व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है।
यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है।
थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।”
व्याख्यान विधि के गुण
यह विषय-वस्तु की क्रमबद्धता की उत्तम विधि है।
यह प्रभावशाली व आकर्षक, प्रेरणात्मक शिक्षण विधि है।
यह उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी है।
यह समय, परिश्रम व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है।
इसके द्वारा एक समय में विद्यार्थीयों के बड़े समूह का शिक्षण सम्भव है।
यह विद्यार्थीयों को सुनने व ध्यान लगाने में प्रशिक्षित करती है।
यह विद्यार्थीयों में तर्कशक्ति का विकास करती है। इसमें विषय का तार्किक क्रम बना रहता है।
व्याख्यान विधि के दोष
यह छोटी कक्षाओं के लिए अनुपयोगी है।
इसमें विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता बने रहते है तथा यह ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की पूर्ण अवहेलना करती है।
यह केवल स्मृति केन्द्रित विधि है।
इसमें विद्यार्थी अधिक समय तक ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते, जिससे उनमें शिक्षण के प्रति रुचि कम हो जाती है। इसमें सैद्धान्तिक ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है, यह एक प्रभुत्ववादी विधि है।
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