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II ईशोपनिषद् II क्या कोई मनुष्य बिना धन के सिद्ध मनोरथ हो सकता है ?



" मंत्र - ईशावास्यमिदsसर्व्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ १ ॥ 

शब्दार्थ - यत = जो, किञ्च = कुछ,  जगत्याम् = संसार में, जगत् = समष्टि व्यष्टि रूप से विद्यमान है, इदम् = यह, सर्वम् = सब, ईशावास्यम् = ईश्वर से रहने योग्य है, तेन = उस ईश्वर से, त्यक्तेन = दी हुई वस्तुओं से, भुञ्जीथाः = भोग करो, कस्यस्वित = किसी का, धनम् = धन, मा गृधः = मत ग्रहण करो ।

अर्थ - जो कुछ इस नाशवाले संसार में भाग या पूर्ण वस्तुएँ हैं, वह सब ईश्वर के रहने का घर है या ईश्वर से ढकी हुई हैं अर्थात् प्रत्येक वस्तु में विद्यमान है । कोई पर्वत की गहरी से गहरी गुफा नहीं, जिसमें ईश्वर विद्यमान न हो, कोई समुद्र की गहरी से गहरी तह नहीं, जहाँ परमात्मा न हो । कोई पर्वत की चोटी ऐसी नहीं जहाँ परमात्मा न हो। सूर्यलोक, चन्द्रलोक, तारागण इत्यादि जितने भी लोक लोकान्तर हैं, सब स्थानों में परमात्मा व्यापक है । किसी स्थान पर मनुष्य परमात्मा से छिप नहीं सकता । जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध करते हैं अर्थात् ईश्वर को छोड़ देते हैं । वे जन्म-मरण के दुःखों को भोगते हैं । इसलिये प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि परमात्मा को सब जगह व्यापक जाने, तो उसके विरुद्ध करने से दुःख की उत्पत्ति को समझकर कभी पाप करने के लिये उद्यत न हो । किसी का धन लेने की इच्छा न करे, क्योंकि परमात्मा का नियम है कि प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार भोग मिलता है और कोई मनुष्य उसके विरुद्ध अपनी इच्छा से भोग प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिये दूसरे का धन लेने की इच्छा से पाप तो अवश्य होगा और भोग में कुछ भी अन्तर नहीं आयेगा । इसीको बिना लाभ का पाप कहते हैं।
प्रश्न - यद्यपि इस वेद-मंत्र से ईश्वर का सर्व-व्यापी होना पाया जाता है, परन्तु हम ईश्वर को कहीं नहीं देखते। अब हम तुम्हारे इस वेद मंत्र को माने या अपनी आँखों से देखी हुई वस्तुओं का विश्वास करें । यदि ईश्वर है, तो बताओ कहाँ है ? 
उत्तर - बहुत सी वस्तुएँ हैं, जो सूक्ष्मता और दूरी इत्यादि के कारण प्रतीत नहीं होती और उनकी सत्ता को सब मनुष्य मानते हैं जैसे बुद्धि, आत्मा, दुख इत्यादि हैं । इससे सिद्ध है कि संसार में ऐसी वस्तुएँ विद्यमान हैं, जिनको मनुष्य इन्द्रियों से नहीं जान सकते, उनमें से एक ईश्वर है । यह प्रश्न कि ईश्वर कहाँ है? नितान्त अशुद्ध है; क्योंकि कहाँ का शब्द एक देशी के लिये आता है और वेद-मंत्र ने ईश्वर को सर्वव्यापक बताया है । जैसे कोई कहे कि दूध में घी या मिश्री में मिठास कहाँ है । तो उत्तर होगा सर्वत्र । इससे कहाँ का आक्षेप एक देशी वस्तुओं के लिये उचित प्रतीत होता है, सर्वव्यापी के लिये नहीं ।
प्रश्न - जो मनुष्य ईश्वर को नहीं मानते, वे अधिक धनी प्रतीत होते हैं, जैसे चोनी इत्यादि नास्तिक जातियाँ । इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर के मानने से दरिद्रता और दुख प्राप्त होते हैं । 
उत्तर - प्रथम तो यह प्रश्न ठोक नहीं कि नास्तिक मनुष्य अधिक धनी होते हैं; क्योंकि ईसाई, यहूदी जो ईश्वर की सत्ता को मानते हैं, बड़े-बड़े धनी देखे जाते हैं । दूसरे धनी होना कोई अच्छी बात नहीं; किन्तु जितने धनी देखे जाते हैं, उन सबमें और अधिक बुराइयाँ देखी जाती हैं । वेदों के मानने वाले तो इस प्रकार के धन को जिससे मुक्ति के मार्ग में बाधा के अतिरिक्त अन्य कोई लाभ प्राप्त नहीं होता, बुरा मानते हैं ।
प्रश्न - क्या कोई मनुष्य बिना धन के सिद्ध मनोरथ हो सकता है ? 
उत्तर - संसार में तो मनुष्य के लिये धन की आवश्यकता प्रतीत होती है, परन्तु उससे मनुष्य अपने नियत स्थान से नितान्त दूर हो जाता है । जो लोग संसार और दीन दोनों एक साथ प्राप्त करना चाहते हैं, वे बड़े मूर्ख है ।
प्रश्न - क्या वेदों में धन कमाने की आज्ञा नहीं है ? 
उत्तर - वेदों में प्रत्येक वस्तु के विषय में, जिससे जीवन का काम पड़ता है वर्णन है । नीच मनुष्य ही धन की इच्छा भी करते है । परन्तु वेदों में धन को कहीं मुक्ति का कारण नहीं लिखा; किन्तु योगाभ्यास और वैराग्य को मुक्ति का कारण बताया है । वैराग्य का अर्थ सब सांसारिक वस्तुओं की इच्छा छोड़ना है । जो मनुष्य सांसारिक वस्तुओं की इच्छा में फँसे हैं, वही ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं । जितने झगड़े संसार में फैले हैं; उन सबका कारण दूसरों का अधिकार लेना है । यदि मनुष्य केवल इसी वेद-मंत्र के समान आचरणवाले हो जावें, तो लड़ाई-झगड़े सब दूर हो जावें; चोरी, लूट-मार और ठगी का नितान्त अन्त हो जावे; पुलिस और सेना की आवश्यकता न रहे, अदालतें बन्द दिखाई दें । तात्पर्य यह है कि जितनी बुराइयाँ आज संसार में दिखाई देती हैं, कहीं उनका चिन्ह भी न दिखाई दे और प्रत्येक मनुष्य संसार में स्वर्ग से बढ़कर आनन्द उठाये ।
------ ऋषि दयानन्द कृत उपनिषद् - प्रकाश से

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