अपने लक्ष्य को मेहनत से वरण करना ही प्रत्येक विद्यार्थी का एकमात्र ध्येय होना चाहिए - विकास विद्यालंकार
Tuesday, July 9, 2019
Wednesday, July 3, 2019
रेट में छिपा कुआँ
रेट में छिपा कुआँ
एक दूर-दराज़ देश में, एक व्यापारी रहता था जो सामान खरीदने और बेचने के लिये अलग-अलग नगरों की यात्रायें करता था. उसके पास पाँच सौ बैल-गाड़ियाँ थीं जिन पर वह अपना सामान और अपने बैलों और चालकों के लिए पानी और लकड़ियाँ लाद लेता था. एक मार्गदर्शक सबसे आगे-आगे चलता था. और व्यापारी का बेटा, जो दुनिया देखने को बहत उत्सुक था, मार्गदर्शक के साथ उसकी गाड़ी में यात्रा करता था. व्यापारी स्वयं सबसे अंतिम गाड़ी में आता था.पूर्व से पश्चिम की ओर यात्रायें करते हए, व्यापारी को एक विशाल रेगिस्तान पार करना पड़ता था. वहाँ की रेत इतनी महीन थी कि वह लड़के के हाथ की मट्ठी से भी फिसल जाती थी और इतनी गहरी थी कि बैलों के खर हर कदम पर रेत के भीतर धंस जाते थे. रेत के उस सागर में सारे पथ-मार्ग मिट जाते थे और कोई रास्ता दिखाई न देता था. उस रेगिस्तान को पार करना बहत कठिन होता था.
हर दिन सूर्य उदय के बाद रेत गर्म होने लगती थी और देखते ही देखते चूल्हे समान तपने लगती थी. कोई मनुष्य या पशु उस तपती रेत पर चल न सकता था. इसलिये व्यापारी का काफिला रात में ही यात्रा करता था. ध्रुव तारे
और पश्चिम दिशा के कुछ तारों को देख कर मार्गदर्शक काफिले का मार्ग दर्शन करता था.
एक दिन व्यापारी के लड़के ने मार्गदर्शक से कहा, "आप तारों को देख कर रास्ता कैसे ढूँढ़ते हैं? यह कला मैं सीखना चाहता हूँ. मुझे सिखायें ."
लेकिन मार्गदर्शक ने कहा, "चुप रहो, सियार के बच्चे, मुझे तंग न करो."
"कम से कम ध्रुव तारा तो मझे दिखा दो," लड़के ने कहा.
मार्गदर्शक ने चाबुक से संकेत किया. “वह रहा ध्रुव तारा. जब हम पश्चिम दिशा की ओर जाते हैं तो धुव तारा हमारे दाहिनी तरफ होना चाहिये, कुछ और तारे भी हैं जिन्हें मैं देखता रहता है. यह कठिन है. अब जाओ और अपने पिता के पास बैठो, मैं तुम्हारी बकबक से तंग आ चुका हँ." उसने लड़के को अपनी गाड़ी से बाहर धकेल दिया.
रात दर रात, सारी रात लड़के ने अपने पिता के साथ काफिले के अतिम गाड़ी में यात्रा की. हर दिन भोर के समय जब मार्गदर्शक संकेत देता, सारे गाड़ी-चालक अपनी-अपनी गाड़ियाँ एक गोल चक्कर में रोक देते और बैलों को खोल देते. उन सहनशील जानवरों को पीने के लिये पानी और खाने के लिये चारा देते. फिर आग जला कर वह अपने लिए चावल पकाते. फिर वह तंब लगाते और दिन की गर्मी से बचने के लिये अधिकतर चालक तंबओं में सो जाते.
लेकिन एक दिन लड़के ने देखा कि मार्गदर्शक जागा हआ था और अपने दोस्तों के साथ पासा खेल रहा था.
शाम का भोजन करने के बाद जब रेत ठंडी हो गई और यात्रा शुरू करने का समय हआ, मार्गदर्शक बैठा-बैठा जम्हाई ले रहा था, जबकि सारे चालक आग बझा कर और पानी की मशकों से खुब सारा पानी पीकर और अपने तंब खोल कर यात्रा शुरू करने के लिये तैयार हो रहे थे.
"मार्गदर्शक से कहें कि मुझे अपने साथ बैठने थे," लड़के ने पिता से विनती की.
