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Showing posts from October, 2019

अन्वेषण विधि Heuristic Method

अन्वेषण विधि  अन्वेषण विधि को अनुमानी विधि भी कहा जाता है। इस विधि में शिक्षार्थी बिना सहायता प्राप्त किए अपनी समस्या का समाधान ढूंढते है। शिक्षण की यह विधि प्रतिभागियों को सक्रिय रखती है और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है। इस विधि के जनक ‘एच ई आर्मस्ट्रांग’ को माना जाता है। अन्वेषण विधि के गुण यह विधि विद्यार्थीयों में स्वयं सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।  इस शिक्षण विधि की प्रकृति वैज्ञानिक है, अतः यह विधि शिक्षार्थियों में खोजी अभिवृत्ति के विकास में सहायक होती है।  यह विधि ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त पर आधारित है, और इसमें अध्यापक व शिक्षार्थी के मध्य प्रगाढ़ता में अभिवृद्धि होती है।  अन्वेषण विधि के दोष अन्वेषण विधि के माध्यम से शिक्षण कार्य में अधिक समय लगता है, इससे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को नियत समय पर पूर्ण करना कठिन हो जाता है।  शिक्षण की यह विधि छोटी कक्षाओं के लिए उपयुक्त नहीं है।  इस विधि में वास्तविक ज्ञान प्राप्ति पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है।

खेल शिक्षण विधि Game Teaching Method

खेल शिक्षण विधि  शिक्षण में खेलों को सर्वाधिक महत्व ‘फ्रॉबेल’ ने दिया और खेल विधि की दार्शनिक व्याख्या भी दी। इस विधि के जनक ब्रिटेन के गणितज्ञ ‘कोल्ड़वेल कुक’ थे, इन्होंने ही सर्वप्रथम गणित विषय में खेल विधि का उपयोग किया था। यह विधि सभी आयु के विद्यार्थीयों के लिए उपयोगी है। खेल शिक्षण विधि के गुण खेल शिक्षण विधि द्वारा छात्रों में सृजनात्मक कौशलों के साथ-साथ जीवन कौशलों जैसे- समस्या का समाधान करना, तर्क-पूर्ण ढंग से सोचना, सम्प्रेषण शक्ति, टीम भावना आदि का विकास होता है।  इस विधि में छात्रों में स्फूर्ति के साथ-साथ शारीरिक विकास भी होता है।  यह विधि शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक, अधिगम रोचकता, सहजता और ऊर्जा देने वाली होती है।  खेल शिक्षण विधि के दोष इस विधि से बच्चों में खेल की भावना अधिक विकसित होती है, किन्तु उसमें सीखने की दिलचस्पी कम हो जाती है।  इसे पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक स्तर पर अनुपयोगी समझा जाता है। 

निरीक्षण विधि Observation Method

निरीक्षण विधि  शिक्षार्थी केन्द्रित निरीक्षण विधि में विषय के सभी पहलुओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है। यह विधि शिक्षण की एक रोचकपूर्ण पद्धति है, जो विद्यार्थीयों की पूर्ण सक्रियता को सुनिश्चित करती है। यह विधि कला और विज्ञान संकाय दोनों ही विषयों में लोकप्रिय है, किन्तु विज्ञान में इसका प्रचलन सर्वाधिक लोकप्रिय है। निरीक्षण विधि के गुण शिक्षण की यह विधि विद्यार्थीयों में स्वाध्याय की प्रवृत्ति का संचार करती है।  इसमें विद्यार्थी को अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार अध्ययन करने के अवसरों की प्राप्ति होती है।  इसके माध्यम से शिक्षक और शिक्षार्थियों के मध्य सहभागिता के उच्च स्तर स्थापित होते है।  निरीक्षण विधि के दोष निरीक्षण विधि को छोटी कक्षाओं के बच्चों के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।  इस विधि में सीखने के लिए अधिक समय और संसाधन की आवश्यकता होती है।  शिक्षण की इस विधि के द्वारा मानविकी के कुछ विषयों जैसे- राजनीति विज्ञान या नगरिकशास्त्र से सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की शिक्षा देना सम्भव नहीं है। 

निरीक्षण विधि Observation Method

मुक्त अधिगम विधि Open Learning Method

मुक्त अधिगम विधि  मुक्त अधिगम विधि शिक्षण की एक सरल, लचीली और प्रभावी विधि है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी को सीखने के लिए मानवीय संसाधन, सामग्री, उपकरण व आवास की आवश्यकता न्यूनतम स्तर पर होती है या नहीं होती है। इस शिक्षण विधि में विद्यार्थी पर शिक्षण में प्रवेश के लिए किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। मुक्त अधिगम विधि के गुण शिक्षण की मुक्त अधिगम विधि विद्यार्थी को अपने शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करता है।  यह विद्यार्थी को सीखने के लिए सरल और लचीली व्यवस्था उपलब्ध कराता है।  मुक्त अधिगम विधि के दोष शिक्षण की मुक्त अधिगम विधि विषयों के बदलते स्वरूप के लिए उपयुक्त नहीं है।  इसमे समय, विशेषज्ञता और संसाधनों की आश्यकता होती है।  यह विधि छात्रों में भावात्मक शिक्षण उद्देश्यों और मनःप्रेरक स्थिति को उत्पन्न कर पाने में सक्षम नहीं है। 

परस्पर संवादी वीडियो विधि Interactive video method

परस्पर संवादी वीडियो विधि  परस्पर संवादी वीडियो विधि शिक्षण विधि में शिक्षार्थी को किसी विषय से सम्बन्धित जानकारी, क्रमरहित ढंग से आसानी से प्राप्त हो जाती है। यह विधि छात्र को एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर कई विषयों, मुद्दों या समस्याओं की जानकारी और उनके संशोधात्मक उपाय सरलता से आपूर्ति करने में सक्षम है। इस विधि में शिक्षार्थी अपने परिणामों की प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक तत्काल प्राप्त कर सकते है परस्पर संवादी वीडियो विधि के गुण  शिक्षण की यह विधि शिक्षार्थियों में निर्णय लेने की क्षमता में अभिवृद्धि करता है।  इण्टरएक्टिव वीडियो, शिक्षण विधि का एक सरल और पारदर्शी माध्यम है।  इससे प्राप्त शिक्षण सामग्री को टेक्स्ट, ग्राफिक्स, ग्राफिक्स फिल्म और ऑडियो के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।  परस्पर संवादी वीडियो विधि के दोष  शिक्षण की इस विधि में समय के साथ-साथ संसाधनों की भी अधिक आवश्यकता होती है।  इण्टरएक्टिव वीडियो की नियन्त्रण प्रणाली शिक्षार्थियों की पहुँच में नहीं होती, अतः यह विद्यार्थी के विकल्प व पसन्द के अनुसार अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने मे...

कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि Computer Based Teaching Method

कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि  कम्प्यूटर आधारित शिक्षण प्रणाली का उद्देश्य कम्प्यूटर के माध्यम से शिक्षा पद्धति को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करना है। इस विधि के द्वारा सूचना प्रवाह को गत्यात्मक रूप दिया जाता है और शिक्षण प्रणाली को अधिक वैज्ञानितपूर्वक करने पर बल दिया जाता है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि से ऑडियो-वीडियो टेप की प्रस्तुति परम्परागत पुस्तक की तुलना में ज्यादा प्रभावोत्पादक और शीघ्र पहुँच वाली होती है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि में सही जानकारी प्राप्त करने के अधिक विकल्प होते है और शिक्षार्थी की आवश्यकतानुसार प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने की स्थिति भी बनी रहती है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि के गुण इस शिक्षण विधि में अन्य विधियों की तुलना में अधिक लचीलापन और नियन्त्रण की बेहतर सम्भावना होती है।  इस विधि को अनुकरण अभ्यास, मॉडलिंग इत्यादि कार्यों के लिए अधिक प्रभावी ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है।  इसमे सूचना प्रवाह की गतिशीलता और पाठ्य-सामग्री की पर्याप्तता की दशा विद्यमान रहती है।  कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि के दोष शिक्षण ...

सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि Assignment Method

सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि इस विधि का उपयोग विशेष प्रयोजन की पूर्ति हेतु किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थीयों की सुविधा के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को अनेक खण्डों में विभाजित कर दिया जाता है। इस विधि के माध्यम से छात्रों का सर्वेक्षण करना, संख्यात्मक समस्याओं का समाधान करना, अतिरिक्त जानकारी एकत्रित करना, जैसे अनेक कार्यों का सम्पादन किया जाता है। सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि के गुण इस शिक्षण विधि में शिक्षार्थियों को स्वतन्त्र रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है।  यह विधि विद्यार्थीयों के समस्या समाधान क्षमता और विश्लेषणात्मक क्षमता को बढ़ाने में सक्षम है।  इस विधि से छात्रों में रचनात्मक क्षमता का विकास होता है।  इस विधि से विद्यार्थीयों में स्वाध्याय के प्रति रुचि का विकास होता है और उत्तरदायित्व की भावना प्रबल होती है।  यह विधि छात्रों में प्रयोगात्मक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है।  सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि के दोष इस शिक्षण विधि में शिक्षार्थियों के मध्य पाठ्य-सामग्री के अनुकृति अर्...

कार्यक्रम अनुदेश विधि Programme Based Teaching Method

कार्यक्रम अनुदेश विधि  कार्यक्रम अनुदेश विधि शिक्षण की उच्च स्तर पर संचरित पद्धति का एक सामान्य उदाहरण है। यह तार्किक क्रम पर आधारित शिक्षण विधि है, जिसमें छात्र प्रत्येक चरण के पश्चात तुरन्त प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने में सक्षम होता है। कार्यक्रम अनुदेश विधि के गुण शिक्षण की यह विधि शैक्षणिक कार्य की प्रगति को जानने के लिए नियमित प्रतिपुष्टी के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।  इसके माध्यम से शिक्षार्थी की सक्रिय भूमिका को सरलतापूर्वक सुनिश्चित किया जा सकता है।  शिक्षण के कार्यक्रम अनुदेश विधि को किसी भी विषय के अध्ययन-अध्यापन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।  कार्यक्रम अनुदेश विधि के दोष तार्किक और उच्च स्तर पर संचरित प्रणाली होने के कारण यह शिक्षण विधि विद्यार्थीयों के मध्य अरुचिपूर्ण साबित हो सकती है।  इस विधि में कुछ समय उपरान्त शिक्षार्थियों में प्रेरणा का स्तर कम होने की सम्भावना बनी रहती है। 

शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ Student Centred Method

शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ शिक्षार्थी केन्द्रित विधियों के अन्तर्गत शिक्षार्थी का केन्द्रीय स्थान होता है। इसमें विद्यार्थीयों के मनोविज्ञान को समझते हुए शिक्षण की व्यवस्था की जाती है और उनकी समस्याओं का निराकरण किया जाता है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थीयों की अभिरुचि, अभिवृत्ति और क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करना है। इस विधि के द्वारा छात्रों में स्वतन्त्र चिन्तन धार और मनन को जन्म दिया जाता है। शिक्षार्थी केन्द्रित शिक्षण विधि में व्यक्तिगत शिक्षण को महत्व दिया जाता है। इस विधि में शिक्षक का मुख्य ध्यान शिक्षार्थियों की कल्पनाओं, जिज्ञासाओं एवं कठिनाइयों को सुलझाने के प्रति होता है। इस शिक्षण विधि के समर्थक शिक्षा मनोवैज्ञानिक ‘जॉन डीवी’ है। शिक्षार्थी केन्द्रित विधियों का वर्गीकरण 9 प्रकार से किया जाता है, जो निम्न प्रकार से है- 1- कार्यक्रम अनुदेश विधि 2- सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि 3- कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि 4- परस्पर संवादी वीडियो विधि 5- मुक्त अधिगम विधि 6- निरीक्षण विधि 7- खेल शिक्षण विधि 8- अन्वेषण विधि 9- प्रयोगशाला विधि कार्यक्...

टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि Television or video presentation method

टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि  टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि एक अच्छे स्तर की शिक्षण विधि है, जिसके द्वारा शिक्षण गतिविधि को अच्छे तरीके से शिक्षार्थी तक संप्रेषित किया जा सकता है। टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि के गुण शिक्षण की इस विधि द्वारा कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों या अध्यापकों को कक्षा में किसी विषय की प्रस्तुति का अवसर मिलता है, जिससे छात्रों का अधिक लाभ होता है।  यह भौतिक रूप से उपस्थिति के बगैर शिक्षण कार्य को विधिवत संचालन करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।  यह मूलतः वयस्क शिक्षार्थियों के लिए उपयोगी है।  इस विधि के अन्तर्गत चित्रमय व्याख्यान प्रस्तुति और अन्य शिक्षण सहायक सामग्री जैसे; मॉडल, स्लाइड आदि का प्रयोग होता है, जिससे विषय की बोधगम्यता बढ़ जाती है।  इससे दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा मिलता है।  शिक्षण की यह विधि मूलतः खगोल विज्ञान, भूगोल विज्ञान जैसे विषयों के लिए अधिक उपयोगी होती है।  टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि के दोष इस शिक्षण विधि में द्विमार्गीय संचार की सम्भावना नहीं रहती।  इसमें पाठ्य सम्बन्धी जटिल ...

समूह शिक्षण विधि Team teaching Method

समूह शिक्षण विधि समूह शिक्षण विधि बड़े स्तर पर अध्यापन का एक कार्य है, जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक मिलकर कार्य योजना का निर्माण एवं उसका क्रियान्वयन करते है। पैनल चर्चा, विचार गोष्ठी आदि शिक्षण सम्बन्धी क्रियाएं इसी समूह शिक्षण के अन्तर्गत आती है। समूह शिक्षण विधि के गुण यह विधि शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।  इसमें शिक्षण तकनीकों और उपकरणों का उपयोग कर शिक्षार्थी के व्यावहारिक पक्ष को मजबूत किया जाता है।  इस विधि के द्वारा छात्रों को एक ही प्लेटफ़ॉर्म में अच्छे और कुशल शिक्षकों से जुडने का अवसर मिलता है।  समूह शिक्षण विधि के दोष इस शिक्षण विधि से विशेष दक्षतापूर्ण शिक्षकों को ढूँढना जटिल हो जाता है।  इसमें शिक्षण कार्य के लिए अधिक शिक्षकों की आवश्यकता होती है।  इसे सभी विषयों के अध्यापन के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है।  इसमें समय निर्धारण योजना निर्माण और प्रबन्धन के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।

व्याख्यान-प्रदर्शन विधि Lecture Demonstration Method

व्याख्यान-प्रदर्शन विधि भारतीय शिक्षा के अनुरूप यह सर्वाधिक उपयुक्त, व्यवहारिक एवं उपयोगी विधि है। यह विधि किसी भी वस्तु की रचना व कार्यप्रणाली का वास्तविक रूप में ज्ञान करती है। किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु आदि को दृश्यरूप में विद्यार्थी के समक्ष प्रदर्शित कर उसे स्पष्ट करना ही इस विधि का ध्येय होता है। व्याख्यान-प्रदर्शन विधि के गुण यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित शिक्षण विधि है। यह समय व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है। इस विधि सफलता यह है कि कोई वस्तु सुनने की अपेक्षा देखने से ज्यादा समय तक याद रहती है। इस विधि में विद्यार्थी वैज्ञानिक विधि व वैज्ञानिक सत्यता की ओर प्रेरित होता है। व्याख्यान-प्रदर्शन विधि के दोष इस विधि में ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की अवहेलना की जाती है। इसमें विद्यार्थी केवल रुचिकर प्रदर्शन में ही सक्रिय रहता है। इसमें शिक्षक ही सभी कार्य करते है, अतः यह शिक्षक केन्द्रित विधि है। इसमें व्यक्तिगत भिन्नता के सिद्धान्त की अवहेलना की जाती है एवं सभी स्तर के विद्यार्थी एक ही गति से विकास करते है। प्रदर्शन पूर्व तैयारी न होने से या फिर उपकरण खराब होने...

व्याख्यान विधि Lecture Method

व्याख्यान विधि व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है। यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है। थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।” व्याख्यान विधि के गुण यह विषय-वस्तु की क्रमबद्धता की उत्तम विधि है। यह प्रभावशाली व आकर्षक, प्रेरणात्मक शिक्षण विधि है। यह उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी है। यह समय, परिश्रम व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है। इसके द्वारा एक समय में विद्यार्थीयों के बड़े समूह का शिक्षण सम्भव है। यह विद्यार्थीयों को सुनने व ध्यान लगाने में प्रशिक्षित करती है। यह विद्यार्थीयों में तर्कशक्ति का विकास करती है। इसमें विषय का तार्किक क्रम बना रहता है। व्याख्यान विधि के दोष यह छोटी कक्षाओं के लिए अनुपयोगी है। इसमें विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता बने रहते है तथा यह ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की पूर्ण अवहेलना करती है। यह केवल स्मृति केन्द्रित विधि है। इसमें विद्यार्थी अधिक...

शिक्षक केन्द्रित विधियाँ Teacher Centred Methods

शिक्षक केन्द्रित विधियाँ इस विधि में शिक्षक जटिल संप्रत्ययों की व्याख्या करते है तथा शिक्षार्थी उन्हें समझने का प्रयास करते है। इस विधि में अध्यापन के दौरान कक्षा का वातावरण पूर्णतः औपचारिक और कठोर होता है। शिक्षक केन्द्रित विधि को अनुदेशात्मक विधि भी कहा जाता है। शिक्षक केन्द्रित विधियाँ छः प्रकार की होती है, जो निम्न प्रकार है- 1- व्याख्यान विधि 2- व्याख्यान प्रदर्शन विधि 3- समूह शिक्षण विधि 4- टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि 5- समीक्षा नीति सम्बन्धी विधि 6- प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि व्याख्यान विधि  व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है। यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है। थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।” व्याख्यान प्रदर्शन विधि  भारतीय शिक्षा के अनुरूप यह सर्वाधिक उपयुक्त, व्यवहारिक एवं उपयोगी विधि है। यह विधि किसी भी वस्तु की रचना व कार्यप्रण...

उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षण की पद्धति Method of teaching in higher educational institutions

उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षण की पद्धति कक्षा में विषय वस्तु को सरल एवं बोधगम्य बनाने के लिए जिन विधियों का शिक्षकों द्वारा उपयोग किया जाता है, उन्हें शिक्षण विधियाँ कहते है। शिक्षण विधियाँ दो आधारों पर वर्गीकृत होती है- शिक्षक केन्द्रित विधियाँ  शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ  शिक्षक केन्द्रित विधियाँ  इस विधि में शिक्षक जटिल संप्रत्ययों की व्याख्या करते है तथा शिक्षार्थी उन्हें समझने का प्रयास करते है। शिक्षक केन्द्रित विधियाँ छः प्रकार की होती है- 1- व्याख्यान विधि 2- व्याख्यान-प्रदर्शन विधि 3- समूह शिक्षण विधि 4- टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि 5- समीक्षा नीति-सम्बन्धी विधि 6- प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ  इस विधि के अन्तर्गत शिक्षार्थी का केन्द्रीय स्थान होता है। इसमें विद्यार्थी के मनोविज्ञान को समझते हुए शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी की अभिरुचि, अभिवृत्ति और क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करना है। शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ 9 प्रकार की होती है- 1- कार्यक्रम अ...

शिक्षण में निदेशात्मक सुविधाएं Institutional Facilities

शिक्षण में निदेशात्मक सुविधाएं  निदेशात्मक सुविधाएं, शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावित करती है। निदेशात्मक सुविधाओं में मुख्य रूप से संस्थाओं का प्रबन्धन, नीतियाँ व उद्देश्य महत्वपूर्ण होते है। निदेशात्मक सुविधाओं को अध्ययन दो प्रकार से किया जा सकता है- शैक्षिक वातावरण  संस्थागत सुविधाएं  शैक्षिक वातावरण  शैक्षिक वातावरण से तात्पर्य उन सभी व्यवस्थाओं और स्थितियों से है, जो शैक्षिक कार्यों को लागू करते समय प्रभावी रहती है। किसी विद्यालय की स्थापना करते समय जिन-जिन बातों को ध्यान में रखना होता है वे सभी शैक्षिक वातावरण के अन्तर्गत ही आती है। जैसे- विद्यालय आबादी से कितनी दूर है, आस-पास कोई कारखाना तो नहीं है, विद्यालय की जमीन पर कोई विवाद तो नहीं है आदि। संस्थागत सुविधाएं  शिक्षण संस्थाओं के द्वारा विद्यालय में दी जाने वाल वे सभी सुविधाएं जो शिक्षण प्रक्रिया में मूलभूत आवश्यक है, संस्थागत सुविधाएं कहलाती है। जैसे- विद्यालय में बिजली, पानी व शौचालयों की सुविधा, अच्छे व बड़े क्लासरूम, ब्लेकबोर्ड आदि।

शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-दृश्य साधन Audio Visual Aids in the teaching process

शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-दृश्य साधन शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा सुनकर तथा देखकर दोनों प्रकार से ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- टेलीविजन, चलचित्र, स्लाइड, कम्प्यूटर आदि। श्रव्य-दृश्य साधन सात प्रकार के है- 1- टेलीविजन 2- कम्प्यूटर 3- मल्टीमीडिया 4- श्यामपट्ट 5- प्रदर्शन बोर्ड 6- चलचित्र अथवा सिनेमा 7- संवाद सामग्री कम्प्यूटर आधुनिक समय में कम्प्यूटर का श्रव्य-दृश्य शिक्षण सामग्री के रूप में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके माध्यम से शिक्षण सहित मनोरंजन व अन्य पहलुओं को नवीन रूप दिया गया है। कम्प्यूटर को विद्युत मस्तिष्क भी कहा जाता है। मल्टीमीडिया  मल्टीमीडिया एकसाथ की साधनों का संयोजन है। इसमें मीडिया, ऑडियो, वीडियो, फिल्म आदि सभी साधन सम्मिलित किए जाते है। श्यामपट्ट  श्यामपट्ट का शिक्षण में अपना एक विशेष महत्व होता है। इसके माध्यम से शब्दों के प्रतीकों द्वारा शिक्षक विद्यार्थियों में बोधगम्यता का विकास करता है। परम्परागत प्रणालियों में श्यामपट्ट सर्वाधिक उपयोगी सहायक सामग्री है। श्यामपट्ट के द्वार...

शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य-साधन Visual Aids in the teaching process

शिक्षण प्रक्रिया में  दृश्य-साधन शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा देखकर ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- प्रोजेक्टर, फिल्म स्ट्रिप, मानचित्र, श्यामपट्ट, फोटोग्राफ आदि। शिक्षण में दृश्य साधन सात प्रकार से सहायक होते है- 1- रेखाचित्र अथवा चार्ट 2- मानचित्र एवं ग्लोब 3- प्रतिमान 4- स्लाइड्स 5- ग्राफ 6- फ्लैश कार्ड 7- पत्र-पत्रिका  रेखाचित्र अथवा चार्ट  किसी वस्तु के प्रतिमान की अनुपलब्धि में रेखाचित्र या ग्राफ आदि की प्रस्तुति से विषय को समझने में आसानी हो जाती है। रेखाचित्र के माध्यम से छात्रों के समक्ष विषय-वस्तु को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। रेखाचित्र के माध्यम से विद्यार्थियों में समय-ज्ञान का विकास, अमूर्त तथ्य का दृश्य रूप में प्रकटीकरण, सारांश प्रस्तुतीकरण, कलानुक्रमिक विधि से प्रस्तुति, चित्रात्मक संकेत आदि का विकास होता है।   मानचित्र एवं ग्लोब मानचित्र एवं ग्लोब से स्थान की भौगोलिक स्थिति, एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी, क्षेत्रफल आदि का ज्ञान बड़ी सरलता से हो जाता है। मान...

शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-साधन Audio tools in the teaching process

शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा सुनकर ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- फोनोग्राफ रिकॉर्ड, रेडियो प्रसारण तथा मैग्नेटिक टेपरिकॉर्डर आदि। शिक्षण में श्रव्य साधन तीन प्रकार से सहायक होते है- रेडियो  टेप रिकॉर्डर  ग्रामोफोन   रेडियो  रेडियो शिक्षा प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण अंग है। भारत में वर्ष 1936 में सर्वप्रथम आकाशवाणी से समाचार बुलेटिन का प्रसारण हुआ था। वर्ष 1957 में विविध भारती की शुरुआत हुई थी।  टेप रिकॉर्डर  टेपरिकॉर्डर के माध्यम से विषय-वस्तु को विद्यार्थी के लिए आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया जा सकता है। यह निदानात्मक और उपचरात्मक दोनों ही शिक्षण विधियों में प्रयुक्त किया जा सकता है।   ग्रामोफोन  ग्रामोफोन रेडियो की तरह ही शिक्षण का प्राचीन माध्यम है। इसके द्वारा छात्रों को उच्चारण के शुद्धिकरण में सहायता मिलती है।

शिक्षण सहायक सामग्री Teaching Aids or Supports Material

शिक्षक द्वारा पाठ्य-पुस्तक के अध्यापन के दौरान जिन वस्तुओं अथवा सेवाओं को प्रयोग में लाया जाता है, उन्हें शिक्षण सहायक सामग्री कहते है। उत्तम शिक्षण सामग्री शिक्षार्थियों में विद्याध्ययन के प्रति रुचि पैदा करती है और उनमें शिक्षा के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास करती है। कार्टन ए गुड के अनुसार, “कोई भी ऐसी सामग्री जिसके माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को उद्दीप्त किया जा सके अथवा श्रवणेंद्रियों संवेदनाओं के द्वारा आगे बढ़ाया जा सके, वह शिक्षण सामग्री कहलाती है।” शिक्षण में सहायक सामग्री का मुख्य उद्देश्य छात्रों में रोचक तरीकों के माध्यम से शिक्षण प्रदान करना है। शिक्षण सहायक सामग्री को परम्परागत रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया है- श्रव्य साधन  दृश्य साधन  श्रव्य-दृश्य साधन  श्रव्य साधन  इस श्रेणी में ऐसी सहायक सामग्री को रखा जाता है, जिसके द्वारा सुनकर ज्ञान प्राप्त किया जा सके। शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य साधन मुख्यतः तीन प्रकार के होता है- 1- रेडियो 2- टेप रिकार्डर 3- ग्रामोफोन दृश्य साधन  इसमें ऐसी सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनको ...

शिक्षण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक तत्व Factors Affecting Teaching

शिक्षण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत शिक्षण सूत्र एवं शिक्षण को प्रभावित करने वाले कारक आते है।  शिक्षण को प्रभावी बनाने में शिक्षण विधियों एवं शिक्षण सामग्रियों का महत्व होता है।  मन, मस्तिष्क, ज्ञान, आचरण, वातावरण आदि शिक्षण के प्रमुख कारक है, जो शिक्षक के कार्यों को प्रभावित करते है। शिक्षण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शिक्षक एवं शिक्षार्थी की भूमिका निम्नलिखित आधार पर निर्धारित होती है- शिक्षण कौशल  शैक्षणिक योग्यता  विषय-वस्तु की विशेषज्ञता  शिक्षक का अनुभव एवं प्रबन्धन  शिक्षक एवं शैक्षणिक संस्थानों में समन्वय  कार्य का विश्लेषण  1- शिक्षण कौशल कुछ शिक्षकों में शिक्षण कौशल जन्मजात होता है, परन्तु अधिकतर शिक्षकों को यह कौशल अर्जित करना पड़ता है। कुछ प्रमुख शिक्षण कौशल है- प्रश्न पूछना  प्रयोग करना  व्याख्यान देना  समस्या का निदान करना  2- शैक्षणिक योग्यता  शिक्षक की शैक्षणिक योग्यता बहुत महत्वपूर्ण होती है। एक योग्य शिक्षक ही शिक्षण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकता है। एक क...

वैयक्तिक भिन्नता individual Differences

 वैयक्तिक भिन्नता individual Differences       "भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में उनके स्वभाव, बुद्धि, शरीरिक-मानसिक क्षमता के अन्तर को वैयक्तिक भिन्नता कहते है"। शिक्षण के क्षेत्र में वैयक्तिक भिन्नता का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण होता है। वैयक्तिक भिन्नता के विचार का शिक्षण में प्रयोग सर्वप्रथम फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक गाल्टन ने किया था। वैयक्तिक भिन्नता के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों ने कुछ परिभाषाएं दी है जो इस प्रकार है- स्किनर के अनुसार,  “वैयक्तिक भिन्नता से हमारा तात्पर्य व्यक्तित्व के उन सभी पहलुओं से है, जिनका मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है।” जेम्स ड्रेवर के अनुसार,  “कोई व्यक्ति अपने समूह के शारीरिक तथा मानसिक गुणों के औसत से जितनी भिन्नता रखता है, उसे वैयक्तिक भिन्नता कहते है।” टॉयलर के अनुसार , “शरीर के रूप-रंग, आकार, कार्य, गति, बुद्धि, ज्ञान, उपलब्धि, रुचि, अभिरुचि आदि लक्षणों में पाई जाने वाली भिन्नता को वैयक्तिक भिन्नता कहते है।” वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार   वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार निम्नलिखित है- भाषायी भिन्नता  लैंगिक भिन्नता...

वयस्क अध्येता Adult Learner

वयस्क अध्येता Adult Learner      18 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को वयस्क अवस्था में रखा जाता है। वयस्क अध्येता की प्रमुख विशेषताओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझ सकते है- शैक्षिक  सामाजिक  भावनात्मक  संज्ञानात्मक  शैक्षिक        वयस्क अध्येता में स्वयं परीक्षण, निरीक्षण, विचार और तर्क करने की प्रवृत्ति का उचित विकास होता है। वयस्क अध्येता को जिम्मेदारी व सही दिशा के बारे में ज्ञान होता है। अतः वयस्क अध्येता शिक्षण कार्य को अपनी कर्मनिष्ठा तथा उत्तरदायित्व की भावना से करने के प्रति संकल्पित होता है। सामाजिक          वयस्क व्यक्ति सामाजिक परिवेश में अच्छी तरह से समावेशित होता है। वह सामाजिक रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि से बाँधा होता है। वयस्क अध्येता सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए शिक्षण कार्य को निष्ठापूर्वक करने में योग्य होता है। भावनात्मक            वयस्क शिक्षार्थी भनात्मक रूप से सही निर्णय लेने तथा किसी भी कार्य को करने में समर्थ होता है। वह भावनात्मक रूप स...

