अन्वेषण विधि
अन्वेषण विधि को अनुमानी विधि भी कहा जाता है। इस विधि में शिक्षार्थी बिना सहायता प्राप्त किए अपनी समस्या का समाधान ढूंढते है। शिक्षण की यह विधि प्रतिभागियों को सक्रिय रखती है और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है। इस विधि के जनक ‘एच ई आर्मस्ट्रांग’ को माना जाता है। अन्वेषण विधि के गुण
यह विधि विद्यार्थीयों में स्वयं सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।
इस शिक्षण विधि की प्रकृति वैज्ञानिक है, अतः यह विधि शिक्षार्थियों में खोजी अभिवृत्ति के विकास में सहायक होती है।
यह विधि ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त पर आधारित है, और इसमें अध्यापक व शिक्षार्थी के मध्य प्रगाढ़ता में अभिवृद्धि होती है।
अन्वेषण विधि के दोष
अन्वेषण विधि के माध्यम से शिक्षण कार्य में अधिक समय लगता है, इससे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को नियत समय पर पूर्ण करना कठिन हो जाता है।
शिक्षण की यह विधि छोटी कक्षाओं के लिए उपयुक्त नहीं है।
इस विधि में वास्तविक ज्ञान प्राप्ति पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है।
खेल शिक्षण विधि
शिक्षण में खेलों को सर्वाधिक महत्व ‘फ्रॉबेल’ ने दिया और खेल विधि की दार्शनिक व्याख्या भी दी। इस विधि के जनक ब्रिटेन के गणितज्ञ ‘कोल्ड़वेल कुक’ थे, इन्होंने ही सर्वप्रथम गणित विषय में खेल विधि का उपयोग किया था। यह विधि सभी आयु के विद्यार्थीयों के लिए उपयोगी है। खेल शिक्षण विधि के गुण
खेल शिक्षण विधि द्वारा छात्रों में सृजनात्मक कौशलों के साथ-साथ जीवन कौशलों जैसे- समस्या का समाधान करना, तर्क-पूर्ण ढंग से सोचना, सम्प्रेषण शक्ति, टीम भावना आदि का विकास होता है।
इस विधि में छात्रों में स्फूर्ति के साथ-साथ शारीरिक विकास भी होता है।
यह विधि शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक, अधिगम रोचकता, सहजता और ऊर्जा देने वाली होती है।
खेल शिक्षण विधि के दोष
इस विधि से बच्चों में खेल की भावना अधिक विकसित होती है, किन्तु उसमें सीखने की दिलचस्पी कम हो जाती है।
इसे पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक स्तर पर अनुपयोगी समझा जाता है।
निरीक्षण विधि
शिक्षार्थी केन्द्रित निरीक्षण विधि में विषय के सभी पहलुओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है। यह विधि शिक्षण की एक रोचकपूर्ण पद्धति है, जो विद्यार्थीयों की पूर्ण सक्रियता को सुनिश्चित करती है। यह विधि कला और विज्ञान संकाय दोनों ही विषयों में लोकप्रिय है, किन्तु विज्ञान में इसका प्रचलन सर्वाधिक लोकप्रिय है। निरीक्षण विधि के गुण
शिक्षण की यह विधि विद्यार्थीयों में स्वाध्याय की प्रवृत्ति का संचार करती है।
इसमें विद्यार्थी को अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार अध्ययन करने के अवसरों की प्राप्ति होती है।
इसके माध्यम से शिक्षक और शिक्षार्थियों के मध्य सहभागिता के उच्च स्तर स्थापित होते है।
निरीक्षण विधि के दोष
निरीक्षण विधि को छोटी कक्षाओं के बच्चों के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।
इस विधि में सीखने के लिए अधिक समय और संसाधन की आवश्यकता होती है।
शिक्षण की इस विधि के द्वारा मानविकी के कुछ विषयों जैसे- राजनीति विज्ञान या नगरिकशास्त्र से सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की शिक्षा देना सम्भव नहीं है।
मुक्त अधिगम विधि
मुक्त अधिगम विधि शिक्षण की एक सरल, लचीली और प्रभावी विधि है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी को सीखने के लिए मानवीय संसाधन, सामग्री, उपकरण व आवास की आवश्यकता न्यूनतम स्तर पर होती है या नहीं होती है। इस शिक्षण विधि में विद्यार्थी पर शिक्षण में प्रवेश के लिए किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। मुक्त अधिगम विधि के गुण
शिक्षण की मुक्त अधिगम विधि विद्यार्थी को अपने शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करता है।
यह विद्यार्थी को सीखने के लिए सरल और लचीली व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
मुक्त अधिगम विधि के दोष
शिक्षण की मुक्त अधिगम विधि विषयों के बदलते स्वरूप के लिए उपयुक्त नहीं है।
इसमे समय, विशेषज्ञता और संसाधनों की आश्यकता होती है।
यह विधि छात्रों में भावात्मक शिक्षण उद्देश्यों और मनःप्रेरक स्थिति को उत्पन्न कर पाने में सक्षम नहीं है।
परस्पर संवादी वीडियो विधि
परस्पर संवादी वीडियो विधि शिक्षण विधि में शिक्षार्थी को किसी विषय से सम्बन्धित जानकारी, क्रमरहित ढंग से आसानी से प्राप्त हो जाती है। यह विधि छात्र को एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर कई विषयों, मुद्दों या समस्याओं की जानकारी और उनके संशोधात्मक उपाय सरलता से आपूर्ति करने में सक्षम है। इस विधि में शिक्षार्थी अपने परिणामों की प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक तत्काल प्राप्त कर सकते है परस्पर संवादी वीडियो विधि के गुण
शिक्षण की यह विधि शिक्षार्थियों में निर्णय लेने की क्षमता में अभिवृद्धि करता है।
इण्टरएक्टिव वीडियो, शिक्षण विधि का एक सरल और पारदर्शी माध्यम है।
इससे प्राप्त शिक्षण सामग्री को टेक्स्ट, ग्राफिक्स, ग्राफिक्स फिल्म और ऑडियो के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।
परस्पर संवादी वीडियो विधि के दोष
शिक्षण की इस विधि में समय के साथ-साथ संसाधनों की भी अधिक आवश्यकता होती है।
इण्टरएक्टिव वीडियो की नियन्त्रण प्रणाली शिक्षार्थियों की पहुँच में नहीं होती, अतः यह विद्यार्थी के विकल्प व पसन्द के अनुसार अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं होती।
इस विधि में शिक्षार्थी अपनी प्राथमिकता और जिज्ञासाओं पर नियन्त्रण रखता है, जिससे यह शिक्षार्थियों के सभी प्रकार के सन्देहों को भी शान्त नहीं कर पाती।
कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि
कम्प्यूटर आधारित शिक्षण प्रणाली का उद्देश्य कम्प्यूटर के माध्यम से शिक्षा पद्धति को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करना है। इस विधि के द्वारा सूचना प्रवाह को गत्यात्मक रूप दिया जाता है और शिक्षण प्रणाली को अधिक वैज्ञानितपूर्वक करने पर बल दिया जाता है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि से ऑडियो-वीडियो टेप की प्रस्तुति परम्परागत पुस्तक की तुलना में ज्यादा प्रभावोत्पादक और शीघ्र पहुँच वाली होती है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि में सही जानकारी प्राप्त करने के अधिक विकल्प होते है और शिक्षार्थी की आवश्यकतानुसार प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने की स्थिति भी बनी रहती है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि के गुण
इस शिक्षण विधि में अन्य विधियों की तुलना में अधिक लचीलापन और नियन्त्रण की बेहतर सम्भावना होती है।
इस विधि को अनुकरण अभ्यास, मॉडलिंग इत्यादि कार्यों के लिए अधिक प्रभावी ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है।
इसमे सूचना प्रवाह की गतिशीलता और पाठ्य-सामग्री की पर्याप्तता की दशा विद्यमान रहती है।
कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि के दोष
शिक्षण की यह प्रणाली अवैयक्तिक और महंगी है, जो सभी की पहुँच की सीमा में नहीं है।
इस विधि से शिक्षण प्रणाली के लिए सुव्यवस्थित संरचना का होना अत्यन्त आवश्यक है, अन्यथा प्रणाली विफल हो जाएगी।
सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि
इस विधि का उपयोग विशेष प्रयोजन की पूर्ति हेतु किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थीयों की सुविधा के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को अनेक खण्डों में विभाजित कर दिया जाता है। इस विधि के माध्यम से छात्रों का सर्वेक्षण करना, संख्यात्मक समस्याओं का समाधान करना, अतिरिक्त जानकारी एकत्रित करना, जैसे अनेक कार्यों का सम्पादन किया जाता है। सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि के गुण
इस शिक्षण विधि में शिक्षार्थियों को स्वतन्त्र रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है।
यह विधि विद्यार्थीयों के समस्या समाधान क्षमता और विश्लेषणात्मक क्षमता को बढ़ाने में सक्षम है।
इस विधि से छात्रों में रचनात्मक क्षमता का विकास होता है।
इस विधि से विद्यार्थीयों में स्वाध्याय के प्रति रुचि का विकास होता है और उत्तरदायित्व की भावना प्रबल होती है।