मार्गदर्शक ने मना कर दिया. वह बड़बड़ाया, यह लड़का मुझे तंग करता है और मैं काम नहीं कर पाता."
अगले दिन मार्गदर्शक बैठा-बैठा भुनभुनाता रहा और बिलकुल भी न सोया.
शाम के भोजन के बाद उसने चालकों से कहा, "कल हम इस सूनसान रेगिस्तान को पार कर लेंगे और एक नगर पहुँच जायेंगे. अब हम अपना बोझ कम कर सकते हैं और तेज गति से चल सकते हैं. पानी गिरा दो और लकड़ी फेंक दो. हमें इन चीजों की दुबारा जरूरत नहीं पड़ेगी."
व्यापारी को उस मार्गदर्शक पर पूरा भरोसा था. उसने चालकों को वही करने दिया जो मार्गदर्शक कह रहा था. गाड़ियों में रखी लकड़ियाँ उन्होंने फेंक दी और सारा पानी रेत पर डाल दिया. रात होने पर मार्गदर्शक ने हाथ उठा कर पश्चिम की ओर संकेत किया. काफिला उस पथहीन मरुस्थल में चल दिया.
मार्गदर्शक थका हआ था. रात के समय यात्रा करते हए उसे नींद आ गयी. जब वह सो रहा था तब बैलों को दिशा बताने के लिए कोई न था. धीरे-धीरे उल्टा घूम कर बैल, जिधर से वह आए थे, उसी पूर्व दिशा की ओर चलने लगे. सारी रात वह उसी दिशा में चलते रहे. सुबह होने के समय, काफिले के अंतिम गाड़ी में, व्यापारी का लड़का
भी सो गया.
भोर के समय जब उसने मार्गदर्शक को 'रुको! रुको!' चिल्ला कर कहते हए सुना, वह नींद से उठ गया. मार्गदर्शक की पुकार सुन कर, एक चालक ने दूसरे को, और दूसरे ने तीसरे को पुकारा और इस तरह अंतिम चालक ने 'रुको! रुको!' की पुकार सुनी.
लड़के ने आकाश की ओर देखा. आकाश में तारे गायब हो रहे थे. लेकिन ध्रुव तारा अभी चमक रहा था और उसके दाहिनी तरफ न था. वह तारा उसके बाई ओर था.
"हम गलत दिशा में जा रहे हैं। " मार्गदर्शक चिल्लाया. “ गाड़ियों को वापस मोड़ो! गाड़ियों को वापस मोड़ो। "
जैसे ही चालकों ने बैलगाड़ियाँ उलटी घुमा कर एक सीधी कतार बनाई,
लड़के ने अपने आसपास देखा और उसे एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया. यह एक बड़े वृत्त की परछाई थी, एक वृत्त जो लकड़ियों और लट्ठों का बना था और जो रेत से ढका हुआ था. उसे इस का अर्थ पता था. "यह वही जगह है जहां पिछली रात हमने अपना कैंप लगाया था। लड़के ने पिता से कहा.
मार्गदर्शक दौड़ा आया. वे झक कर रेत पर बैठ गया और लज्जा में अपनी छाती पीटने लगा. "मेरी ही गलती है। मेरी ही गलती है। हमारी लकड़ी और पानी रेत में समा गये हैं. हाय! पानी के बिना हम मर जायेंगे. सब समाप्त हो गया। "
चालकों ने बैल खोल दिए और तंबू लगाने लगे. लेकिन उनके दिलों में आशा की कोई किरण न थी. पानी के बिना बैल आगे न जा सकते थे. "पानी के बिना हम सब मर जायेंगे," व्यापारी ने अपने बेटे से कहा. "लेकिन हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिये. मेरे लौटने तक यहाँ प्रतीक्षा करो.'
"पिता जी, मझे भी अपने साथ आने दें," लड़के ने कहा. “शायद मैं आपकी कोई सहायता कर पाऊँ."
बहुत सवेरे, जब हवा अभी ठंडी ही थी, वह दोनों पैदल चल पड़े. यहाँ-वहाँ रेत की ढलानों में पानी की तलाश करने लगे. आखिरकार, दर एक घाटी में लड़के ने थोड़ी से रेगिस्तानी घास देखी. "पिता जी, उस घास
के नीचे पानी होना चाहिये, क्या ऐसा नहीं है?" उसने पूछा. "अन्यथा यह घास जीवित न रहती."