किशोर अध्येता Teenager Learner

किशोर अध्येता Teenager Learner         12 वर्ष से 18 वर्ष तक के आयु के बालक को किशोर अवस्था में रखा जाता है। किशोर अध्येता की प्रमुख विशेषताओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझ सकते है- शैक्षिक  सामाजिक  भावनात्मक  संज्ञानात्मक  शैक्षिक         किशोर अवस्था में स्वयं परीक्षण, निरीक्षण, विचार और तर्क करने की प्रवृत्ति होती है। इस स्तर पर शिक्षण का स्वरूप मानसिक विकास, शारीरिक विकास एवं व्यक्तिगत भिन्नता के अनुरूप होना चाहिए। सामाजिक           किशोर अवस्था में बालक में जीवन दर्शन, नए अनुभव की इच्छा, निराशा, असफलता आदि का ज्ञान होता है।निराशा और असफलता आदि के कारण ही उसमें आपराधिक प्रवृत्ति का जन्म होता है। इसी अवस्था में उसमें समाजसेवा का भाव भी उत्पन्न होता है। वह सामाजिक बुराइयों पर अपना तर्क देने लगता है। इस प्रकार शिक्षण इस अवस्था में सही मार्गदर्शन में सहायक है। भावनात्मक          किशोर अवस्था में भावनात्मक रूप से शिक्षार्थी किसी भी तथ्य को समझने में जल्दी ...

अध्येता या अधिगमकर्ता Learner

अध्येता या अधिगमकर्ता Learner         अध्येता का अर्थ है- “अध्ययन करने वाला”। अध्येता को शिक्षार्थी, विद्यार्थी या अधिगमकर्ता भी कहते है, जो कि शिक्षण का केन्द्रबिन्दु होता है। शिक्षण की प्रारम्भिक अवस्था में अध्येता अपरिपक्व अवस्था में होता है, किन्तु धीरे-धीरे वह सामाजिक एवं सांस्कृतिक गुणों के माध्यम से परिपक्व अवस्था में आ जाता है। अध्येता में अनुशासन की प्रवृत्ति विद्यालयी शिक्षा के माध्यम से ही विकसित होती है और वह धीरे-धीरे एक आदर्श नागरिक बनने की और अग्रसर होता है। अध्येता की मुख्य विशेषताएं   अधिगमकर्ता का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ स्मरण एवं अनुभव को संगठित व परिष्कृत करना होता है, इस प्रकार अध्येता सदैव एक अर्थपूर्ण लक्ष्य द्वारा निर्देशित रहता है।  अध्येता के अधिगम प्राप्ति का प्रेरणाश्रोत स्वाभाविक रूचियाँ, अभिरुचियाँ एवं अभिवृत्तियाँ होती है, जो उन्हें किसी विषय या क्रियाओं को सीखने या उदासीन रहने को उद्वेलित करता है।  अध्येता की महत्वकांक्षा, उसकी उपलब्धि और प्रेरणा के स्तर पर ही उसकी अधिगम प्रक्रिया की सफलता अथवा असफलता ...

शिक्षण की विशेषताएं Characteristics of Teaching

शिक्षण की विशेषताएं Characteristics of Teaching      शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को ज्ञान, कौशल तथा अभिरुचियों को सिखाने या प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है। शिक्षण की निम्नलिखित विशेषताएं है- शिक्षण एक व्यवसायिक क्रिया है।  शिक्षण एक ऐसी पारस्परिक अन्तःक्रिया है, जिसका  परिचालन विद्यार्थी के मार्गदर्शन और प्रगति के लिए होता है।  शिक्षण विविध में रूपों सम्पन्न हो सकता है; जैसे- औपचारिक, अनौपचारिक, निदेशात्मक एवं अनुदेशात्मक प्रशिक्षण आदि।  शिक्षण का अवलोकन एवं विश्लेषण वैज्ञानिक ढंग से होता है।  शिक्षण में सम्प्रेषण कौशल का आधिपत्य होता है।  शिक्षण, शिक्षक के परिश्रम का परिणाम होता है।  शिक्षण में अपेक्षित सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है।  शिक्षण के द्वारा बौद्धिक चरित्र का निर्माण होता है।  शिक्षण के द्वारा आपसी सहयोग व भ्रातृत्व की भावना का पूर्ण विकास होता है।  शिक्षण की आधारभूत अवश्यकताएं शिक्षण की मूलभूत अवश्यकताएं निम्नलिखित है- शिक्षण प्रक्रिया में मूल रूप से शि...

हण्ट शिक्षण मॉडल Hant Teaching Model

हण्ट शिक्षण मॉडल Hant Teaching Model       हण्ट शिक्षण मॉडल को चिन्तन  स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। चिन्तन के स्तर पर शिक्षक अपने छात्रों में चिन्तन, तर्क तथा कल्पना शक्ति को बढ़ता है , जिससे छात्र इन उपगमों के माध्यम से अपनी समस्या का समाधान कर सके। इस स्तर पर शिक्षण में स्मृति तथा बोध दोनों स्तरों का शिक्षण निहित होता है। इसके बिना चिन्तन-स्तर का शिक्षण सफल नहीं हो सकता।        चिन्तन स्तर का शिक्षण समस्या केन्द्रित होता है, इसमें छात्र को मौलिक चिन्तन करना होता है। इस स्तर पर छात्र विषय-वस्तु के सम्बन्ध में आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते है। इस स्तर पर छात्र सीखे हुये तथ्यों तथा सामान्यीकरण की जाँच करता है और नवीन तथ्यों की खोज करता है।        इस शिक्षण के सम्बन्ध में विग्गी का कथन है कि " चिन्तन स्तर के शिक्षण में कक्षा में एक ऐसा वातावरण विकसित किया जाता है, जो अधिक सजीव, प्रेरणादायक, सक्रिय, आलोचनात्मक, संवेदनशील हो और नवीन एवं मौलिक चिन्तन को खुला अवसर प्रदान करे। इस प्रकार का शिक्षण बोध स्तर के शिक्षण की अपेक्षा ...

