तापमान किसी वस्तु की उष्णता की माप है । अर्थात्, तापमान से यह पता चलता है कि कोई वस्तु ठंढी है या गर्म।
उदाहरणार्थ, यदि किसी एक वस्तु का तापमान 20 डिग्री है और एक दूसरी वस्तु का 40 डिग्री, तो यह कहा जा सकता है कि दूसरी वस्तु प्रथम वस्तु की अपेक्षा गर्म है।
गैसों के अणुगति सिद्धान्त के विकास के आधार पर यह माना जाता है कि किसी वस्तु का ताप उसके सूक्ष्म कणों (इलेक्ट्रॉन, परमाणु तथा अणु) के यादृच्छ गति (रैण्डम मोशन) में निहित औसत गतिज ऊर्जा के समानुपाती होता है।
विमीय-सूत्र ज्ञात करना
ताप एक मूलभूत भौतिक राशि है अतः इसका विमीय सूत्र कोई एक प्रतीक चिन्ह होगा ।
भौतिकी में ताप की विमा को प्रकट करने के लिए θ प्रयुक्त किया जाता है ।
जब किसी व्युत्पन्न राशि को मूलभूत राशि के पदों में व्यक्त किया जाता है तो इसे मूलभूत राशियों की विभिन्न घातों के गुणनफल के रूप में लिखा जाता है । इन्हीं घातों को विमाएं कहते है । जैसे–
बल का मात्रक न्यूटन होता है, परन्तु जब इसको मूलभूत राशियों के रूप में लिखते है तब, इसका गणितीय सूत्र –
अतः बल की विमाएं द्रव्यमान में 1, विस्थापन या लम्बाई में 1, तथा समय मैं -2 है ।
भौतिक राशियों का विमीय-सूत्र
किसी भौतिक राशि के प्रतीकों को उसकी विमा सहित बड़े कोष्ठक [ ] के अन्दर लिखना उस भौतिक राशि का विमीय सूत्र कहलाता है । जैसे- बल की विमीय समीकरण
जहाँ M द्रव्यमान का विमीय प्रतीक है , L लम्बाई या विस्थापन का विमीय प्रतीक है, तथा T समय का विमीय प्रतीक है ।
वे मात्रक जिनके द्वारा मूलभूत भौतिक राशियों का मापन किया जाता है मूल मात्रक कहलाते ही । ये सात है
1- मीटर
2- किलोग्राम
3- सेकण्ड
4- ऐम्पियर
5- केल्विन
6- मोल
7- केण्डिला 1- मीटर
प्रकाश द्वारा निर्वात में एक सेकंड के 299,792,458 वें समय अंतराल में तय किए गए पथ की लंबाई एक मीटर है । ( 1983 से मान्य ) 2- किलोग्राम
फ्रांस में पेरिस के पास सेवरिस में अंतर्राष्ट्रीय माप - तोल विभाग में रखे प्लेटिनम - इरिडियम मिश्रधातु से बने सिलिंडर का द्रव्यमान मानक किलोग्राम है । ( 1889 से मान्य ) 3- सेकण्ड
एक सेकंड वह अंतराल है जो सीजियम के समस्थानिक - 133 के परमाणु के विशेष विकिरण के 9,192,631,770 कंपनों की अवधि के बराबर है । ( 1967 से मान्य ) 4- ऐम्पियर
एक ऐम्पियर वह नियत विद्युत् धारा है जो कि निर्वात में 1 मीटर की दूरी पर स्थित दो सीधे अनंत लंबाई वाले समानांतर एवं नगण्य वृत्तीय अनुप्रस्थ काट में प्रवाहित होने पर, तारों के बीच प्रति मीटर लंबाई पर 2×〖10 〗^(7 )न्यूटन का बल उत्पन्न करती है । ( 1948 से मान्य ) 5- केल्विन
जल के त्रिक - बिंदु के ऊष्मागतिक ताप के 1 / 273.16 वें भाग को केल्विन कहते है । ( 1967 से मान्य ) 6- मोल
मोल, किसी निकाय में पदार्थ की वह मात्रा है जिसमें मूल सत्वों ( तत्वों ) की संख्या उतनी ही है जितने 0.012 kg कार्बन - 12 में परमाणुओं की संख्या । ( 1971 से मान्य ) 7- केण्डिला
कैंडेला, किसी दिशा में 500×〖10 〗^(1 2)Hz आवृत्ति वाले स्रोत की ज्योति-तीव्रता है जो उस दिशा में (1/683) वाट, प्रति स्टिरेडियन की विकिरण तीव्रता का एकवर्णीय प्रकाश उत्सर्जित करता है । (1979 से मान्य)