"सत्य है, मेरे बेटे," व्यापारी ने कहा, "बैलगाड़ियों के पास लौट जाओ और वहां जितने भी ताकतवर लोग हैं उन्हें यहाँ आने के लिए कहो. उन्हें कहो कि अपने साथ कुदालें लेते आयें."
आग उगलता हआ सूर्य आकाश में ऊपर होता जा रहा था. लेकिन काफिले तक सारे रास्ते लड़का दौड़ता हआ गया. उस के होठ सूख गये थे. उसने पिता का संदेश दिया और कुछ लोगों को अपने साथ लेकर पिता के पास आया.
आदमी घास के नीचे जमीन में खुदाई करने लगे. व्यापारी और लड़का उन्हें देख रहे थे. नीचे सख्त रेत थी, पर पानी नहीं था. गहरे गड्ढे में आदमी अपना पसीना बहा रहे थे. प्यास से उनके मुँह सूख गये थे. फिर कुदालें एक चट्टान से जा टकराईं.
"इस परिश्रम का यही पुरस्कार मिला। " आदमी चिल्लाए.
"सारी मेहनत बेकार गई. अब हम यहीं मर जायेंगे। " निराशा में उन्होंने अपनी कुदालें फेंक दी और काफिले की ओर लौट गये.
लेकिन लड़का उस गड्ढे के अंदर उतर गया और झुक कर उसने सुनने का प्रयास किया. “इस चट्टान के नीचे पानी बह रहा है," उसने पुकार कर पिता से कहा, "मैं हथौड़ा लेकर आता हूँ.”
लड़का एक बार फिर काफ़िले के पास लौट आया. उसने एक भारी हथौड़ा ढूँढा. उस लेकर वह पिता की ओर दौड़ पड़ा.
सूर्य की चमकती रोशनी में उसे कुछ दिखाई न पड़ रहा था. तपती रेत पर उसके पाँव जल रहे थे. जब वह गड्ढे के पास पहुंचा तो पिता ने सिर हिलाते हुए कहा, "मैं यह हथौड़ा नहीं चला सकता. अब मुझ में इतनी शक्ति नहीं है."
"मैं कोशिश करता हूँ,” लड़के ने कहा.
वह फिर से रेत में फिसलता हआ गड्ढे में उतर गया. उसके साथ बहत सी रेत भी नीचे आ गयी. उसने हथौड़ा अपने सिर के ऊपर उठाया. उसने परी ताकत लगा कर चट्टान पर हथोड़ा मारा. लेकिन चट्टान ट्टी नहीं.
अब चट्टान गिरती हई रेत से लगभग पूरी ढक चुकी थी.
लड़के ने दुबारा हथौड़ा मारा.
अचानक चट्टान के दो टुकड़े हो गये और पानी का झरना उछल कर बाहर बहने लगा. उस गड्ढे में पानी इतनी तेजी से भरने लगा कि लड़के के बाहर आते ही वह पानी से भर गया.
उस कँए से बैलों ने पानी पीया. सब आदमियों ने पानी पीया और उस ठंडे, निर्मल पानी में स्नान किया. उन्होंने गाड़ियों के अतिरिक्त पहिये वगैरह काट कर लकड़ी इकट्ठी की और उसे जला कर चावल पकाने लगे.
लड़के ने कएं के निकट एक झंडा लगा दिया ताकि अन्य प्यासे यात्री उसे ढूँढ पायें. मार्गदर्शक ने उसे कहा, "आओ, मेरी साथ बैठो. आज रात तारों को देख कर दिशा जानने की कला मैं तुम्हें सिखाऊँगा. और सूर्यास्त के बाद लड़का सबसे आगे वाली बैलगाड़ी में बैठ गया और वह सब यात्रा के अंतिम पड़ाव की ओर
चल दिए.
वहां पहँच कर व्यापारी और उसके लड़के ने अपनी कहानी बताई और जब उन्होंने अपना सारा सामान बेच दिया और घर लौट आये, उन्होंने वह कहानी फिर से सुनाई और इस तरह एक निर्जन जगह में चट्टान तोड़ कर एक मीठे पानी का कुआं खोजने वाले के रूप में उस लड़के की ख्याति उस रेगिस्तानी देश में फैल गयी.
समाप्त
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