Monday, March 9, 2020

।। न्याय दर्शन ।। न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम्


समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः च विशेषापेक्षः विमर्शः संशयः ।।१.१.२३।।
यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।१.१.२४।।
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।१.१.२५।।
सूत्रार्थ - समानानेकधर्मोपपत्तेः = समान तथा अनेक धर्म को प्राप्ति, विप्रतिपत्तेः = अप्राप्ति, च = और, उपलब्ध्यनुपलब्ध्य = उपलब्धि और अनुपलब्धि की, व्यवस्थातः = व्यवस्था होने से, विशेषापेक्षाः = विशेष धर्म के प्रत्यक्ष न होने से, विमर्शः = एक वस्तु में विपरीत ज्ञान का होना ही, संशय = संदेह है ।  यम् = जिस, अर्थम् = अर्थ के, अधिकृत्य = अधकार से  प्रवर्तते = प्रवृत्ति होती है, तत् = उस अधिकार को, प्रयोजनम् = प्रयोजन कहते हैं । यस्मिन् = जिस, अर्थे = पदार्थ में, लौकिकपरीक्षकाणाम् = सांसारिक और परीक्षा करने वाले मनुष्य की, बुद्धि साम्यम् = बुद्धिसमान पाई जाय, सः = वह, दृष्टान्तः = दृष्टान्त है ।
व्याख्या - एक ही वस्तु में समान धर्म के प्रत्यक्ष होने और उमके विशेष धर्म अप्रत्यक्ष रहने से उसी वस्तु में दो, परस्पर विरोधी भावों का उत्पन्न होना संशय अयवा भ्रम है । जैसे अंधेरे में रस्सी को देखा और उसे सर्प के आकार का पाकर उसके सर्प होने का भ्रम हो गया । उस समय रस्सी के धर्म अप्रत्यक्ष हो जाते हैं और सर्प के लक्षण ही दिखाई देते हैं इसीलिये, सूत्रकार ने इस अवस्था को 'संशय' कहा है । ग्रहण और त्याग रूप प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाली इच्छा ही अर्थ - अधिकार है । क्योंकि उस अर्थ अधिकार के द्वारा ही हानि या लाभ की प्राप्ति कराने से सम्बन्धित विषय में प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । इसी को सूत्रकार ने प्रयोजन कहा है ।
सांसारिक तो सभी जीव हैं, परन्तु इस सूत्र में सांसारिक शब्द का विशेष प्रयोग इस अर्थ का सूचक है कि जिसको शास्त्र आदि का ज्ञान न हुआ हो और परीक्षक उसे कहा है जिसे सभी पदार्थों का ज्ञान हो । इस प्रकार सांसारिक और परीक्षक दोनों प्रकार के मनुष्य की बुद्धि जिस विषय में समान हो, उसे दृष्टान्त समझना चाहिये । 
*विशेष - अनिश्चयात्मक ज्ञान को संशय कहते हैं । यह तीन प्रकार का है-
(१) दो वस्तुओं में कोई धर्म साधारण होने के कारण होने वाला संशय, जैसे - यह स्थाणु है कि पुरुष । स्थाणु ( खम्भे ) और पुरुष, दोनों में सामान्य धर्म एक ही है- ऊंचा होना । विशेषतायें स्पष्ट नहीं हैं- स्थाणुत्व का निर्णय करने वाली विशेषतायें जैसे वक्रता या कोटरादि होना अथवा पुरुषत्व का निर्णय करने वाली विशेषतायें जैसे हाथ, पैर आदि- कोई भी स्पष्ट नहीं हैं, इसीसे संशय होता है ।
(२) किसी वस्तु के असाधारण धर्म दिये जाने के कारण होने वाला संशय, जैसे प्रथिवी नित्य है कि अनित्य । पृथिवी का असाधारण ( अपना ) धर्म है गन्ध से युक्त होना । यह 'गन्धवत्त्व' न तो अनित्य पदार्थों में है न नित्य में ही, केवल पृथिवी में ही इसकी सत्ता है । पृथिवी की नित्यता या अनित्यता के ज्ञान का साधन न होने के कारण ही ऐसा संशय हुआ ।
(३) विभिन्न शास्त्रकारों में मतभेद होने के कारण उत्पन्न संशय, जैसे- कुछ लोग कहते हैं कि शब्द नित्य है, दूसरे कहते हैं कि शब्द अनित्य है । इन दोनों का मतभेद देखकर बीच वाला घबरा उठता है और संशय होता है ।