प्रत्येक भौतिक राशि को परिभाषित करने के लिए एक मात्रक की आवश्यकता होती है। मूल तथा व्युत्पन्न भौतिक राशियों के आधार पर मात्रक भी दो प्रकार के होते है-
1- मूल मात्रक
2- व्युत्पन्न मात्रक
1- मूल मात्रक
मूलभूत भौतिक राशियों के मात्रक मूल मात्रक कहलाते है ।
मूलभूत भौतिक राशियों की सांख्य के आधार पर मूल मात्रक भी सात है, जिन्हें निम्न तालिका से स्पष्ट किया गया है -
2- व्युत्पन्न मात्रक
व्युत्पन्न भौतिक राशियों के मात्रक व्युत्पन्न मात्रक कहलाते है ।
मूल मात्रकों को छोड़कर अन्य सभी भौतिक मात्रक व्युत्पन्न मात्रक होते है जिन्हें मूल मात्रकों की सहायता से बनाया जाता है।
निम्न तालिका में कुछ व्युत्पन्न मात्रकों को स्पष्ट किया गया है -
आदि -----
मात्रकों की पद्धति
भौतिकी में चार प्रकार की मात्रक पद्धति प्रचलित है –
1- CGS पद्धति
2- MKS पद्धति
3- FPS पद्धति
4- SI पद्धति
1- CGS पद्धति
यह पद्धति मात्रकों की गॉसीय पद्धति कहलाती है ।
इसमें लम्बाई, द्रव्यमान तथा समय को सम्मिलित किया जाता है, जिनके संगत मात्रक निम्नलिखित है-
1- लम्बाई का मात्रक सेंटीमीटर (cm)
2- द्रव्यमान का मात्रक ग्राम (g)
3- समय का मात्रक सेकण्ड (s) होता है ।
2- MKS पद्धति
यह पद्धति मात्रकों की जॉर्जी पद्धति कहलाती है ।
इसमें लम्बाई, द्रव्यमान तथा समय को सम्मिलित किया जाता है, जिनके संगत मात्रक निम्नलिखित है-
1- लम्बाई का मात्रक मीटर (m)
2- द्रव्यमान का मात्रक किलोग्राम (kg)
3- समय का मात्रक सेकण्ड (s) होता है ।
3- FPS पद्धति
यह पद्धति मात्रकों की अमेरिकन पद्धति कहलाती है ।
इसमें लम्बाई, द्रव्यमान तथा समय को सम्मिलित किया जाता है, जिनके संगत मात्रक निम्नलिखित है-
1- लम्बाई का मात्रक फुट (Foot)
2- द्रव्यमान का मात्रक पॉउण्ड (Pound)
3- समय का मात्रक सेकण्ड (s) होता है ।
4- SI पद्धति
यह मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय पद्धति है तथा सम्पूर्ण भौतिकी में प्रयुक्त होती है ।
इसमें आधुनिक MKS पद्धति भी कहते है
इसमें सातों मूलभूत राशियाँ तथा दो पूरक राशियों को सम्मिलित किया जाता है, जिनके संगत मात्रक निम्नलिखित है-
1- लम्बाई का मात्रक मीटर (m)
2- द्रव्यमान का मात्रक किलोग्राम (kg)
3- समय का मात्रक सेकण्ड (s)
4- विद्युत धारा का मात्रक ऐम्पियर (A)
5- ताप का मात्रक केल्विन (K)
6- पदार्थ का मात्रक मोल (mol)
7- ज्योति तीव्रता का मात्रक केण्डिला (cd) होता है ।
दो पूरक राशियाँ
8- समतल कोण का मात्रक रेडियन (rad)
9- घन कोण का मात्रक स्टेरेडियन (sr) होता है ।
व्यवहारिक मात्रक
वैज्ञानिकों द्वारा गणितीय आधार पर बड़ी से बड़ी तथा छोटी से छोटी गणनाओं के लिए जो प्रायोगिक मात्रक प्रयुक्त किए जाते है, उन्हें व्यवहारिक मात्रक कहते है। कुछ व्यवहारिक मात्रक निम्नलिखित है-
स्वतंत्रता और परस्पर निर्भरता के आधार पर भौतिक राशियाँ दो प्रकार की होती है –
1- मूल राशियाँ
2- व्युत्पन्न राशियाँ
1- मूल राशियाँ