मॉरिसन शिक्षण मॉडल Morrison Teaching Model

मॉरिसन शिक्षण मॉडल Morrison Teaching Model मॉरिसन शिक्षण मॉडल को बोध स्तर या समझ स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। शिक्षण के क्षेत्र में बोध एक बहुत व्यापक शब्द है। बोध शब्द को मनोवैज्ञानिको तथा शिक्षाशास्त्रीयों ने कई अर्थों में प्रयुक्त किया है, इसलिए शिक्षक भी इस शब्द को अनिश्चित ढंग से प्रस्तुत करता है। शब्दकोश में भी इसके कई अर्थ दिये गए है, जैसे- अर्थ का प्रत्यक्षीकरण करना, विचारों का बोध होना, गहनता से परिचित होना  प्रकृति एवं स्वभाव को समझना  भाषा में प्रयुक्त होने वाले अर्थ को समझना तथा तथ्य के रूप में स्पष्ट हो जाना।  मौरिस एल विग्गी ने बोध का प्रयोग निम्नलिखित तीन पक्षों को स्पष्ट करने के लिए किया है- 1. विभिन्न तथ्यों में सम्बन्ध देखना 2. तथ्यों को संचालन के रूप में देखना 3. तथ्यों के सम्बन्ध तथा संचालन दोनों को समन्वित करना        बोध स्तर के शिक्षण के लिए यह आवश्यक है कि इससे पूर्व स्मृति स्तर पर शिक्षण हो चुका हो। इसके बिना बोध स्तर शिक्षण सफल नहीं हो सकता। शिक्षक इस स्तर पर छात्रों को सामान्यीकरण सिद्धांतों तथा तथ्यों क...

हरबर्ट शिक्षण मॉडल Herbert Teaching Model

हरबर्ट शिक्षण मॉडल Herbert Teaching Model       हरबर्ट शिक्षण मॉडल  को स्मृति स्तर या स्मरण शक्ति स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। स्मृति स्तर के शिक्षण की क्रियाएँ ऐसे अधिगम की परिस्थितियों को उत्पन्न करती हैं, जिसमें विषयवस्तु के तथ्यों को छात्र केवल कण्ठस्थ कर सके। इस स्तर पर, प्रत्यास्मरण की क्रिया पर जोर दिया जाता है। इस स्तर पर, सार्थक तथा सम्बन्धित पाठ्य-वस्तु आसानी से याद हो जाती है, जबकि निरर्थक वस्तुओं को याद करने में कठिनाई होती है। तथ्यों को कण्ठस्थ करने की क्षमता का बुद्धि से सीधा सम्बन्ध नहीं होता है। एक मन्द बुद्धि बालक भी तथ्यों को कण्ठस्थ करके अधिक समय तक याद रख सकता है तथा इसके विपरीत भी हो सकता है।      स्मृति स्तर के शिक्षण की निष्पत्ति का बुद्धि से सह-सम्बन्ध नहीं होता है, परन्तु इस स्तर के शिक्षण से बौद्धिक व्यवहार के विकास में सहायता मिलती है। समस्या के समाधान में स्मृति स्तर भी सहायक होता है। कण्ठस्थ किए गए तथ्यों का छात्रों के विकास में ही योगदान होता है। कविता, पाठ, शब्दार्थ और उनका अभ्यास, संस्कृत में रूप, पहाड़े,...

शिक्षण के स्तर Level of teaching

शिक्षण के स्तर Level of teaching           शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है या कह सकते हैं कि यह कक्षा में विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करने की एक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य छात्रा को सोचने के लिए प्रेरित करना है। शिक्षण और सीखने का घनिष्ट सम्बन्ध है, यहाँ तक कि शिक्षण सीखने का ही एक प्रत्यय माना जाता है, एक ही पाठ्य-वस्तु को विद्यालय के विभिन्न स्तरों पर पढ़ाया जाता है, क्योंकि पाट्य वस्तु का अपना स्वरूप होता है, जिससे शिक्षण के विभिन्न उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है और अधिगम के विभिन्न स्तरों को प्रभावित किया जाता है। शिक्षण के उद्देश्य अत्यन्त स्पष्ट होने चाहिए तभी शिक्षक प्रभावशाली साधनों का प्रयोग कर इसे अधिक शक्तिवान बना सकता है। शिक्षण की प्रक्रिया की परिस्थितियों को हम एक सतत क्रम, विचारशील क्रियाओं की अवस्थाओं या स्तरों में विभाजित कर सकते हैं। नीचे की अवस्थाएँ उच्च अवस्थाओं के लिए पूरक का कार्य करती हैं; जैसे—उद्देश्यों की प्राप्ति में ज्ञान उद्देश्यपूर्वक का कार्य करता है। शिक्षण के इस सतत क्षेत्र को प्रमुख रूप से तीन स्तरों में विभाजित किया गया ह...