यह विधि छात्रों में प्रयोगात्मक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है।
सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि के दोष
इस शिक्षण विधि में शिक्षार्थियों के मध्य पाठ्य-सामग्री के अनुकृति अर्थात कॉपी की सम्भावना प्रबल होती है और नकल करने की प्रवृत्ति का विकास होता है।
यह विधि छोटी कक्षाओं के लिए उपयुक्त नहीं है।
इस विधि में शिक्षक पर अतिरिक्त कार्यभार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
कार्यक्रम अनुदेश विधि
कार्यक्रम अनुदेश विधि शिक्षण की उच्च स्तर पर संचरित पद्धति का एक सामान्य उदाहरण है।
यह तार्किक क्रम पर आधारित शिक्षण विधि है, जिसमें छात्र प्रत्येक चरण के पश्चात तुरन्त प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने में सक्षम होता है। कार्यक्रम अनुदेश विधि के गुण
शिक्षण की यह विधि शैक्षणिक कार्य की प्रगति को जानने के लिए नियमित प्रतिपुष्टी के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
इसके माध्यम से शिक्षार्थी की सक्रिय भूमिका को सरलतापूर्वक सुनिश्चित किया जा सकता है।
शिक्षण के कार्यक्रम अनुदेश विधि को किसी भी विषय के अध्ययन-अध्यापन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
कार्यक्रम अनुदेश विधि के दोष
तार्किक और उच्च स्तर पर संचरित प्रणाली होने के कारण यह शिक्षण विधि विद्यार्थीयों के मध्य अरुचिपूर्ण साबित हो सकती है।
इस विधि में कुछ समय उपरान्त शिक्षार्थियों में प्रेरणा का स्तर कम होने की सम्भावना बनी रहती है।
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियों के अन्तर्गत शिक्षार्थी का केन्द्रीय स्थान होता है। इसमें विद्यार्थीयों के मनोविज्ञान को समझते हुए शिक्षण की व्यवस्था की जाती है और उनकी समस्याओं का निराकरण किया जाता है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थीयों की अभिरुचि, अभिवृत्ति और क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करना है। इस विधि के द्वारा छात्रों में स्वतन्त्र चिन्तन धार और मनन को जन्म दिया जाता है। शिक्षार्थी केन्द्रित शिक्षण विधि में व्यक्तिगत शिक्षण को महत्व दिया जाता है। इस विधि में शिक्षक का मुख्य ध्यान शिक्षार्थियों की कल्पनाओं, जिज्ञासाओं एवं कठिनाइयों को सुलझाने के प्रति होता है। इस शिक्षण विधि के समर्थक शिक्षा मनोवैज्ञानिक ‘जॉन डीवी’ है।
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियों का वर्गीकरण 9 प्रकार से किया जाता है, जो निम्न प्रकार से है-
1- कार्यक्रम अनुदेश विधि
2- सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि
3- कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि
4- परस्पर संवादी वीडियो विधि
5- मुक्त अधिगम विधि
6- निरीक्षण विधि
7- खेल शिक्षण विधि
8- अन्वेषण विधि
9- प्रयोगशाला विधि कार्यक्रम अनुदेश विधि
कार्यक्रम अनुदेश विधि शिक्षण की उच्च स्तर पर संचरित पद्धति का एक सामान्य उदाहरण है। यह तार्किक क्रम पर आधारित शिक्षण विधि है, जिसमें छात्र प्रत्येक चरण के पश्चात तुरन्त प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने में सक्षम होता है। सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि
इस विधि का उपयोग विशेष प्रयोजन की पूर्ति हेतु किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थीयों की सुविधा के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को अनेक खण्डों में विभाजित कर दिया जाता है। इस विधि के माध्यम से छात्रों का सर्वेक्षण करना, संख्यात्मक समस्याओं का समाधान करना, अतिरिक्त जानकारी एकत्रित करना, जैसे अनेक कार्यों का सम्पादन किया जाता है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि
कम्प्यूटर आधारित शिक्षण प्रणाली का उद्देश्य कम्प्यूटर के माध्यम से शिक्षा पद्धति को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करना है। इस विधि के द्वारा सूचना प्रवाह को गत्यात्मक रूप दिया जाता है और शिक्षण प्रणाली को अधिक वैज्ञानितपूर्वक करने पर बल दिया जाता है। परस्पर संवादी वीडियो विधि
परस्पर संवादी वीडियो विधि शिक्षण विधि में शिक्षार्थी को किसी विषय से सम्बन्धित जानकारी, क्रमरहित ढंग से आसानी से प्राप्त हो जाती है। यह विधि छात्र को एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर कई विषयों, मुद्दों या समस्याओं की जानकारी और उनके संशोधात्मक उपाय सरलता से आपूर्ति करने में सक्षम है। इस विधि में शिक्षार्थी अपने परिणामों की प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक तत्काल प्राप्त कर सकते है मुक्त अधिगम विधि
मुक्त अधिगम विधि शिक्षण की एक सरल, लचीली और प्रभावी विधि है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी को सीखने के लिए मानवीय संसाधन, सामग्री, उपकरण व आवास की आवश्यकता न्यूनतम स्तर पर होती है या नहीं होती है। इस शिक्षण विधि में विद्यार्थी पर शिक्षण में प्रवेश के लिए किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। निरीक्षण विधि
शिक्षार्थी केन्द्रित निरीक्षण विधि में विषय के सभी पहलुओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है। यह विधि शिक्षण की एक रोचकपूर्ण पद्धति है, जो विद्यार्थीयों की पूर्ण सक्रियता को सुनिश्चित करती है। यह विधि कला और विज्ञान संकाय दोनों ही विषयों में लोकप्रिय है, किन्तु विज्ञान में इसका प्रचलन सर्वाधिक लोकप्रिय है। खेल शिक्षण विधि
शिक्षण में खेलों को सर्वाधिक महत्व ‘फ्रॉबेल’ ने दिया और खेल विधि की दार्शनिक व्याख्या भी दी। इस विधि के जनक ब्रिटेन के गणितज्ञ ‘कोल्ड़वेल कुक’ थे, इन्होंने ही सर्वप्रथम गणित विषय में खेल विधि का उपयोग किया था। यह विधि सभी आयु के विद्यार्थीयों के लिए उपयोगी है। अन्वेषण विधि
अन्वेषण विधि को अनुमानी विधि भी कहा जाता है। इस विधि में शिक्षार्थी बिना सहायता प्राप्त किए अपनी समस्या का समाधान ढूंढते है। शिक्षण की यह विधि प्रतिभागियों को सक्रिय रखती है और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है। इस विधि के जनक ‘एच ई आर्मस्ट्रांग’ को माना जाता है। प्रयोगशाला विधि
यह विधि खोज के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसके द्वारा किसी परिमाण पर पहुँचने के लिए खोज द्वारा तथ्यों का उल्लेख होता है। इस विधि में छात्र प्रयोगशाला में प्रयोग द्वारा स्वयं ही निष्कर्ष निकालकर अवधारणा विकसित करते है। यह विधि आगमन विधि का ही वृहत एवं विकसित प्रयोगात्मक स्वरूप है।
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि एक अच्छे स्तर की शिक्षण विधि है, जिसके द्वारा शिक्षण गतिविधि को अच्छे तरीके से शिक्षार्थी तक संप्रेषित किया जा सकता है। टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि के गुण
शिक्षण की इस विधि द्वारा कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों या अध्यापकों को कक्षा में किसी विषय की प्रस्तुति का अवसर मिलता है, जिससे छात्रों का अधिक लाभ होता है।
यह भौतिक रूप से उपस्थिति के बगैर शिक्षण कार्य को विधिवत संचालन करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
यह मूलतः वयस्क शिक्षार्थियों के लिए उपयोगी है।
इस विधि के अन्तर्गत चित्रमय व्याख्यान प्रस्तुति और अन्य शिक्षण सहायक सामग्री जैसे; मॉडल, स्लाइड आदि का प्रयोग होता है, जिससे विषय की बोधगम्यता बढ़ जाती है।
इससे दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा मिलता है।
शिक्षण की यह विधि मूलतः खगोल विज्ञान, भूगोल विज्ञान जैसे विषयों के लिए अधिक उपयोगी होती है।
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि के दोष
इस शिक्षण विधि में द्विमार्गीय संचार की सम्भावना नहीं रहती।
इसमें पाठ्य सम्बन्धी जटिल प्रसारण अवधि को समायोजित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
समूह शिक्षण विधि
समूह शिक्षण विधि बड़े स्तर पर अध्यापन का एक कार्य है, जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक मिलकर कार्य योजना का निर्माण एवं उसका क्रियान्वयन करते है।
पैनल चर्चा, विचार गोष्ठी आदि शिक्षण सम्बन्धी क्रियाएं इसी समूह शिक्षण के अन्तर्गत आती है। समूह शिक्षण विधि के गुण
यह विधि शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
इसमें शिक्षण तकनीकों और उपकरणों का उपयोग कर शिक्षार्थी के व्यावहारिक पक्ष को मजबूत किया जाता है।
इस विधि के द्वारा छात्रों को एक ही प्लेटफ़ॉर्म में अच्छे और कुशल शिक्षकों से जुडने का अवसर मिलता है।