जिस कार्य को ध्यान में रखकर पुरुषों की प्रवृत्ति होती है वही प्रयोजन है । यह दो प्रकार का है- दृष्ट प्रयोजन और अदृष्ट प्रयोजन । कोई वस्तु त्याज्य या ग्राह्य होती है । उसे त्यागने या ग्रहण करने को मनुष्य उपाय करता है । वह वस्तु ही प्रयोजन कही जाती है । दृष्ट प्रयोजन प्रत्यक्ष होता है जैसे अवघात करने का प्रयोजन है भूसों को पृथक् करना । अदृष्ट प्रयोजन विहित तथा परोक्ष होता है जैसे- ज्योतिष्टोम- याग का प्रयोजन स्वर्गप्राप्ति ।
व्याप्ति की स्थापना का जो आधार होता है वही व्याप्ति है । इसके दो भेद हैं- साधर्म्य दृष्टान्त और वैधर्म्य दृष्टान्त । न्यायसूत्र में कहा गया है कि लौकिक परीक्षकों की बुद्धि जिस विषय पर एकमत हो जाय वही दृष्टान्त है । दृष्टान्त का अपना अर्थ है- जिसके द्वारा अन्त या निश्चय देखा गया हो, पाया गया हो । 'यत्र धूमः तत्राग्निः' इस व्याप्ति का निश्चय करने के लिए महानस ( रसोईघर ) का उदाहरण देते हैं- यही दृष्टान्त है । रसोईघर अपने पक्ष का पोषक होने के कारण साधर्म्य दृष्टान्त है । इसी व्याप्ति में 'सरोवर' वैधर्म्य दृष्टान्त होगा क्योंकि जब व्यतिरेक- विधि से व्याप्ति पर आयेंगे- ' जहाँ अग्नि नहीं वहाँ धूम नहीं जैसे सरोवर', तब यह दृष्टान्त काम देगा । फलतः अन्वय विधि का दृष्टान्त साधर्म्य है, व्यतिरेक-विधि का दृष्टान्त वैधर्म्य ।
*विशेष - वाचस्पति मिश्र ने अपने न्यायसूचीनिबन्ध में उक्त तीन पदार्थों को न्यायपूर्वांग कहा है क्योंकि ये न्याय अर्थात् पंचावयव अनुमान की भूमिका के रूप में हैं । न्यायसूत्र में संशय के पाँच भेद माने गये हैं क्योंकि वहाँ लक्षण ही कुछ दूसरे ढंग का है, यद्यपि फल दोनों का एक ही है- समानानेकधर्मोपपत्ते विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः ।।१।१।२३।। संशय वह ज्ञान है जिसमें विशेष धर्म की अपेक्षा रहती है । निम्नलिखित पाँच कारणों से उत्पन्न होने के कारण संशय पाँच प्रकार का है-
(१) समानधर्मोपपत्ति - जब समान धर्मों की प्राप्ति कई वस्तुओं में हो और विशेष धर्म की अपेक्षा हो तब ऐसा ज्ञान संशय है । उच्चता-धर्म स्थाणु और पुरुष दोनों में है । निविकल्पक ज्ञान के अनन्तर दोनों वस्तुओं में संशय हो गया । जब हाथ-पैर आदि के रूप में विशेष धर्मों का ज्ञान हो जायगा तब संशय की निवृत्ति होगी कि यह मनुष्य है ।
(२) अनेकधर्मोपपत्ति- अनेक का अर्थ है सजातीय और विजातीय । जब असामान्य धर्मों का ज्ञान होता है तब भी संशय होता है । शब्द का श्रवण करके यह पूछना कि यह नित्य है या अनित्य, संशय है । शब्द का धर्म मनुष्य, पशु आदि अनित्य पदार्थों में भी नहीं है और न नित्य परमाणुओं में ही है । गन्धवती होने के कारण पृथिवी, जल आदि द्रव्यों से भी विशिष्ट है, गुणकर्म से भी विशिष्ट है । अब संशय हो गया कि पृथिवी द्रव्य है कि गुण या कर्म ।
(३) विप्रतिपत्ति - शास्त्रों में परस्पर विवाद होने से भी संशय होता है । शब्द की नित्यता और अनित्यता का उदाहरण प्रचलित ही है।
(४) उपलब्ध्यव्यवस्था- कभी-कभी हम देखते हैं कि प्रत्यक्ष की अव्यवस्था से भी संशय होता है । तडागादि में तो विद्यमान होने पर जल का प्रत्यक्ष होता है पर मृगमरीचिका ( Mirage ) में अविद्यमान होने पर भी इसका प्रत्यक्ष होता है । अब संशय हआ कि जल का प्रत्यक्ष क्या केवल विद्यमान अवस्था में ही होता है या अविद्यमान होने पर भी ।
(५) अनुपलब्ध्यव्यवस्था- कभी-कभी अप्रत्यक्ष की अव्यवस्था से संशय होता है । मूली में ( Radish ) जल है पर दिखलाई नहीं पड़ता है । पत्थर में भी जल नहीं दीखता पर वहाँ वास्तव में नहीं है । क्या जल विद्यमान या अविद्यमान दोनों ही दशाओं में दिखलाई नहीं पड़ता ? यही संशय है ।


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