गैग्ने और ब्रिग्स द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Gagnes and Briggs Classification

गैग्ने और ब्रिग्स द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Gagnes and Briggs Classification गैग्ने और ब्रिग्स द्वारा शिक्षण के उद्देश्यों को निम्नलिखित स्तरों पर विभाजित किया गया है- ज्ञानात्मक रणनीतियाँ बौद्धिक कौशल मनोदृष्टि मौखिक सूचना संचालन तन्त्र और शारीरिक क्षमता ज्ञानात्मक रणनीतियाँ        इस श्रेणी में किसी व्यक्ति के स्वयं के शिक्षण, स्मरण शक्ति एवं विचार कौशल को विकसित करने हेतु नई तकनीकों एवं विधियों को समावेशित किया जाता है। बौद्धिक कौशल बौद्धिक कौशल किसी समस्या को सुलझाने, सीखने की अवधारणा और नियम सीखने में महत्वपूर्ण होता है। मनोदृष्टि यह किसी व्यक्ति की आंतरिक या मानसिक स्थिति को व्यक्त करता है। मौखिक सूचना मौखिक सूचना का उपयोग किसी व्यक्ति द्वारा ज्ञान का आयोजन करने के सन्दर्भ में होता है। संचालन तन्त्र और शारीरिक क्षमता इस स्तर पर मस्तिष्क, तन्त्रिका प्रणाली और स्नायु तन्त्र एकसाथ कार्य करते है एवं उनमें सामंजस्य कैसे स्थापित करना है, इसके बारे जानकारी दी जाती है। =====================

ब्लूम द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Bloom's Classification

ब्लूम द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Bloom's Classification         ब्लूम ने शिक्षण को तीन भागों में बाँटा, जिसे अंग्रेजी भाषा में 3H भी कहा गया है। ये 3H है- Head (ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र) Heart (भावात्मक ज्ञान क्षेत्र) Hand (मनोसंचालित ज्ञान क्षेत्र) Head (ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र)- ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र बौद्धिक क्षमता के विकास से संदर्भित है, इसे 6 मुख्य स्तर पर विभाजित किया गया है- ज्ञान --ज्ञान का सम्बन्ध वस्तु की जानकारी से है। बोध -बोध का अर्थ समझने की क्षमता से है। उपयोग -यह स्तर अमूर्त ज्ञान को मूर्त रूप में लाना है। विश्लेषण -इस स्तर में प्राप्त सूचना को घटकों में विभाजन है। संश्लेषण -यह सूचना घटकों का समावेशित स्तर है। मूल्यांकन  -मूल्यांकन सतत प्रक्रिया के रूप में होता है। यह विशेष प्रयोजनों में प्रयुक्त तरीके और सामग्री के बारे में किया गया निर्णय है। Heart (भावात्मक ज्ञान क्षेत्र)    इस ज्ञान क्षेत्र में मनोभाव या मनोदृष्टि प्रेरणा, शिक्षण की सहभागिता, अनुशासन एवं इनके जैसे अन्य मूल्यों को समावेशित किया जाता है। इसके भ...

शिक्षण के उद्देश्य Objectives of Teaching

शिक्षण के उद्देश्य Objectives of Teaching        शिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिक्षार्थियों में अधिगम उत्पन्न करना है। शिक्षण के विभिन्न उद्देश्यों को दिये गए फ्लो चार्ट की सहायता से समझा जा सकता है- ब्लूम द्वारा शिक्षण का वर्गीकरण ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र ज्ञान बोध उपयोग विश्लेषण संश्लेषण मूल्यांकन भावात्मक ज्ञान क्षेत्र आकलन आग्रहण प्रतिक्रिया संयोजित करना निरूपण मनोसंचलित ज्ञान क्षेत्र हस्तकौशल प्रतिरूपता स्पष्ट अभिव्यक्ति परिशुद्धता प्राकृतिकरण गैग्ने और ब्रिग्स के द्वारा वर्गीकरण ज्ञानात्मक रणनीतियाँ बौद्धिक कौशल मनोदृष्टि मौखिक सूचना संचालन तन्त्र और शारीरिक क्षमता ===============

शिक्षण की प्रकृति Nature of Teaching

शिक्षण की प्रकृति Nature of Teaching          शिक्षण की प्रकृति सकारात्मक होती है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी में संज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक पक्षों को अभिप्रेरित किया जाता है। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जिसके गहन विश्लेषण पर ही शिक्षार्थी को शिक्षण की प्रकृति का बोध होता है।  शिक्षण की प्रकृति को निम्न रूपों में समझा जा सकता है- शिक्षण कला एवं विज्ञान है।  शिक्षण एक त्रिध्रुवीय प्रक्रिया है, जिसके तीन ध्रुव शिक्षक, बालक और पाठ्यक्रम है।   शिक्षण उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।  शिक्षण अन्तःप्रक्रिया है।  शिक्षण उपचरात्मक प्रक्रिया है।  शिक्षण विकासात्मक प्रक्रिया है।  शिक्षण एक भाषायी प्रक्रिया है।       शिक्षण में विद्यार्थियों की पाठ्यचर्या तथा विषयवस्तु का विश्लेषण तार्किक आधार पर ही किया जाता है। शिक्षण की निर्देशन प्रक्रिया का प्रारूप छः स्तरों पर किया जाता है, जो कि निम्नलिखित है- अन्वेषण  संलग्नता  विस्तार व्याख्या  मूल्यांकन...

शिक्षण की अवधारणा Concept of Teaching

शिक्षण की अवधारणा Concept of Teaching          शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें बहुत से कारक शामिल होते है, और सीखने वाला इस प्रक्रिया के माध्यम से ज्ञान और कौशल को अर्जित करता है।  शिक्षण का सामान्य अर्थ ‘शिक्षा प्रदान करना है’ जबकि इसका शाब्दिक अर्थ ‘सीखना या सीख देना है’। यह एक सामाजिक प्रक्रिया है, जो शिक्षण के मानवीय मूल्यों को विकसित करती है। विस्तृत रूप से शिक्षा का तात्पर्य औपचारिक या अनौपचारिक रूप से आजीवन सीखते-सिखाते रहना है, किन्तु संकुचित रूप से शिक्षा का अर्थ औपचारिक रूप से किसी शिक्षण संस्थान में शिक्षा ग्रहण करने से है।        वर्तमान शिक्षा परिवेश में शिक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में अधिगंम उत्पन्न करके सिखाना है न की बलपूर्वक ज्ञान को मस्तिष्क में बिठाना। शिक्षण के द्वारा शिक्षार्थी नवीन ज्ञान का अर्जन करता है, इस सन्दर्भ में विद्वानों ने शिक्षण की निम्नलिखित परिभाषाएं दी है- रियान्स के अनुसार, “दूसरों को सीखाने, दिशा-निर्देश देने एवं उन्हें निर्देशित करने की प्रक्रिया ही शिक्षण है”। गेज के अनुसार, “शिक्षण एक पा...