समूह शिक्षण विधि के दोष
इस शिक्षण विधि से विशेष दक्षतापूर्ण शिक्षकों को ढूँढना जटिल हो जाता है।
इसमें शिक्षण कार्य के लिए अधिक शिक्षकों की आवश्यकता होती है।
इसे सभी विषयों के अध्यापन के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है।
इसमें समय निर्धारण योजना निर्माण और प्रबन्धन के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।
व्याख्यान-प्रदर्शन विधि
भारतीय शिक्षा के अनुरूप यह सर्वाधिक उपयुक्त, व्यवहारिक एवं उपयोगी विधि है। यह विधि किसी भी वस्तु की रचना व कार्यप्रणाली का वास्तविक रूप में ज्ञान करती है। किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु आदि को दृश्यरूप में विद्यार्थी के समक्ष प्रदर्शित कर उसे स्पष्ट करना ही इस विधि का ध्येय होता है। व्याख्यान-प्रदर्शन विधि के गुण
यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित शिक्षण विधि है।
यह समय व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है।
इस विधि सफलता यह है कि कोई वस्तु सुनने की अपेक्षा देखने से ज्यादा समय तक याद रहती है।
इस विधि में विद्यार्थी वैज्ञानिक विधि व वैज्ञानिक सत्यता की ओर प्रेरित होता है। व्याख्यान-प्रदर्शन विधि के दोष
इस विधि में ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की अवहेलना की जाती है।
इसमें विद्यार्थी केवल रुचिकर प्रदर्शन में ही सक्रिय रहता है।
इसमें शिक्षक ही सभी कार्य करते है, अतः यह शिक्षक केन्द्रित विधि है।
इसमें व्यक्तिगत भिन्नता के सिद्धान्त की अवहेलना की जाती है एवं सभी स्तर के विद्यार्थी एक ही गति से विकास करते है।
प्रदर्शन पूर्व तैयारी न होने से या फिर उपकरण खराब होने से शिक्षण कार्य रुक जाता है।
शिक्षक द्वारा कठिन भाषा का प्रयोग किए जान, इस विधि को कमजोर बना देता है।
इस विधि में प्रमुख तथ्यों के स्थान पर आंशिक तथ्यों पर अधिक बल दिया जाता है।
व्याख्यान विधि
व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है।
यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है।
थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।” व्याख्यान विधि के गुण
यह विषय-वस्तु की क्रमबद्धता की उत्तम विधि है।
यह प्रभावशाली व आकर्षक, प्रेरणात्मक शिक्षण विधि है।
यह उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी है।
यह समय, परिश्रम व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है।
इसके द्वारा एक समय में विद्यार्थीयों के बड़े समूह का शिक्षण सम्भव है।
यह विद्यार्थीयों को सुनने व ध्यान लगाने में प्रशिक्षित करती है।
यह विद्यार्थीयों में तर्कशक्ति का विकास करती है। इसमें विषय का तार्किक क्रम बना रहता है। व्याख्यान विधि के दोष
यह छोटी कक्षाओं के लिए अनुपयोगी है।
इसमें विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता बने रहते है तथा यह ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की पूर्ण अवहेलना करती है।
यह केवल स्मृति केन्द्रित विधि है।
इसमें विद्यार्थी अधिक समय तक ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते, जिससे उनमें शिक्षण के प्रति रुचि कम हो जाती है। इसमें सैद्धान्तिक ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है, यह एक प्रभुत्ववादी विधि है।
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ
इस विधि में शिक्षक जटिल संप्रत्ययों की व्याख्या करते है तथा शिक्षार्थी उन्हें समझने का प्रयास करते है। इस विधि में अध्यापन के दौरान कक्षा का वातावरण पूर्णतः औपचारिक और कठोर होता है। शिक्षक केन्द्रित विधि को अनुदेशात्मक विधि भी कहा जाता है।
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ छः प्रकार की होती है, जो निम्न प्रकार है-
1- व्याख्यान विधि
2- व्याख्यान प्रदर्शन विधि
3- समूह शिक्षण विधि
4- टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
5- समीक्षा नीति सम्बन्धी विधि
6- प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि व्याख्यान विधि
व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है। यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है। थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।” व्याख्यान प्रदर्शन विधि
भारतीय शिक्षा के अनुरूप यह सर्वाधिक उपयुक्त, व्यवहारिक एवं उपयोगी विधि है। यह विधि किसी भी वस्तु की रचना व कार्यप्रणाली का वास्तविक रूप में ज्ञान करती है। किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु आदि को दृश्यरूप में विद्यार्थी के समक्ष प्रदर्शित कर उसे स्पष्ट करना ही इस विधि का ध्येय होता है। समूह शिक्षण विधि
समूह शिक्षण विधि बड़े स्तर पर अध्यापन का एक कार्य है, जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक मिलकर कार्य योजना का निर्माण एवं उसका क्रियान्वयन करते है। पैनल चर्चा, विचार गोष्ठी आदि शिक्षण सम्बन्धी क्रियाएं इसी समूह शिक्षण के अन्तर्गत आती है। टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि एक अच्छे स्तर की शिक्षण विधि है, जिसके द्वारा शिक्षण गतिविधि को अच्छे तरीके से शिक्षार्थी तक संप्रेषित किया जा सकता है। समीक्षा नीति सम्बन्धी विधि
शिक्षण सम्बन्धी शिक्षक केन्द्रित सभी विधियों का पुनरावलोकन करने ही समीक्षा नीति कहलाता है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य कक्षा में चल रहे अध्ययन-अध्यापन की प्रगति का लेखा-जोखा लेना होता है, जिससे शिक्षण विधि की कमियों को जानकार उसका उपचार किया जा सके। प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि
इस विधि को सुकरती विधि भी कहा जाता है। यह विधि मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित होती है।
इस विधि के मूलतः तीन सोपान होते है-
उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षण की पद्धति
कक्षा में विषय वस्तु को सरल एवं बोधगम्य बनाने के लिए जिन विधियों का शिक्षकों द्वारा उपयोग किया जाता है, उन्हें शिक्षण विधियाँ कहते है।
शिक्षण विधियाँ दो आधारों पर वर्गीकृत होती है-
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ
इस विधि में शिक्षक जटिल संप्रत्ययों की व्याख्या करते है तथा शिक्षार्थी उन्हें समझने का प्रयास करते है।
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ छः प्रकार की होती है-
1- व्याख्यान विधि
2- व्याख्यान-प्रदर्शन विधि
3- समूह शिक्षण विधि
4- टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
5- समीक्षा नीति-सम्बन्धी विधि
6- प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ
इस विधि के अन्तर्गत शिक्षार्थी का केन्द्रीय स्थान होता है। इसमें विद्यार्थी के मनोविज्ञान को समझते हुए शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी की अभिरुचि, अभिवृत्ति और क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करना है।
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ 9 प्रकार की होती है-
1- कार्यक्रम अनुदेश विधि
2- सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि
3- कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि
4- परस्पर संवादी वीडियो विधि
5- मुक्त अधिगम विधि
6- निरीक्षण विधि
7- खेल विधि
8- अन्वेषण विधि
9- प्रयोगशाला विधि शिक्षण नीतियाँ, विधियाँ एवं युक्ति में अन्तर
शिक्षण नीतियाँ शिक्षक द्वारा की गई ऐसी कौशलपूर्ण व्यवस्था है जो विद्यार्थीयों में उद्देश्यों के अनुसार व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए की जाती है। शिक्षण विधियाँ, शिक्षण उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होती है। शिक्षण युक्ति से अभिप्राय व्याख्या, दृष्टांत आदि में इस युक्ति का प्रयोग किया जाता है, जैसे- प्रश्नोत्तर, व्याख्या आदि।
शिक्षण में निदेशात्मक सुविधाएं
निदेशात्मक सुविधाएं, शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावित करती है। निदेशात्मक सुविधाओं में मुख्य रूप से संस्थाओं का प्रबन्धन, नीतियाँ व उद्देश्य महत्वपूर्ण होते है। निदेशात्मक सुविधाओं को अध्ययन दो प्रकार से किया जा सकता है-
शैक्षिक वातावरण
संस्थागत सुविधाएं
शैक्षिक वातावरण
शैक्षिक वातावरण से तात्पर्य उन सभी व्यवस्थाओं और स्थितियों से है, जो शैक्षिक कार्यों को लागू करते समय प्रभावी रहती है। किसी विद्यालय की स्थापना करते समय जिन-जिन बातों को ध्यान में रखना होता है वे सभी शैक्षिक वातावरण के अन्तर्गत ही आती है। जैसे- विद्यालय आबादी से कितनी दूर है, आस-पास कोई कारखाना तो नहीं है, विद्यालय की जमीन पर कोई विवाद तो नहीं है आदि। संस्थागत सुविधाएं