वे भौतिक राशियाँ जो किसी अन्य भौतिक राशि पर निर्भर नहीं करती, जो पूर्णतः स्वतंत्र होती है, मूल भौतिक राशियाँ कहलाती है ।
अब तक सात मूल भौतिक राशियाँ मानी गई है-
1- लम्बाई
2- द्रव्यमान
3- समय
4- विद्युत धारा
5- ताप
6- पदार्थ की मात्रा
7- ज्योति तीव्रता
2- व्युत्पन्न राशियाँ
वे भौतिक राशियाँ जो मूल भौतिक राशि पर निर्भर नहीं करती, तथा जो मूल राशियों की विभिन्न घातों से भाग या गुणनफल द्वारा व्युत्पन्न किया जा सकता है, व्युत्पन्न भौतिक राशियाँ कहलाती है ।
सात मूल भौतिक राशियों को छोड़कर अन्य सभी भौतिक राशियों को व्युत्पन्न राशियाँ माना गया है। जैसे -
1- वेग
2- त्वरण
3- बल
4- ऊर्जा
5- कार्य
6- धारित
7- विद्युत विभव आदि
परिभाषा
वह भौतिक घटना जिसे मापा जा सके तथा जिसको भौतिक नियमों के रूप में समझाया अथवा व्यक्त किया जा सके, भौतिक राशि कहलाती है।
भौतिक राशि को इसके परिमाण तथा मात्रक द्वारा द्वारा प्रदर्शित किया जाता है ।
यदि किसी भौतिक राशि Q का परिमाण n तथा मात्रक u हो तो भौतिक राशि का गणितीय समीकरण Q = n × u
विभिन्न मापन की पद्धतियों के लिए किसी भौतिक राशि का परिमाण एवं संगत मात्रक का गुणनफल सदैव नियतांक होता है, अर्थात
भौतिक राशियों के प्रकार -
भौतिक राशियाँ तीन प्रकार की होती है –
1- आनुपातिक
2- अदिश
3- सदिश
1- आनुपातिक
जब एक भौतिक राशि दो समान राशियों का अनुपात होती है, तो इसका कोई मात्रक नहीं होता । ऐसी भौतिक राशियों का केवल अंकिक मान होता है । जैसे –
1- आपेक्षिक घनत्व = (वस्तु का घनत्व )/(4°C पर पानी का घनत्व)
2- अपवर्तनक = (वायु में प्रकाश का वेग )/(माध्यम में प्रकाश का वेग)
3- विकृति = (विमा में परिवर्तन)/(मूल विमा)
ऐसी भौतिक राशियों की विमा भी नहीं होती ।
2- अदिश
जिन भौतिक राशियों की दिशा नहीं होती वे अदिश राशियाँ कहलाती है । इन राशियों के मापन में अंकिक मान मात्रक के साथ मापा जाता है । जैसे-
1- चाल = (दूरी )/(समय )
2- कार्य = बल × विस्थापन
3- घनत्व = (द्रव्यमान )/(आयतन )
3- सदिश
जिन भौतिक राशियों में दिशा होती वे सदिश राशियाँ कहलाती है । इन राशियों के मापन में अंकिक मान और मात्रक के साथ-साथ दिशा भी प्रदर्शित होती है । जैसे-
परिकल्पनाओं का निर्माण Making of Hypothesis
अनुसन्धान के दूसरे चरण में परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाता है । यह शोध के विकास का उद्देश्यपूर्ण आधार है । परिकल्पना अनुसन्धान समस्या से सम्बन्धित समस्त सम्भावित समाधानों पर विचार करता है । परिभाषा
गुडे एवं हाट्ट के अनुसार , “ परिकल्पना भविष्योन्मुखी ( Future Oriented ) होती है तथा यह एक तार्किक कथन है जिसकी सत्यता का परीक्षण किया जा सकता है। "
करलिंगर के अनुसार , “ परिकल्पना दो या दो से अधिक चरों के मध्य सम्बन्धों का कथन है ।
सामान्य शब्दों में परिकल्पना एक तार्किक कथन, वाक्य, पूर्ण विचार या पूर्वधारणा है जिसे शोधकर्ता विषयवस्तु की प्रकृति के आधार पर पूर्व निर्मित कर लेता है एवं जिसकी सत्यता की जाँच वह शोध के समय करता है ।
परिकल्पना की विशेषताएँ
