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Showing posts from March, 2020

भारतीय दर्शनों का परिचय { Introduction to Indian Philosophies }

॥ नवदर्शन परिचय ॥ आर्यावर्त की तर्कविद्या में छः दर्शन प्रसिद्ध हैं , जिनमें - वेदों को प्रमाण माना है , और वेदोक्त सिद्धान्तों पर तर्क से विचार किया है , अतएव इनको वेदों के उपांग कहते हैं । इनसे अतिरिक्त तीन दर्शन और हैं , जिनमें न वेदों को प्रमाण माना है , न वेदोक्त सिद्धान्तों पर विचार किया है , प्रत्युत आक्षेप किये हैं , और अपने-अपने स्वतन्त्र सिद्धान्तों को तर्क से स्थापन किया है । इस दृष्टि से दर्शनों के दो भेद हो जाते हैं , वैदिक और अवैदिक । वैदिक छः दर्शन यह हैं – वैशेषिक , न्याय , सांख्य , योग , मीमांसा और वेदान्त । अवैदिक तीन दर्शन यह हैं - चार्वाक , बौद्ध और आर्हत । इनमें से चार्वाक दर्शन , नास्तिकदर्शन क्योंकि उसमें परलोक को नहीं माना है , शेष सारे दर्शन आस्तिक दर्शन हैं , क्योंकि उनमें परलोक को माना है । पर वैदिक लोगों की दृष्टि से बौद्ध और आर्हत भी नास्तिकदर्शन ही हैं , क्योंकि वह वेदबाह्य हैं , और वेद के निन्दक हैं । भारतीय दर्शनों के अध्ययन में इन दर्शनों का क्रम यह रहेगा , पहले अवैदिक , फिर वैदिक , क्योंकि अवैदिकदर्शन वैदिक दर्शनों के पूर्वपक्षी हैं , और वैदिक...

।। न्याय दर्शन ।। न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम्

समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः च विशेषापेक्षः विमर्शः संशयः  ।।१.१.२३।। यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।१.१.२४।। लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।१.१.२५।। सूत्रार्थ - समानानेकधर्मोपपत्तेः = समान तथा अनेक धर्म को प्राप्ति , विप्रतिपत्तेः = अप्राप्ति , च = और , उपलब्ध्यनुपलब्ध्य =  उपलब्धि और अनुपलब्धि की , व्यवस्थातः = व्यवस्था होने से , विशेषापेक्षाः = विशेष धर्म के प्रत्यक्ष न होने से , विमर्शः = एक वस्तु में विपरीत ज्ञान का होना ही , संशय = संदेह है ।   यम् = जिस , अर्थम् = अर्थ के , अधिकृत्य = अधकार से   प्रवर्तते = प्रवृत्ति होती है , तत् = उस अधिकार को , प्रयोजनम् = प्रयोजन कहते हैं । यस्मिन् = जिस , अर्थे = पदार्थ में , लौकिकपरीक्षकाणाम् = सांसारिक और परीक्षा करने वाले मनुष्य की , बुद्धि साम्यम् = बुद्धिसमान पाई जाय , सः = वह , दृष्टान्तः = दृष्टान्त है । व्याख्या - एक ही वस्तु में समान धर्म के प्रत्यक्ष होने और उमके विशेष धर्म अप्रत्यक्ष रहने से उसी वस्तु में दो , परस्पर विरोधी भावों...

।। न्याय दर्शन ।। प्रमेयप्रकरणम्

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।१.१.९।। इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गमिति ।।१.१.१०।। चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।।१.१.११।। घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ।।१.१.१२।। पृथिवी आपः तेजः वायुः आकाशमिति भूतानि ।।१.१.१३।। गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणाः तदर्थाः ।।१.१.१४।। बुद्धिः उपलब्धिः ज्ञानमिति अनर्थान्तरम् ।।१.१.१५।। युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।।१.१.१६।। प्रवृत्तिः वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ।।१.१.१७।। प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ।।१.१.१८।। पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ।।१.१.१९।। प्रवृत्तिदोषजनितः अर्थः फलम् ।।१.१.२०।। बाधनालक्षणं दुःखम् ।।१.१.२१।। तदत्यन्तविमोक्षः अपवर्गः ।।१.१.२२।। सूत्रार्थ - आत्म शरीरेन्द्रियार्थ = आत्मा , शरीर , इन्द्रिय , अर्थ , बुद्धि , मन , प्रवृत्ति , दोष , प्रेत्यभाव , फल , दुःख और मोक्ष , तु = यह बारह , प्रमेयम प्रमेय कहे गये हैं । इच्छाद्वेषप्रयत्न सुखदुःख ज्ञानान्य - इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , सुख , दुःख और ज्ञान , इति = यह , आत...