शिक्षण संस्थाओं के द्वारा विद्यालय में दी जाने वाल वे सभी सुविधाएं जो शिक्षण प्रक्रिया में मूलभूत आवश्यक है, संस्थागत सुविधाएं कहलाती है। जैसे- विद्यालय में बिजली, पानी व शौचालयों की सुविधा, अच्छे व बड़े क्लासरूम, ब्लेकबोर्ड आदि।
शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-दृश्य साधन
शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा सुनकर तथा देखकर दोनों प्रकार से ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- टेलीविजन, चलचित्र, स्लाइड, कम्प्यूटर आदि।
श्रव्य-दृश्य साधन सात प्रकार के है-
1- टेलीविजन
2- कम्प्यूटर
3- मल्टीमीडिया
4- श्यामपट्ट
5- प्रदर्शन बोर्ड
6- चलचित्र अथवा सिनेमा
7- संवाद सामग्री कम्प्यूटर
आधुनिक समय में कम्प्यूटर का श्रव्य-दृश्य शिक्षण सामग्री के रूप में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके माध्यम से शिक्षण सहित मनोरंजन व अन्य पहलुओं को नवीन रूप दिया गया है। कम्प्यूटर को विद्युत मस्तिष्क भी कहा जाता है। मल्टीमीडिया
मल्टीमीडिया एकसाथ की साधनों का संयोजन है। इसमें मीडिया, ऑडियो, वीडियो, फिल्म आदि सभी साधन सम्मिलित किए जाते है। श्यामपट्ट
श्यामपट्ट का शिक्षण में अपना एक विशेष महत्व होता है। इसके माध्यम से शब्दों के प्रतीकों द्वारा शिक्षक विद्यार्थियों में बोधगम्यता का विकास करता है। परम्परागत प्रणालियों में श्यामपट्ट सर्वाधिक उपयोगी सहायक सामग्री है। श्यामपट्ट के द्वारा शिक्षक विद्यार्थियों में पाठ की बोधगम्यता, उसकी धारण योग्यता, लिखावट में सुधार आदि का विकास करता है।
शिक्षण प्रक्रिया में श्यामपट्ट का निम्नलिखित उपयोग किया जाता है-
पाठ्य विवरण के लिए
सारांश एवं गृहकार्य के लिए
मूल्यांकन कार्य के लिए
विद्यार्थियों के व्यक्तिगत कार्य के लिए
कठिन अंशों को सरल बनाने के लिए
प्रदर्शन बोर्ड
प्रदर्शन बोर्ड भी श्रव्य-दृश्य सामग्री का एक प्रमुख अंग है। इसमें श्यामपट्ट सहित, सफेद बोर्ड, चुम्बकीय बोर्ड, बुलेटिन बोर्ड, पेज बोर्ड आदि शामिल किए जाते है। चलचित्र अथवा सिनेमा
वर्तमान समय में चलचित्र अथवा सिनेमा को शिक्षण का सर्वसुलभ एवं सस्ता माध्यम माना जाता है। इसके द्वारा की जटिल समस्याओं एवं अनुसंधानात्मक विषयों को छात्रों के समक्ष सरल एवं रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। संवाद सामग्री
संवाद सामग्री आधुनिक समय के नवीन तकनीक की देन है। यह श्रव्य-दृश्य सामग्री के रूप में शिक्षार्थियों से परस्पर संवाद करती है, जिनमें इण्टरएक्टिव वीडियो, इण्टरनेट, वीडियो कॉलिंग आदि प्रचलित माध्यम है।
शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य-साधन
शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा देखकर ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- प्रोजेक्टर, फिल्म स्ट्रिप, मानचित्र, श्यामपट्ट, फोटोग्राफ आदि।
शिक्षण में दृश्य साधन सात प्रकार से सहायक होते है-
1- रेखाचित्र अथवा चार्ट
2- मानचित्र एवं ग्लोब
3- प्रतिमान
4- स्लाइड्स
5- ग्राफ
6- फ्लैश कार्ड
7- पत्र-पत्रिका रेखाचित्र अथवा चार्ट
किसी वस्तु के प्रतिमान की अनुपलब्धि में रेखाचित्र या ग्राफ आदि की प्रस्तुति से विषय को समझने में आसानी हो जाती है। रेखाचित्र के माध्यम से छात्रों के समक्ष विषय-वस्तु को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है।
रेखाचित्र के माध्यम से विद्यार्थियों में समय-ज्ञान का विकास, अमूर्त तथ्य का दृश्य रूप में प्रकटीकरण, सारांश प्रस्तुतीकरण, कलानुक्रमिक विधि से प्रस्तुति, चित्रात्मक संकेत आदि का विकास होता है। मानचित्र एवं ग्लोब
मानचित्र एवं ग्लोब से स्थान की भौगोलिक स्थिति, एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी, क्षेत्रफल आदि का ज्ञान बड़ी सरलता से हो जाता है। मानचित्र विश्व की जलवायु, मौसम व पर्यावरण आदि विषयों को विद्यार्थियों को समझाने में सहायक होता है। मानचित्र दो आयामी होता है और इसकी सतह सपाट होती है। मानचित्र का तीन आयामी रूपांतरण ही ग्लोब कहलाता है। प्रतिमान
प्रतिमान वास्तविक वस्तुओं के प्रतिरूप होते है। प्रतिमानों का प्रयोग प्रत्यक्ष वस्तुओं की अनुपलब्धि के समय किया जाता है। प्रतिमान सामग्री के द्वारा जानवरों का ज्ञान, उनके अंगों का ज्ञान, पेड़-पौधों का ज्ञान, फल, पुष्प आदि की जानकारी के लिए किया जाता है। स्लाइड्स
शिक्षण में स्लाइड्स का उपयोग सूक्ष्म पदार्थों के अध्ययन के लिए किया जाता है। इसे माइक्रोस्कोप की सहायता से देखा जाता है। स्लाइड्स को प्रदर्शित करने के लिए प्रोजेक्टर का प्रयोग किया जाता है। ग्राफ
ग्राफ के माध्यम से सांख्यिकी एवं उसके परिमाणात्मक सम्बन्धों को दृश्य-रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह आँकड़ों का आलेखीय प्रस्तुतीकरण है, जिसमें सरल रेखा-ग्राफ, वृत या पाई चार्ट व बार ग्राफ जैसी पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। फ्लैश कार्ड
इसका प्रयोग मुख्यतः छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए किया जाता है। इसमें कार्ड के द्वारा शब्द चित्र, मात्राएं आदि को जोड़ने का कार्य किया जाता है। यह पाठ्य-वस्तु को रोचक तरीके से सीखने की विधि है। पत्र-पत्रिका
पत्र-पत्रिका शिक्षण सामग्री की एक महत्वपूर्ण दृश्य प्रस्तुति है, जिसके माध्यम से विषयों को उदाहरण-स्वरूप प्रस्तुत कर शिक्षण को बोधगम्य बनाया जाता है।
शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा सुनकर ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- फोनोग्राफ रिकॉर्ड, रेडियो प्रसारण तथा मैग्नेटिक टेपरिकॉर्डर आदि।
शिक्षण में श्रव्य साधन तीन प्रकार से सहायक होते है-
रेडियो
टेप रिकॉर्डर
ग्रामोफोन
रेडियो
रेडियो शिक्षा प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण अंग है।
भारत में वर्ष 1936 में सर्वप्रथम आकाशवाणी से समाचार बुलेटिन का प्रसारण हुआ था।
वर्ष 1957 में विविध भारती की शुरुआत हुई थी।
टेप रिकॉर्डर
टेपरिकॉर्डर के माध्यम से विषय-वस्तु को विद्यार्थी के लिए आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया जा सकता है।
यह निदानात्मक और उपचरात्मक दोनों ही शिक्षण विधियों में प्रयुक्त किया जा सकता है।
ग्रामोफोन
ग्रामोफोन रेडियो की तरह ही शिक्षण का प्राचीन माध्यम है।
इसके द्वारा छात्रों को उच्चारण के शुद्धिकरण में सहायता मिलती है।
शिक्षक द्वारा पाठ्य-पुस्तक के अध्यापन के दौरान जिन वस्तुओं अथवा सेवाओं को प्रयोग में लाया जाता है, उन्हें शिक्षण सहायक सामग्री कहते है। उत्तम शिक्षण सामग्री शिक्षार्थियों में विद्याध्ययन के प्रति रुचि पैदा करती है और उनमें शिक्षा के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास करती है।
कार्टन ए गुड के अनुसार, “कोई भी ऐसी सामग्री जिसके माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को उद्दीप्त किया जा सके अथवा श्रवणेंद्रियों संवेदनाओं के द्वारा आगे बढ़ाया जा सके, वह शिक्षण सामग्री कहलाती है।”
शिक्षण में सहायक सामग्री का मुख्य उद्देश्य छात्रों में रोचक तरीकों के माध्यम से शिक्षण प्रदान करना है।
शिक्षण सहायक सामग्री को परम्परागत रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया है-
श्रव्य साधन
दृश्य साधन
श्रव्य-दृश्य साधन
श्रव्य साधन
इस श्रेणी में ऐसी सहायक सामग्री को रखा जाता है, जिसके द्वारा सुनकर ज्ञान प्राप्त किया जा सके।
शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य साधन मुख्यतः तीन प्रकार के होता है-
1- रेडियो
2- टेप रिकार्डर
3- ग्रामोफोन
दृश्य साधन
इसमें ऐसी सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनको देखकर ज्ञान प्राप्त होता है।
शिक्षण प्रक्रिया में दृश्य साधन मुख्यतः सात प्रकार के होते है-
1- रेखाचित्र एवं चार्ट
2- मानचित्र एवं ग्लोब
3- प्रतिमान
4- स्लाइड
5- ग्राफ
6- फ्लैश कार्ड
7- पत्र-पत्रिका
श्रव्य-दृश्य सामग्री
शिक्षण की इस सामग्री के अन्तर्गत वे साधन रखे जाते है, जिनके द्वारा छात्र देखकर और सुनकर दोनों प्रकार से ज्ञान प्राप्त करते है।
श्रव्य-दृश्य सामग्री भी सात परकर की होती है-
1- टेलीविजन
2- कम्प्यूटर
3- मल्टीमीडिया
4- श्यामपट्ट
5- प्रदर्शन बोर्ड
6- चलचित्र अथवा सिनेमा
7- संवाद सामग्री