गुडे एवं हाट्ट ने अपनी पुस्तक ' मेथड्स इन सोशल रिसर्च ' में परिकल्पना की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है
स्पष्टता
अनुभव योग्य सिद्धान्त
विशिष्टता
उपलब्ध प्रविधियों से सम्बन्ध
सिद्धान्तों से सम्बन्ध स्थापित करना
वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठता
परिकल्पना की आवश्यक शर्तें
अनुसन्धान में परिकल्पना की निम्न शर्तें शामिल हैं
इसे तथ्यात्मक होने के साथ-साथ प्राकृतिक नियमों के अनुरूप होना चाहिए ।
परिकल्पना को निगमनात्मक चिन्तन ( Deductive Contemplation ) पर आधारित होना चाहिए ।
परिकल्पना में शाब्दिक स्पष्टता तथा सरलता होनी चाहिए ।
यह सिद्धान्तों तथ्यों, नियमों एवं अवधारणाओं से मुक्त होनी चाहिए ।
परिकल्पना को मितव्ययी होना चाहिए तथा पुष्टि हेतु प्रविधियों की उपलब्धता भी होनी चाहिए ।
परिकल्पना की प्रकृति
परिकल्पना में मौजूद सभी सन्दर्भ बिन्दु क्रियात्मक, प्रत्यात्मक तथा घोषणात्मक प्रकृति के होने चाहिए ।
परीक्षा के योग्य होनी चाहिए ।
परिकल्पना की प्रकृति ऐसी हो कि वह वैज्ञानिक अनुसन्धान को बढ़ावा देने में सहायक हो ।
सभी शोध प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देने में सक्षम हो
परिकल्पना का महत्त्व
परिकल्पना तथ्यों की सार्थकता का निर्धारण करती है ।
परिकल्पना समस्या एवं समाधान के बीच कड़ी का काम कर समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है ।
परिकल्पना समस्या के क्षेत्र का निर्धारण करती है ।
परिकल्पना प्रदत्तों के संकलन का आधार प्रस्तुत कर नवीन अनुसन्धानों का मार्ग प्रशस्त करती है ।
यह अनुसन्धान की सम्पूर्ण कार्य रेखा को बताती है तथा समुचित एवं प्रभावी उपकरणों के चयन में सहायक होती है ।
परिकल्पना के प्रकार
परिकल्पनाओं को मुख्यत : तीन प्रकारों में विभाजित किया गया है ।
1 , शोध परिकल्पना Research Hypothesis
II . शून्य परिकल्पना Null Hypothesis
III . सांख्यिकीय परिकल्पना Statistical Hypothesis 1 , शोध परिकल्पना Research Hypothesis
यह परिकल्पना ' करके सीखने के सिद्धान्त पर आधारित है, इसलिए इसे ' कार्यात्मक परिकल्पना ' के रूप में भी जाना जाता है ।
इसके भी दो प्रकार हैं
दिशात्मक परिकल्पना (Directional Hypothesis)
अदिशात्मक परिकल्पना (Non - Directional Hypothesis) II . शून्य परिकल्पना Null Hypothesis
इस परिकल्पना को शून्य या अप्रमाणित या अशुद्ध परिकल्पना भी कहते हैं ।
यह नकारात्मक परिकल्पना के रूप में भी जानी जाती है, क्योकि यह मानकर चलता है कि दो चरों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात् दो समूहों में किसी विशेष चर के आधार पर कोई अन्तर नहीं है ।
इस परिकल्पना का उपयोग केवल सांख्यिकी की सार्थकता के परीक्षण के लिए किया जाता है । III . सांख्यिकीय परिकल्पना Statistical Hypothesis
जब शोध परिकल्पना या शून्य परिकल्पना को सांख्यिकीय पदों में प्रदर्शित किया जाता है , तो उस विधि को सांख्यिकीय परिकल्पना कहा जाता है ।
इसमें पदों को व्यक्त करने के लिए विशेष संकेतों का प्रयोग किया जाता है ; जैसे - H , H , , X , X , आदि ।