समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः च विशेषापेक्षः विमर्शः संशयः ।।१.१.२३।। यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।१.१.२४।। लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।१.१.२५।। सूत्रार्थ - समानानेकधर्मोपपत्तेः = समान तथा अनेक धर्म को प्राप्ति , विप्रतिपत्तेः = अप्राप्ति , च = और , उपलब्ध्यनुपलब्ध्य = उपलब्धि और अनुपलब्धि की , व्यवस्थातः = व्यवस्था होने से , विशेषापेक्षाः = विशेष धर्म के प्रत्यक्ष न होने से , विमर्शः = एक वस्तु में विपरीत ज्ञान का होना ही , संशय = संदेह है । यम् = जिस , अर्थम् = अर्थ के , अधिकृत्य = अधकार से प्रवर्तते = प्रवृत्ति होती है , तत् = उस अधिकार को , प्रयोजनम् = प्रयोजन कहते हैं । यस्मिन् = जिस , अर्थे = पदार्थ में , लौकिकपरीक्षकाणाम् = सांसारिक और परीक्षा करने वाले मनुष्य की , बुद्धि साम्यम् = बुद्धिसमान पाई जाय , सः = वह , दृष्टान्तः = दृष्टान्त है । व्याख्या - एक ही वस्तु में समान धर्म के प्रत्यक्ष होने और उमके विशेष धर्म अप्रत्यक्ष रहने से उसी वस्तु में दो , परस्पर विरोधी भावों...
अपने लक्ष्य को मेहनत से वरण करना ही प्रत्येक विद्यार्थी का एकमात्र ध्येय होना चाहिए - विकास विद्यालंकार