शिक्षण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत शिक्षण सूत्र एवं शिक्षण को प्रभावित करने वाले कारक आते है। शिक्षण को प्रभावी बनाने में शिक्षण विधियों एवं शिक्षण सामग्रियों का महत्व होता है। मन, मस्तिष्क, ज्ञान, आचरण, वातावरण आदि शिक्षण के प्रमुख कारक है, जो शिक्षक के कार्यों को प्रभावित करते है।
शिक्षण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शिक्षक एवं शिक्षार्थी की भूमिका निम्नलिखित आधार पर निर्धारित होती है-
शिक्षण कौशल
शैक्षणिक योग्यता
विषय-वस्तु की विशेषज्ञता
शिक्षक का अनुभव एवं प्रबन्धन
शिक्षक एवं शैक्षणिक संस्थानों में समन्वय
कार्य का विश्लेषण
1- शिक्षण कौशल
कुछ शिक्षकों में शिक्षण कौशल जन्मजात होता है, परन्तु अधिकतर शिक्षकों को यह कौशल अर्जित करना पड़ता है। कुछ प्रमुख शिक्षण कौशल है-
प्रश्न पूछना
प्रयोग करना
व्याख्यान देना
समस्या का निदान करना
2- शैक्षणिक योग्यता
शिक्षक की शैक्षणिक योग्यता बहुत महत्वपूर्ण होती है। एक योग्य शिक्षक ही शिक्षण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकता है। एक कुशल शिक्षक के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निर्धारित की जाती है-
JBT
B.Ed
CTET
NET
3- विषय-वस्तु की विशेषज्ञता
शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि शिक्षक को उसके विषय का विशेष ज्ञान प्राप्त हो, यदि शिक्षक अपनी विषय-वस्तु का विशेषज्ञ नहीं है तो शिक्षण प्रभावी नहीं होता। 4- शिक्षक का अनुभव एवं प्रबन्धन
एक शिक्षक सदैव एक शिक्षार्थी भी होता है। वह अपने ज्ञान एवं अनुभव से शिक्षार्थी के प्रश्नों के उत्तर देकर उसकी जिज्ञासा को शान्त कर पता है। 5- शिक्षक एक शैक्षणिक संस्थानों में समन्वय
एक शिक्षक के लिए आवश्यक है कि उसकी शिक्षण प्रक्रिया एक स्वतन्त्र वातावरण में सम्पन्न हो। इसके लिए शिक्षक का स्वयं का प्रबन्धन एवं शैक्षणिक संस्थानों में समन्वय रखना बहुत महत्वपूर्ण होता है। 6- कार्य का विश्लेषण
शिक्षण की प्रक्रिया में शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों ही एक दूसरे पर प्रभाव डालते है। शिक्षक को आवश्यक है की अपने शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए अपने कार्य के साथ-साथ शिक्षार्थियों के कार्यों का भी विश्लेषण करे।
"भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में उनके स्वभाव, बुद्धि, शरीरिक-मानसिक क्षमता के अन्तर को वैयक्तिक भिन्नता कहते है"। शिक्षण के क्षेत्र में वैयक्तिक भिन्नता का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण होता है। वैयक्तिक भिन्नता के विचार का शिक्षण में प्रयोग सर्वप्रथम फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक गाल्टन ने किया था। वैयक्तिक भिन्नता के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों ने कुछ परिभाषाएं दी है जो इस प्रकार है-
स्किनर के अनुसार, “वैयक्तिक भिन्नता से हमारा तात्पर्य व्यक्तित्व के उन सभी पहलुओं से है, जिनका मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है।” जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “कोई व्यक्ति अपने समूह के शारीरिक तथा मानसिक गुणों के औसत से जितनी भिन्नता रखता है, उसे वैयक्तिक भिन्नता कहते है।” टॉयलर के अनुसार, “शरीर के रूप-रंग, आकार, कार्य, गति, बुद्धि, ज्ञान, उपलब्धि, रुचि, अभिरुचि आदि लक्षणों में पाई जाने वाली भिन्नता को वैयक्तिक भिन्नता कहते है।”
वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार
वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार निम्नलिखित है-
भाषायी भिन्नता
लैंगिक भिन्नता
बौद्धिक भिन्नता
पारिवारिक एवं सामुदायिक भिन्नता
जातिगत भिन्नता
संवेगिक भिन्नता
धार्मिक भिन्नता
शारीरिक भिन्नता
अभिवृतिक भिन्नता
व्यक्तित्व भिन्नता
गत्यात्मक कौशल पर आधारित भिन्नता
वैयक्तिक भिन्नता के कारण
वैयक्तिक भिन्नता होने के निम्नलिखित कारण है-
वंशानुक्रम
वातावरण या परिवेश
आयु एवं बुद्धि
परिपक्वता
लैंगिक भिन्नताएं
वैयक्तिक भिन्नता को जानने की विधियाँ
वैयक्तिक भिन्नताओं को जानने की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित है-
बुद्धि परीक्षण
उपलब्धि परीक्षण
संवेग परीक्षण
अभिक्षमता परीक्षण
अभिरुचि परीक्षण
व्यक्तित्व परीक्षण
शिक्षा में वैयक्तिक भिन्नता का स्वरूप
शिक्षा के क्षेत्र में वैयक्तिक भिन्नता महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
वैयक्तिक भिन्नता के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया में निम्नलिखित बातों का निर्धारण आसानी से किया जाता है-
18 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को वयस्क अवस्था में रखा जाता है। वयस्क अध्येता की प्रमुख विशेषताओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझ सकते है-
शैक्षिक
सामाजिक
भावनात्मक
संज्ञानात्मक
शैक्षिक
वयस्क अध्येता में स्वयं परीक्षण, निरीक्षण, विचार और तर्क करने की प्रवृत्ति का उचित विकास होता है। वयस्क अध्येता को जिम्मेदारी व सही दिशा के बारे में ज्ञान होता है। अतः वयस्क अध्येता शिक्षण कार्य को अपनी कर्मनिष्ठा तथा उत्तरदायित्व की भावना से करने के प्रति संकल्पित होता है।
सामाजिक
वयस्क व्यक्ति सामाजिक परिवेश में अच्छी तरह से समावेशित होता है। वह सामाजिक रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि से बाँधा होता है। वयस्क अध्येता सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए शिक्षण कार्य को निष्ठापूर्वक करने में योग्य होता है।
भावनात्मक
वयस्क शिक्षार्थी भनात्मक रूप से सही निर्णय लेने तथा किसी भी कार्य को करने में समर्थ होता है। वह भावनात्मक रूप से निर्णय न लेकर उचित तर्क के माध्यम से निष्कर्ष प्राप्त करता है। अतः शिक्षण इसकी भावनात्मक प्रवृत्ति के विकास को और उन्नत करती है।
संज्ञानात्मक
वयस्क शिक्षार्थी में मस्तिष्क का विकास लगभग पूर्ण होता है। वह कल्पना, मनोविज्ञान, तथ्यहीन तर्क आदि के समाधान में सक्षम होता है। अतः वयस्क अध्येता उचित संज्ञानात्मक निर्णय लेकर उचित निष्कर्ष प्रदान करता है।
12 वर्ष से 18 वर्ष तक के आयु के बालक को किशोर अवस्था में रखा जाता है। किशोर अध्येता की प्रमुख विशेषताओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझ सकते है-
शैक्षिक
सामाजिक
भावनात्मक
संज्ञानात्मक
शैक्षिक
किशोर अवस्था में स्वयं परीक्षण, निरीक्षण, विचार और तर्क करने की प्रवृत्ति होती है। इस स्तर पर शिक्षण का स्वरूप मानसिक विकास, शारीरिक विकास एवं व्यक्तिगत भिन्नता के अनुरूप होना चाहिए।
सामाजिक
किशोर अवस्था में बालक में जीवन दर्शन, नए अनुभव की इच्छा, निराशा, असफलता आदि का ज्ञान होता है।निराशा और असफलता आदि के कारण ही उसमें आपराधिक प्रवृत्ति का जन्म होता है। इसी अवस्था में उसमें समाजसेवा का भाव भी उत्पन्न होता है। वह सामाजिक बुराइयों पर अपना तर्क देने लगता है। इस प्रकार शिक्षण इस अवस्था में सही मार्गदर्शन में सहायक है।
भावनात्मक
किशोर अवस्था में भावनात्मक रूप से शिक्षार्थी किसी भी तथ्य को समझने में जल्दी करते है। कल्पना, सत्य व असत्य, नैतिक व अनैतिक का सही ज्ञान न होने के कारण वह गलत प्रवृत्तियों का शिकार भी हो जाता है। अतः इस स्तर पर शिक्षण का प्रारूप सही मार्ग दर्शन वाला होना चाहिए।
संज्ञानात्मक
किशोर अवस्था में मस्तिष्क का विकास लगभग सभी दिशाओं में होता है। वह कल्पनाओं, नैतिक तथा अनैतिक विषयों के बारें मे सजग हो जाता है। अतः शिक्षण के क्षेत्र में किशोर की संज्ञानात्मक प्रवृत्ति का ज्ञान आवश्यक हो जाता है।
अध्येता का अर्थ है- “अध्ययन करने वाला”। अध्येता को शिक्षार्थी, विद्यार्थी या अधिगमकर्ता भी कहते है, जो कि शिक्षण का केन्द्रबिन्दु होता है। शिक्षण की प्रारम्भिक अवस्था में अध्येता अपरिपक्व अवस्था में होता है, किन्तु धीरे-धीरे वह सामाजिक एवं सांस्कृतिक गुणों के माध्यम से परिपक्व अवस्था में आ जाता है। अध्येता में अनुशासन की प्रवृत्ति विद्यालयी शिक्षा के माध्यम से ही विकसित होती है और वह धीरे-धीरे एक आदर्श नागरिक बनने की और अग्रसर होता है।
अध्येता की मुख्य विशेषताएं
अधिगमकर्ता का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ स्मरण एवं अनुभव को संगठित व परिष्कृत करना होता है, इस प्रकार अध्येता सदैव एक अर्थपूर्ण लक्ष्य द्वारा निर्देशित रहता है।
अध्येता के अधिगम प्राप्ति का प्रेरणाश्रोत स्वाभाविक रूचियाँ, अभिरुचियाँ एवं अभिवृत्तियाँ होती है, जो उन्हें किसी विषय या क्रियाओं को सीखने या उदासीन रहने को उद्वेलित करता है।