।। न्याय दर्शन ।। [प्रमाणप्रकरणम्]

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥१.१.३॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥१.१.४॥ अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववत्शेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥१.१.५॥ प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनमुपमानम् ॥१.१.६॥ आप्तोपदेशः शब्दः ॥१.१.७॥ सः द्विविधः दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥१.१.८।। सूत्रार्थ - प्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दा : = प्रत्यक्ष , अनुमान , उपमान और शब्द , प्रमाणानि = यह चारों प्रमाण कहे गये हैं । इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नम् = इन्द्रिय और उसके विषय के संयोग से उत्पन्न होने वाला , ज्ञानम् = ज्ञान , अव्यपदेश्यम् = न कहा गया , अव्यभिचारि = व्यभिचार दोष से रहित और , व्यवसायात्मकम् = संदेह से रहित होने के कारण , प्रत्यक्षम् प्रत्यक्ष सिद्ध प्रमाण है । तत्पूर्वकम् लक्षण के द्वारा पदार्थ का जो ज्ञान होता है , वह , अनुमानम् = अनुमान है , च = और वह अनुमान , पूर्ववत् = कारण से कार्य का तथा , शेषवत् कार्य से कारण का प्रयोजन होने से , सामान्यतोदृष्टम् = सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहा गया है । यह अनुमान , त्रिविधम् = तीन प्रकार का है । प्...

।। न्याय दर्शन ।। [अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्]

।। अथ प्रथमः अध्यायः ।। [अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम्] प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात्निःश्रेयसाधिगमः ॥१.१.१॥ दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायातपवर्गः ॥१.१.२॥ सूत्रार्थ - प्रमाण , प्रमेय , संशय , प्रयोजन , दृष्टान्त , सिद्धान्त , अवयव , तर्क , निर्णय , वाद , जल्प , वितण्डा , हेत्वाभास , छल , जाति , निग्रह और स्थान इनके , तत्वज्ञानात् तत्वज्ञान के होने से , निःश्रेयस = मोक्ष की , अधिगमः = प्राप्ति होती है । दुःख जन्मप्रवृत्तिदोपमिथ्याज्ञानानाम् = दुःख , जन्म , प्रवृत्ति दोष और मिथ्या ज्ञान , में , उत्तरोत्तरापाये एक के पश्चात् दूसरे से छुटकारा पाने पर , तदन्तरापायात् = उसमें अन्तर की प्राप्ति से , अपवर्गः = मोक्ष की प्राप्ति होती है । व्याख्या - प्रमेय , संशय आदि सोलह प्रकार के प्रमाण कहे गये हैं । न्याय में यही सोलह पदार्य माने जाते हैं । जिस साधन से प्रमाता विषय को प्राप्त करता है , उस साधन को प्रमाण और ग्रहण किये जाने चाले विषय को प्रमेय कहते हैं । इन सब...

शोध के उपागम Research Approach

शोध के उपागम समाजशास्त्र के शोधकर्ताओं के मध्य शोध के दो प्रमुख उपागम है - प्रत्यक्षवाद और  उत्तर प्रत्यक्षवाद  प्रत्यक्षवाद प्रत्यक्षवाद ( Positivism )  प्रत्यक्षवाद प्रत्यक्षवाद की वैज्ञानिक व्याख्या सर्वप्रथम फ्रांसीसी विचारक ऑगस्ट कॉम्टे ने की थी , इसलिए कॉम्टे को ' प्रत्यक्षवाद का जनक ' कहा जाता है । कॉम्टे ने प्रत्यक्षवाद की व्याख्या अपनी रचनाओं Course of Positive Philosophy' ( 1842 ) तथा The System of Positive Polity'( 18510 में की है । कॉम्टे का प्रत्यक्षवाद विज्ञान पर आधारित है। कॉस्टे के अनुसार, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपरिवर्तनीय प्राकृतिक नियमों द्वारा व्यवस्थित व निर्देशित होता है । अत : इसे केवल विज्ञान की विधियों द्वारा समझा जा सकता है , न कि धार्मिक या तात्विक आधारों पर । इस आधार पर कहा जा सकता है कि निरीक्षण , परीक्षण , प्रयोग और वर्गीकरण पर आधारित वैज्ञानिक विधियों द्वारा सब कुछ समझना और उससे ज्ञान प्राप्त करना ही प्रत्यक्षवाद है । कॉम्टे के अनुसार प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण के चरण निम्नलिखित है- सर्वप्रथम अध्ययन - विषय को चुनते हैं  अवलोकन य...

अनुसन्धान का महत्व The importance of research

अनुसन्धान का महत्व वर्तमान शैक्षणिक व्यवस्था में अनुसन्धान का महत्व दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, क्योंकि प्रत्येक शिक्षण संस्थान एवं पाठ्यक्रम में शोध को अनिवार्य रूप से शामिल कर दिया गया है। इसी आधार पर शोध के निम्नलिखित महत्वों की पहचान की गई है- अनुसन्धान ज्ञान को विस्तारित तथा परिमार्जित करता है।  समाज में नए ज्ञान एवं विचारों का प्रसार करता है।  अनुसन्धान किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है। अनुसन्धान व्यक्ति के बौद्धिक चिन्तन एवं विकास को गति प्रदान करता है।  अनुसन्धान किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह को समाप्त करने में सहायक सिद्ध होता है।   अनुसन्धान किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु वैज्ञानिक तरीकों का प्रतिपादन करता है।  अनुसन्धान का महत्व किसी भी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में प्रयुक्त होता है।