( अतिदेश ) का बोध कराने वाले वाक्य का स्मरण करके सदृश वस्तु का ज्ञान होता है उसे ही उपमान कहते हैं । न्यायसूत्र में कहा है कि प्रसिद्ध वस्तु के साधर्म्य से ज्ञेय वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना उपमान है । जैसे कोई आदमी 'गवय' नामक जंगली जीव को नहीं जानता किन्तु जब एक अतिदेश ( सादृश्य ) वाक्य सुनता है कि गवय गौ के समान होता है, तभी उसे गवय को पहचानने में देर नहीं लगती। उपमिति-ज्ञान होता है कि यही गवय है ।
(४) शब्द - यथार्थवक्ता ( आप्त ) के द्वारा उच्चरित वाक्य ही शब्द है जैसे वेद के वाक्य या भूगोल में कहे गये वाक्य । न्यायसूत्र में शब्द के दो भेद किये गये हैं दृष्टार्थ शब्द और अदृष्टार्थ शब्द । जब आप्तवाक्य की संगति इस संसार के तथ्यों से बैठाई जा सके जैसे यह कहना कि साईबेरिया में बर्फ जमी हुई रहती है । तब उसे दृष्टार्थ कहते हैं । किन्तु आप्तवाक्यों से परलोक की बातों का ज्ञान होने पर उसे अदृष्टार्थ शब्द कहते हैं । इस प्रकार लौकिक वाक्यों और ऋषि के वाक्यों में भेद किया जा सकता है । इसे ही लौकिक और वैदिक भी कहते हैं ।
इस प्रकार प्रमाणों से ही प्रमेयों का ज्ञान तथा परीक्षण होता है । न्याय में प्रमाण शास्त्र ( Epistemology ) पर बहुत अधिक जोर दिया गया है । नव्यन्याय तो विशुद्ध प्रमाणशास्त्र ही है । प्रमाणों के विषय में जितना विश्लेषण भारतीय दर्शन में हुआ है विश्व के किसी भी दर्शन में मिलना असम्भव है - न्याय का तो यह विषय ही है । अन्य दर्शन इस दृष्टि से न्याय के ऋणी हैं । अपने विषयों के प्रतिपादन के लिए न्याय के कितने ही शब्द अन्य दर्शनकारों ने लिये हैं । इस दृष्टि से यदि न्याय - दर्शन को ' दर्शनों का दर्शन ' कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी ।

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Friday, March 6, 2020

।। न्याय दर्शन ।। [अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्]


।। अथ प्रथमः अध्यायः ।।
[अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्]
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात्निःश्रेयसाधिगमः ॥१.१.१॥
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायातपवर्गः ॥१.१.२॥

सूत्रार्थ - प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह और स्थान इनके, तत्वज्ञानात् तत्वज्ञान के होने से, निःश्रेयस = मोक्ष की, अधिगमः = प्राप्ति होती है । दुःख जन्मप्रवृत्तिदोपमिथ्याज्ञानानाम् = दुःख, जन्म, प्रवृत्ति दोष और मिथ्या ज्ञान, में, उत्तरोत्तरापाये एक के पश्चात् दूसरे से छुटकारा पाने पर, तदन्तरापायात् = उसमें अन्तर की प्राप्ति से, अपवर्गः = मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

व्याख्या - प्रमेय, संशय आदि सोलह प्रकार के प्रमाण कहे गये हैं । न्याय में यही सोलह पदार्य माने जाते हैं । जिस साधन से प्रमाता विषय को प्राप्त करता है, उस साधन को प्रमाण और ग्रहण किये जाने चाले विषय को प्रमेय कहते हैं । इन सबके तत्व को भले प्रकार जान लेने से मोक्ष की प्राप्ति सुलभ हो जाती है । तत्व ज्ञान के प्राप्त होने से मिथ्या ज्ञान दूर हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के मिटने पर राग - द्वेष आदि का नाश होता है, जब राग - द्वेष नष्ट हो जाते हैं तब विषयों की प्रवृत्ति भी रुक जाती है और प्रवृत्ति के नष्ट होने पर तो मनुष्य की कर्म से भी निवृत्ति हो जाती है । कर्म नहीं होता तो प्रारब्ध नहीं बनता और प्रारब्ध के न बनने से जन्म मरण भी नहीं होता । जन्म - मरण ही सुख - दुःख रूप है, जब सुख - दुःख नहीं तो मोक्ष सिद्ध हो गया । इस प्रकार सुख - दुःख का अत्यन्त अभाव हो जाने को ही मोक्ष की प्राप्ति समझना चाहिए 

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