अध्येता की महत्वकांक्षा, उसकी उपलब्धि और प्रेरणा के स्तर पर ही उसकी अधिगम प्रक्रिया की सफलता अथवा असफलता निर्भर करती है।
अध्येता में अधिगम की इच्छा व्यक्तिगत एवं सामाजिक आवश्यकताओं से जागृत होती है।
अध्येता के प्रमुख लक्ष्यों में विद्या प्राप्ति के साथ-साथ शारीरिक व मानसिक विकास एवं चारित्रिक सद्गुणों की अभिवृद्धि जैसे तत्व सम्मिलित किए जाते है।
अधिगमकर्ता प्रशिक्षण या निर्देशात्मक योजना निर्माण में सहायक तत्व की तरह कार्य करता है।
हण्ट शिक्षण मॉडल को चिन्तन स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। चिन्तन के स्तर पर शिक्षक अपने छात्रों में चिन्तन, तर्क तथा कल्पना शक्ति को बढ़ता है , जिससे छात्र इन उपगमों के माध्यम से अपनी समस्या का समाधान कर सके। इस स्तर पर शिक्षण में स्मृति तथा बोध दोनों स्तरों का शिक्षण निहित होता है। इसके बिना चिन्तन-स्तर का शिक्षण सफल नहीं हो सकता।
चिन्तन स्तर का शिक्षण समस्या केन्द्रित होता है, इसमें छात्र को मौलिक चिन्तन करना होता है। इस स्तर पर छात्र विषय-वस्तु के सम्बन्ध में आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते है। इस स्तर पर छात्र सीखे हुये तथ्यों तथा सामान्यीकरण की जाँच करता है और नवीन तथ्यों की खोज करता है।
इस शिक्षण के सम्बन्ध में विग्गी का कथन है कि "चिन्तन स्तर के शिक्षण में कक्षा में एक ऐसा वातावरण विकसित किया जाता है, जो अधिक सजीव, प्रेरणादायक, सक्रिय, आलोचनात्मक, संवेदनशील हो और नवीन एवं मौलिक चिन्तन को खुला अवसर प्रदान करे। इस प्रकार का शिक्षण बोध स्तर के शिक्षण की अपेक्षा अधिक कार्य-उत्पादक को बढ़ावा देता है।"
यह शिक्षण का सर्वोत्त्म स्तर है, जिसमें छात्र अपनी अभिव्यक्ति, धारणा, विचार, मान्यता तथा ज्ञान के अनुसार समस्या का समाधान, विचार एवं तर्क के द्वारा करता है तथा नवीन ज्ञान की खोज भी करता है। इस स्तर पर शिक्षक छात्रों के बौद्धिक व्यवहार के विकास के लिए अवसर प्रदान करता है और सृजनात्मक क्षमताओं के विकास में सहायक होता है। चिन्तन स्तर का शिक्षण स्मृति तथा बोध स्तर के शिक्षण से भिन्न होता है, परन्तु चिन्तन स्तर के शिक्षण के लिए स्मृति तथा बोध का स्तर, शिक्षण स्तर पहले होना आवश्यक है। हण्ट को चिन्तन स्तर के शिक्षण का प्रवर्तक माना जाता है।
चिन्तन स्तर के शिक्षण प्रतिमान के प्रारूप का अध्ययन चार सोपनों में किया जाता है-
उद्देश्य
संरचना
सामाजिक प्रणाली
मूल्यांकन प्रणाली
उद्देश्य
चिन्तन स्तर के शिक्षण के प्रमुख तीन उद्देश्य होते है-
समस्या, समाधान की क्षमताओं का छात्रों में विकास करना
छात्रों में आलोचनात्मक तथा सृजनात्मक चिन्तन का विकास करना
छात्रों की मौलिक तथा स्वतन्त्र चिन्तन क्षमताओं का विकास करना
संरचना
चिन्तन स्तर के शिक्षण की संरचना का प्रारूप समस्या की प्रकृति पर निर्धारित किया जाता है। समस्याएँ दो प्रकार की होती है- व्यक्तिगत एवं सामाजिक। व्यक्तिगत समस्या के समाधान के लिए प्रमुख दो आयामों का अनुसरण किया जाता है- डी. बी. की समस्यात्मक परिस्थिति एवं कर्ट लेविन की समस्यात्मक परिस्थिति
डी. बी. की समस्यात्मक परिस्थिति
डी. बी. की व्यक्तिगत समस्या को निम्न दो परिस्थितियों में प्रस्तुत किया जाता है-
पथ-रहित परिस्थिति
दो नोक वाली पथ परिस्थिति
1- पथ-रहित परिस्थिति
छात्र जब अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है और मार्ग में बाधाएँ आ जाती है तब उसे तनाव हो जाता है, इसलिए वह उन बाधाओं पर विजय पाने के लिए समाधान सोचता है।
2- दो नोक वाली पथ परिस्थिति
जब छात्र को दो लक्ष्य समान रूप से आकर्षित करते है, तब उसके सामने यह समस्या उत्पन्न होती है।
कर्ट लेविन की समस्यात्मक परिस्थिति
कर्ट लेविन का विचार है कि हर व्यक्ति का कोई न कोई लक्ष्य होता है, जिससे उसका व्यवहार नियंत्रित होता है।प्रत्येक व्यक्ति का अपना जीवन क्षेत्र होता है, जिसकी प्रकृति सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक होती है। व्यक्ति और लक्ष्य की स्थिति तनाव उत्पन्न करती है, जिससे समस्यात्मक परिस्थिति बन जाती है। कर्ट लेविन ने तनाव पथ-परिस्थिति के तीन रूप प्रस्तुत किए है-
धनात्मक-आकर्षण
ऋणात्मक-आकर्षण
धनात्मक-ऋणात्मक आकर्षण
सामाजिक प्रणाली
चिन्तन स्तर की सामाजिक प्रणाली में छात्र अधिक सक्रिय रहता है, और कक्षा का वातावरण खुला और स्वतंत्र होता है। सीखने की परिस्थितियाँ अधिक आलोचनात्मक होती है। इस स्तर पर छात्र की स्वतः अभिप्रेरण का महत्व अधिक होता है। इस स्तर पर छात्र समस्या के प्रति जितना अधिक संवेदनशील होगा, उतना ही मौलिक चिन्तन का अधिक विकास होगा। इस स्तर पर शिक्षक का कार्य छात्र की आकांक्षा स्तर को ऊपर उठाना होता है। इस स्तर पर सामाजिक अभिप्रेरण का विशेष महत्व है क्योंकि इसी से छात्र में अध्ययन के प्रति लगन उत्पन्न होती है। चिन्तन स्तर पर शिक्षक का स्थान गौण होता है, इसलिए इस स्तर पर शिक्षण के लिए वाद-विवाद तथा सेमिनार आदि विधियाँ अधिक प्रभावशाली होती है।
मूल्यांकन प्रणाली
चिन्तन स्तर के शिक्षण के प्रतिमान का मूल्यांकन करना कठिन होता है। अतः चिन्तन स्तर के शिक्षण की निष्पत्तियों के लिए निबंधात्मक परीक्षा अधिक उपयोगी होती है। चिन्तन स्तर के मूल्यांकन के शिक्षण के लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षा अधिक उपयोगी नहीं होती है। इस स्तर की परीक्षा की व्यवस्था करते समय निम्नलिखित पक्षों को ध्यान में रखा जाता है-
छात्रों की अभिवृत्तियों तथा विश्वासों का मापन किया जाए
अधिगम की क्रियाओं में छात्रों की तल्लीनता की भी जाँच की जाए
छात्रों की समस्या-समाधान प्रवृति का भी मापन किया जाए
छात्रों की आलोचनात्मक तथा सर्जनात्मक क्षमताओं के विकास का भी मूल्यांकन किया जाए
चिन्तन स्तर के शिक्षण के लिए सुझाव
इस स्तर में शिक्षण के पूर्व स्मृति तथा बोध-स्तर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए
प्रत्येक संबन्धित सोपान का अनुसरण किया जाना चाहिए
छात्रों का आकांक्षा स्तर ऊँचा होना चाहिए
छात्र में सहानुभूति, प्रेम तथा संवेदनशीलता होनी चाहिए
छात्र को समस्याओं के प्रति तथा अपनी विषय-वस्तु के सम्बन्ध में अधिक संवेदनशील होना चाहिए
चिन्तन स्तर के शिक्षण का महत्व बताया जाना चाहिए
ज्ञानात्मक विकास की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए
छात्रों को अधिक से अधिक मौलिक तथा सृजनात्मक चिन्तन के लिए अवसर प्रदान किए जाने चाहिए
शिक्षण का वातावरण प्रजातान्त्रिक होना चाहिए
छात्रों को अधिक से अधिक सही चिन्तन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए
मॉरिसन शिक्षण मॉडल को बोध स्तर या समझ स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। शिक्षण के क्षेत्र में बोध एक बहुत व्यापक शब्द है। बोध शब्द को मनोवैज्ञानिको तथा शिक्षाशास्त्रीयों ने कई अर्थों में प्रयुक्त किया है, इसलिए शिक्षक भी इस शब्द को अनिश्चित ढंग से प्रस्तुत करता है। शब्दकोश में भी इसके कई अर्थ दिये गए है, जैसे-
अर्थ का प्रत्यक्षीकरण करना,
विचारों का बोध होना,
गहनता से परिचित होना
प्रकृति एवं स्वभाव को समझना
भाषा में प्रयुक्त होने वाले अर्थ को समझना तथा तथ्य के रूप में स्पष्ट हो जाना।
मौरिस एल विग्गी ने बोध का प्रयोग निम्नलिखित तीन पक्षों को स्पष्ट करने के लिए किया है-
1. विभिन्न तथ्यों में सम्बन्ध देखना
2. तथ्यों को संचालन के रूप में देखना
3. तथ्यों के सम्बन्ध तथा संचालन दोनों को समन्वित करना
बोध स्तर के शिक्षण के लिए यह आवश्यक है कि इससे पूर्व स्मृति स्तर पर शिक्षण हो चुका हो। इसके बिना बोध स्तर शिक्षण सफल नहीं हो सकता। शिक्षक इस स्तर पर छात्रों को सामान्यीकरण सिद्धांतों तथा तथ्यों के सम्बन्ध का बोध करता है और शिक्षण प्रक्रिया को अर्थपूर्ण तथा सार्थक बनाता है। बोध स्तर के शिक्षण में शिक्षक छात्रों के समक्ष पाठ्य-वस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि छात्रों को बोध के लिए अधिक-से अधिक अवसर मिले और छात्रों में अधिक सूझ-बूझ उत्पन्न हो सके। इस प्रकार के शिक्षण में शिक्षक और छात्र दोनों ही सक्रिय रहते है। बोध स्तर का शिक्षण उद्देश्य केन्द्रित तथा सूझ-बूझ से युक्त होता है। मूल्यांकन के लिए निबंधात्मक तथा वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार की प्रणाली का अनुसरण किया जाता है। प्रणाली का प्रयोग तथ्यात्मक तथा विवरणात्मक दोनों प्रकार से किया जाता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में प्रत्यास्मरण, अभिज्ञान तथा लघु उत्तर विधियों का प्रयोग किया जाता है।
मॉरिसन का बोध स्तर शिक्षण मॉडल
मॉरिसन ने बोध स्तर के शिक्षण मॉडल को चार चरणों में प्रस्तुत किया है, जिनका विवरण इस प्रकार है-
1- उद्देश्य
2- संरचना
3- सामाजिक प्रणाली
4- मूल्यांकन प्रणाली
उद्देश्य
मॉरिसन के प्रतिमान का उद्देश्य प्रत्यय का स्वामित्व प्राप्त करना है। इसमें शिक्षण की क्रियाओं द्वारा तथ्यों के रहने पर ही बल नहीं दिया जाता, अपितु पाठ्य-वस्तु के स्वामित्व पर भी बल दिया जाता है। इस स्तर पर छात्रों के व्यक्तित्व के विकास को भी ध्यान में रखा जाता है।
संरचना
मॉरिसन ने बोध स्तर की शिक्षण व्यवस्था को पाँच सोपानों में विभाजित किया है-
1- अन्वेषण
2- प्रस्तुतीकरण
3- परिपाक
4- व्यवस्था
5- वर्णन
1- अन्वेषण
इस सोपान में निम्नलिखित क्रियाएँ सम्मिलित की जाती है-
पूर्व ज्ञान का पता लगाने के लिए परीक्षण करना, जिसमें प्रश्न पूछे जाते है। इसे पूर्व व्यवहार भी कहते है।
शिक्षक पाठ्य-वस्तु का विश्लेषण करके उसके अवयवों को क्रमबद्ध रूप में तर्कपूर्ण ढंग से व्यवस्थित करता है। इसमें यह ध्यान रखना होता है कि पाठ्य-वस्तु का क्रम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से वैध हो।
अन्वेषण की तीसरी क्रिया में शिक्षक यह निश्चित करता है कि नवीन पाठ्य-वस्तु की इकाइयों को किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए।
2- प्रस्तुतीकरण
इस सोपान में निम्नलिखित तीन क्रियाएँ शामिल होती है-
शिक्षक को नवीन पाठ्य-वस्तु की छोटी-छोटी इकाइयों में प्रस्तुत करना होता है जिससे कि शिक्षक का छात्रों से सम्बन्ध स्थापित हो सके।
इस सोपान में शिक्षक को प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ छात्रों की समस्याओं का निदान भी करना होता है।
निदान के आधार पर शिक्षक को यह निर्णय लेना होता है कि पाठ्य-वस्तु की पुनरावृति कितनी बार की जानी चाहिए।
नवीन पाठ्य-वस्तु की पुनरावृति तीन बार तक की जा सकती है।
3- परिपाक
जब छात्र प्रस्तुतीकरण की परीक्षा को उत्तीर्ण कर ले, तब उन्हें परिपाक की ओर अग्रसर करना चाहिए।
इस सोपान की निम्नलिखित विशेषताएँ है-
परिपाक का लक्ष्य पाठ्य-वस्तु की गहनता पर बल देना है
परिपाक के समय छात्रों की व्यक्तिगत क्रियाओं पर अधिक बल दिया जाता है
परिपाक के समय छात्रों को पुस्तकालय तथा प्रयोगशाला में अधिक समय दिया जाता है
परिपाक क्रिया के समय छात्र को गृह कार्य दिया जाता है
परिपाक के समय शिक्षक का मुख्य कार्य छात्रों को निर्देश देना और उनकी क्रियाओं का पर्यवेक्षण करना है
परिपाक का मौलिक उद्देश्य छात्रों को सामान्यीकरण के लिए अवसर देना है, जिससे कि वे प्रत्यय पर स्वामित्व प्राप्त कर सके
परिपाक के कालांश के अन्त में पाठ्य-वस्तु के स्वामित्व का परीक्षण किया जाए और इसमें असफल छात्रों को पुनः अवसर दिया जाना चाहिए
4- व्यवस्था
जब छात्र स्वामित्व परीक्षा में सफल हो जाता है तब परिपाक का कालांश समाप्त हो जाता है। इसके बाद छात्र व्यवस्था कालांश अथवा वर्णन कालांश में प्रवेश करता है। यह पाठ्य-वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करता है कि छात्र परिपाक के बाद व्यवस्था की ओर अथवा वर्णन की अग्रसर हो। मॉरिसन के व्यवस्था कालांश से तात्पर्य छात्र द्वारा पाठ्य-वस्तु को अपनी भाषा में लिखित रूप में प्रस्तुत करना से है। बोधगम्यता का यह अन्तिम सोपान स्वामित्व का सोपान माना जाता है। व्यवस्था सोपान में यह सुनिश्चित किया जाता है कि छात्र पाठ्य-वस्तु की प्रमुख इकाइयों को लिखित रूप में बिना किसी सहायता से पुनः प्रस्तुत कर सकता है अथवा नहीं। व्यवस्था स्तर पर विषय-वस्तु को विस्तार रूप से समझने का प्रयास किया जाता है। सीखने की एक इकाई से अनेक तथ्यों का बोध किया जाता है। व्याकरण, गणित और अंकगणित में लिखित रूप में बिना किसी की सहायता के पुनः प्रस्तुतीकरण नहीं होता अतः इस विषय में छात्र व्यवस्था कालांश को छोड़कर सीधे वर्णन कालांश में प्रवेश करता है।
5- वर्णन
वर्णन कालांश में प्रत्येक छात्र को मौखिक रूप में पाठ्य-वस्तु को शिक्षक तथा अपने साथियों के सामने प्रस्तुत करना होता है। इस सोपान में वह सीखे हुये विषय का सारांश सबके सामने प्रस्तुत करता है। मॉरिसन का स्वामित्व, वर्णन की एक विधि है, जिसमें प्रत्येक दिन का वर्णन कालांश में होता है। वर्णन स्तर को लिखित रूप में भी दिया जा सकता है।
सामाजिक प्रणाली
बोध स्तर में शिक्षण की सामाजिक प्रणाली विभिन्न सोपनों में बदलती रहती है। सामाजिक प्रणाली के विभिन्न सोपान निम्नलिखित है-
इस प्रणाली में शिक्षक व्यवहार का नियंत्रक होता है
शिक्षक एवं छात्र दोनों सक्रिय रहते है
छात्र अपने विचार प्रदर्शित कर सकता है
इस प्रणाली में बाह्य एवं आंतरिक दोनों प्रकार की प्रेरणाएँ उपयोगी होती है
सामाजिक व्यवस्था के प्रथम दो सोपनों में शिक्षक और अन्तिम तीन सोपनों में छात्र-शिक्षक दोनों ही अधिक क्रियाशील हो जाते है।
मूल्यांकन प्रणाली
मूलयांकन प्रणाली में आवश्यकतानुसार लिखित, मौखिक, निबंधात्मक तथा वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन विधियों का प्रयोग किया जाता है। इस स्तर पर प्रत्ययों के स्पष्टीकरण पर अधिक बल दिया जाता है।
बोध-स्तर के शिक्षण के लिए सुझाव
स्मृति-स्तर शिक्षण की परीक्षा में सफल होने पर ही छात्र को बोध-स्तर के शिक्षण में प्रवेश दिया जाना चाहिए
बोध-स्तर के सोपानों का अनुसरण समुचित ढंग से किया जाना चाहिए
बोध-स्तर के विभिन्न सोपनों की परीक्षाओं में सफल होने पर ही अगले सोपान में प्रविष्ट किया जाना चाहिए
शिक्षक को पाठ्य-वस्तु में तल्लीन होने के साथ-साथ छात्रों को मनोवैज्ञानिक ढंग से अभिप्रेरणा भी देनी चाहिए
शिक्षक को कक्षा के आकांक्षा स्तर को भी उठाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे छात्रों में अध्ययन के प्रति लगन हो सके
इस स्तर की शिक्षण व्यवस्था की समस्याओं को ध्यान में रखकर उनके लिए समाधान भी ज्ञात करना चाहिए
हरबर्ट शिक्षण मॉडल को स्मृति स्तर या स्मरण शक्ति स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। स्मृति स्तर के शिक्षण की क्रियाएँ ऐसे अधिगम की परिस्थितियों को उत्पन्न करती हैं, जिसमें विषयवस्तु के तथ्यों को छात्र केवल कण्ठस्थ कर सके। इस स्तर पर, प्रत्यास्मरण की क्रिया पर जोर दिया जाता है। इस स्तर पर, सार्थक तथा सम्बन्धित पाठ्य-वस्तु आसानी से याद हो जाती है, जबकि निरर्थक वस्तुओं को याद करने में कठिनाई होती है। तथ्यों को कण्ठस्थ करने की क्षमता का बुद्धि से सीधा सम्बन्ध नहीं होता है। एक मन्द बुद्धि बालक भी तथ्यों को कण्ठस्थ करके अधिक समय तक याद रख सकता है तथा इसके विपरीत भी हो सकता है।
स्मृति स्तर के शिक्षण की निष्पत्ति का बुद्धि से सह-सम्बन्ध नहीं होता है, परन्तु इस स्तर के शिक्षण से बौद्धिक व्यवहार के विकास में सहायता मिलती है। समस्या के समाधान में स्मृति स्तर भी सहायक होता है। कण्ठस्थ किए गए तथ्यों का छात्रों के विकास में ही योगदान होता है। कविता, पाठ, शब्दार्थ और उनका अभ्यास, संस्कृत में रूप, पहाड़े, गिनतियाँ, भाषा में वर्तनी, व्याकरण तथा ऐतिहासिक घटनाओं का शिक्षण, स्मृति स्तर पर ही अधिक प्रभावपूर्ण होता है।
स्मृति स्तर का पूर्णरूप से बहिष्कार सम्भव नहीं है। इस स्तर का अपना मूल्य है, अपना क्षेत्र है। इस स्तर का ज्ञान पाए बिना बोध एवं चिन्तन स्तर ठीक कार्य नहीं कर सकते। यह स्तर, अन्य विचारवान स्तरों के लिए आधारशिला प्रदान करता है, क्योंकि स्मृति स्तर पर तथ्य काफी रटे हुए होते हैं अत: भूलने की क्रिया भी इसमें काफी सक्रिय रहती है। कक्षा में रटी हुई सामग्री छात्रों के दैनिक जीवन में उपयोगी सिद्ध नहीं होती अतः इस स्तर पर सोचने व तर्क करने के लिए कोई स्थान नहीं होता। इस मॉडल में छात्र निष्क्रिय रहते हैं और यान्त्रिक ढंग से कक्षा कार्य चलता रहता है। कक्षा का वातावरण काफी औपचारिक होता है तथा छात्र को शिक्षक से प्रेरणा नहीं मिल पाती।
स्मृति स्तर के शिक्षण में, संकेत अधिगम, श्रृंखला अधिगम तथा अनुक्रिया पर महत्त्व दिया जाता है। प्रश्नोत्तर विधि का इसमें कोई महत्व नहीं होता। हरबर्ट ने स्मृति स्तर के शिक्षण के मॉडल के प्रारूप का वर्णन चार पक्षों में किया है।
उद्देश्य
संरचना
सामाजिक प्रणाली
मूल्यांकन प्रणाली
1. उद्देश्य
स्मृति स्तर के शिक्षण का उद्देश्य छात्रों में निम्नांकित क्षमताओं का विकास करना है ।
मानसिक पक्षों का प्रशिक्षण
तथ्यों का ज्ञान प्रदान करना
सीखे हुए तथ्यों का प्रत्यास्मरण रखना
सीखे हुए ज्ञान का प्रत्यास्मरण करना तथा पुन: प्रस्तुत करना
2. संरचना
हरबर्ट ने शिक्षण प्रक्रिया में प्रस्तुतीकरण पर अधिक बल दिया है। हरबर्ट की पंचपदी प्रणाली स्मृति स्तर के शिक्षण को संरचना का प्रारूप प्रदान करती है।
हरबर्ट के पाँच सोपान इस प्रकार हैं।
तैयारी करना
प्रस्तुतीकरण
तुलना एवं समरूपता
सामान्यीकरण
उपयोग
3. सामाजिक प्रणाली
शिक्षण एक सामाजिक एवं व्यावसायिक प्रक्रिया है। इसमें सामाजिक व्यवस्था का विशेष महत्त्व है।
छात्र और शिक्षक इसके सदस्य होते हैं।
स्मृति स्तर पर शिक्षक अधिक क्रियाशील रहता है।
शिक्षक का व्यवहार अधिकारपूर्ण रहता है।
शिक्षक का मुख्य कार्य पाठ्य-वस्तु का प्रस्तुतीकरण करना, छात्रों की क्रियाओं को नियन्त्रित करना, उनको अभिप्रेरण प्रदान करना है।
छात्र का स्थान शिक्षण में गौण होता है, वह केवल श्रोता का कार्य करता है और शिक्षक को आदर्श मानकर उसका अनुसरण करता है।
स्मृति स्तर पर अभिप्रेरण का बाह्य रूप ही अधिक प्रयुक्त किया जाता है। शाब्दिक प्रेरणा, पुरस्कार आदि विशेष रूप से प्रयुक्त किए जाते हैं।
4. मूल्यांकन प्रणाली
स्मृति स्तर के शिक्षण का मूल्यांकन मौखिक तथा लिखित परीक्षाओं द्वारा किया जाता है। परीक्षा में रटने की (स्मरण करने) क्षमता पर ही अधिक बल दिया जाता है।
इसके लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण में प्रत्यास्मरण पद, अभिमान पद आदि का प्रयोग किया जाता है। निबन्धात्मक परीक्षा अधिक उपयोगी नहीं होती है।
स्मृति स्तर के शिक्षण के लिए सुझाव
स्मृति स्तर के शिक्षण को अधिक उपादेय एवं एवं प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नांकित सुझाव दिये जा सकते है-
पुनरावृति एक लय में होनी चाहिए
पाठ्य-वस्तु को सार्थक बनाया जाए
प्रत्यास्मरण तथा पुनः प्रस्तुतीकरण का अधिक अभ्यास किया जाना चाहिए
पाठ्य-वस्तु क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत की जाए
थकान के समय शिक्षण नहीं करना चाहिए
समग्र-पद्धति का प्रयोग करना चाहिए
शिक्षण के सभी बिन्दुओं को समग्र रुप में प्रस्तुत करना चाहिए
अभ्यास के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए
स्मृति स्तर का शिक्षण केवल तथ्यों को रटने तथा ज्ञान उद्देश्यों की प्राप्ति की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं, अपितु बोध तथा चिन्तन स्तर के शिक्षण में भी सहायक होता है।
शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है या कह सकते हैं कि यह कक्षा में विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करने की एक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य छात्रा को सोचने के लिए प्रेरित करना है। शिक्षण और सीखने का घनिष्ट सम्बन्ध है, यहाँ तक कि शिक्षण सीखने का ही एक प्रत्यय माना जाता है, एक ही पाठ्य-वस्तु को विद्यालय के विभिन्न स्तरों पर पढ़ाया जाता है, क्योंकि पाट्य वस्तु का अपना स्वरूप होता है, जिससे शिक्षण के विभिन्न उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है और अधिगम के विभिन्न स्तरों को प्रभावित किया जाता है। शिक्षण के उद्देश्य अत्यन्त स्पष्ट होने चाहिए तभी शिक्षक प्रभावशाली साधनों का प्रयोग कर इसे अधिक शक्तिवान बना सकता है। शिक्षण की प्रक्रिया की परिस्थितियों को हम एक सतत क्रम, विचारशील क्रियाओं की अवस्थाओं या स्तरों में विभाजित कर सकते हैं। नीचे की अवस्थाएँ उच्च अवस्थाओं के लिए पूरक का कार्य करती हैं; जैसे—उद्देश्यों की प्राप्ति में ज्ञान उद्देश्यपूर्वक का कार्य करता है।
शिक्षण के इस सतत क्षेत्र को प्रमुख रूप से तीन स्तरों में विभाजित किया गया है।
1. स्मृति स्तर या स्मरण शक्ति स्तर की शिक्षण व्यवस्था
2. बोध स्तर या समझ स्तर की शिक्षण व्यवस्था
3. चिन्तन स्तर की शिक्षण व्यवस्था
ब्लूम द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Bloom's Classification
ब्लूम ने शिक्षण को तीन भागों में बाँटा, जिसे अंग्रेजी भाषा में 3H भी कहा गया है। ये 3H है-
Head (ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र)
Heart (भावात्मक ज्ञान क्षेत्र)
Hand (मनोसंचालित ज्ञान क्षेत्र)
Head (ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र)-
ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र बौद्धिक क्षमता के विकास से संदर्भित है, इसे 6 मुख्य स्तर पर विभाजित किया गया है-
ज्ञान --ज्ञान का सम्बन्ध वस्तु की जानकारी से है।
बोध -बोध का अर्थ समझने की क्षमता से है।
उपयोग -यह स्तर अमूर्त ज्ञान को मूर्त रूप में लाना है।
विश्लेषण -इस स्तर में प्राप्त सूचना को घटकों में विभाजन है।
संश्लेषण -यह सूचना घटकों का समावेशित स्तर है।
मूल्यांकन -मूल्यांकन सतत प्रक्रिया के रूप में होता है। यह विशेष प्रयोजनों में प्रयुक्त तरीके और सामग्री के बारे में किया गया निर्णय है।
Heart (भावात्मक ज्ञान क्षेत्र)
इस ज्ञान क्षेत्र में मनोभाव या मनोदृष्टि प्रेरणा, शिक्षण की सहभागिता, अनुशासन एवं इनके जैसे अन्य मूल्यों को समावेशित किया जाता है। इसके भी पाँच मुख्य स्तर है-
आकलन -जो हम सीखते है उसकी महत्ता
आग्रहण -सुनने की इच्छा
प्रतिक्रिया -सहभागिता की इच्छा
संयोजन -मिलान करना
निरूपण -अन्तर करना या अभिव्यक्त करना
Hand (मनोसंचालित ज्ञान क्षेत्र)
इस ज्ञान क्षेत्र को मनोगत्यात्मक, मनोप्रेरक या क्रियात्मक ज्ञान क्षेत्र भी कहा जाता है। यह तकनीकी कौशल के अभिग्रहण से सम्बन्धित है।
इस ज्ञान क्षेत्र के भी पाँच स्तर है-
हस्तकौशल - इसमें मशीनरी, उपकरण आदि का प्रयोग की कुशलता है
प्रतिरूपता - इस स्तर पर शिक्षार्थी के कौशल को निखारा जाता है।
स्पष्ट अभिव्यक्ति - यह स्तर सतत अभ्यास पर निर्भर करता है।
परिशुद्धता - इस स्तर पर बार-बार अभ्यास कर सुधार एवं शुद्धता आती है।
प्राकृतिकरण - इस स्तर पर शिक्षार्थी, शिक्षण के अनुरूप कौशल को आत्मसत् करना, संशोधन करना, नई तकनीकों को नियत करना इत्यादि को आत्मसत् करता है।
शिक्षण की प्रकृति सकारात्मक होती है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी में संज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक पक्षों को अभिप्रेरित किया जाता है। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जिसके गहन विश्लेषण पर ही शिक्षार्थी को शिक्षण की प्रकृति का बोध होता है। शिक्षण की प्रकृति को निम्न रूपों में समझा जा सकता है-
शिक्षण कला एवं विज्ञान है।
शिक्षण एक त्रिध्रुवीय प्रक्रिया है, जिसके तीन ध्रुव शिक्षक, बालक और पाठ्यक्रम है।
शिक्षण उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।
शिक्षण अन्तःप्रक्रिया है।
शिक्षण उपचरात्मक प्रक्रिया है।
शिक्षण विकासात्मक प्रक्रिया है।
शिक्षण एक भाषायी प्रक्रिया है।
शिक्षण में विद्यार्थियों की पाठ्यचर्या तथा विषयवस्तु का विश्लेषण तार्किक आधार पर ही किया जाता है।
शिक्षण की निर्देशन प्रक्रिया का प्रारूप छः स्तरों पर किया जाता है, जो कि निम्नलिखित है-
शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें बहुत से कारक शामिल होते है, और सीखने वाला इस प्रक्रिया के माध्यम से ज्ञान और कौशल को अर्जित करता है। शिक्षण का सामान्य अर्थ ‘शिक्षा प्रदान करना है’ जबकि इसका शाब्दिक अर्थ ‘सीखना या सीख देना है’। यह एक सामाजिक प्रक्रिया है, जो शिक्षण के मानवीय मूल्यों को विकसित करती है।
विस्तृत रूप से शिक्षा का तात्पर्य औपचारिक या अनौपचारिक रूप से आजीवन सीखते-सिखाते रहना है, किन्तु संकुचित रूप से शिक्षा का अर्थ औपचारिक रूप से किसी शिक्षण संस्थान में शिक्षा ग्रहण करने से है। वर्तमान शिक्षा परिवेश में शिक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में अधिगंम उत्पन्न करके सिखाना है न की बलपूर्वक ज्ञान को मस्तिष्क में बिठाना। शिक्षण के द्वारा शिक्षार्थी नवीन ज्ञान का अर्जन करता है, इस सन्दर्भ में विद्वानों ने शिक्षण की निम्नलिखित परिभाषाएं दी है-
रियान्स के अनुसार, “दूसरों को सीखाने, दिशा-निर्देश देने एवं उन्हें निर्देशित करने की प्रक्रिया ही शिक्षण है”।
गेज के अनुसार, “शिक्षण एक पारस्परिक प्रभाव है, जिसका उद्देश्य दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों में अपेक्षित परिवर्तन लाना है”।
बी ओ स्मिथ के अनुसार, “अधिगम को अभिप्रेरित करने वाली क्रिया शिक्षण है”।
जॉन डीवी के अनुसार, “शिक्षण एक त्रिमुखी प्रक्रिया है”।
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही विराजमान पूर्णता का आविर्भाव है”।