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II ईशोपनिषद् II क्या ईश्वर के भय से वैराग्य ग्रहण करके कर्मों को नितान्त त्याग देना चाहिये ?

प्रश्न - क्या ईश्वर के भय से वैराग्य ग्रहण करके कर्मों को नितान्त त्याग देना चाहिये ?

उत्तर - कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत ने समाः । एवं त्वयि नान्यतोऽस्ति न कर्म तालिप्यते नरे ॥ २ ॥
शब्दार्थ - कुर्वन् = करता हुआ, एव = निश्चय, इह = इस संसार में, कर्माणि = कामों को, जिजीविषेत् = जीना चाहे, शतम = सौ, समाः = वर्षे, एवम = इस प्रकार, स्वाय = तुझमें, न = नहीं, अन्यथा = दूसरी तरह, इतम् = इसके सिवाय, अस्ति = है, न = नहीं, कम्म = काम, लिप्यते = चिपटता है, नरे = मनुष्य में,
अर्थ = इस वेद-मंत्र में परमात्मा जीव को इस बात का उपदेश करते हैं कि हे जीव ! तुम इस संसार में सौ वर्ष तक कार्य करते हुए जीने को इच्छा करो अर्थात् पूर्ण आयु पर्यंत कार्य करते रहो । तुम्हारे लिये सबसे अच्छा मार्ग यही है, क्योंकि अच्छे कर्म जीव के बन्धन का कारण नहीं होते । बहुत से मनुष्य यह कहेंगे कि मंत्र में तो केवल कर्म लिखे हैं, तुम अच्छे किस प्रकार कहते हो, तो इसका उत्तर यह है कि ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध दूसरों का अधिकार लेनेवाले कर्मों के करने का निषेध वेद-मंत्रों में मिलता है । उनको छोड़कर जो कर्म हैं, वह सब ईश्वर की आज्ञा के अनुसार होने से शुभ ही हैं । किसी प्रकार की बुराई हो नहीं सकती, क्योंकि ईश्वर कभी दुःखदायक कर्म के करने का उपदेश जीव को नहीं करते और कर्म के उपदेश का तात्पर्य भी यही है । मनुष्य सदा अच्छा या बुरा कुछ न कुछ कार्य करता रहता है, इसलिये कर्म के उपदेश की कोई आवश्यकता न थी; परन्तु किसी का अधिकार न लेनेवाले कर्मों का उपदेश वेद-मंत्रों मैं इसलिये किया कि बिना शुभ कर्मों के किये मनुष्य बुरे कर्मों से बच नहीं सकता । बुरे कर्मों से सदा दुःख उत्पन्न होता है और कोई मनुष्य दुःख की इच्छा से कोई कार्य नहीं करता। इस सब बुराई को दूर करने के लिये उपदेश किया कि किसी समय भी शुभ कार्य से वंचित न रहो, जिससे अवकाश मिलने से बुरे कार्य का विचार ही उत्पन्न न हो; क्योंकि मन सदा कर्म करता रहता है । वह किसी समय भी कर्म से पृथक् नहीं होता । ऐसी अवस्था में जबकि मन की शक्ति को समाधि या सुषुप्ति के द्वारा नितान्त रोक दिया जाय, मनुष्य का सबसे बढ़कर कर्तव्य यह है कि वह मन को अवकाश न दे । इसलिये एक दृष्टांत लिखते हैं ।
दृष्टांत - एक समय किसी धनी के पास एक मनुष्य ने आकर कहा कि मैं नौकरी चाहता हूँ । धनी ने पूछा " क्या वेतन लोगे ? " सेवक ने कहा " मेरा वेतन यही है कि मुझे सदा ' कार्य करने को रहे । जब कार्य न दोगे मैं तुम्हें मार डालूंगा । " ; धनी ने सोचा कि सेवक तो बहुत अच्छा है, जो कुछ वेतन नहीं माँगता और कार्य करने के लिये सदा उद्यत है और कभी विश्राम लेने का नाम नहीं लेता । हमें अपने कार्यों के लिये बहुत से मनुष्यों की आवश्यकता पड़ती है । जब कार्य देखेंगे उसको कार्य देते रहेंगे । शेष मनुष्यों को निकाल देंगे । तात्पर्य यह है कि उस धनी ने सेवक को प्रतिज्ञा मान ली । सेवक बड़ा फुर्तीला था । काम - जिह्वा से निकला नहीं कि पूर्ण हुआ ---- एक दो दिन में ही धनी के कार्य समाप्त हो गये । अब उसे चिन्ता हुई कि यदि इसे कार्य नहीं देते, तो अवश्य मार डालेगा । यदि कार्य दें, तो इतना कार्य कहाँ से लायें । इस चिन्ता ने धनी के चित्त को नितान्त अशान्त कर दिया । खाना-पीना सब बन्द हो गया । एक दिन किसी विद्वान ने धनी से पूछा कि आपके पास इतना धन है, तो भी आप इतने निर्बल क्यों होते जाते है । धनी ने सब वृतान्त कह सुनाया । विद्वान् ने कहा कि तुम अपने कार्यों पर ही उसे निर्भर क्यों रखते हो ? उसे मुहल्ले और शहर के मनुष्यों के कार्यों पर लगा दो । यदि वह उसे भी पूरा कर दिखाये, तो सब मनुष्यों की भलाई के कार्य पर लगा दो । यदि इससे भी छुटकारा पा जाय, तो प्रत्येक जीव की सेवा का काम लो । यह सीमा रहित कार्य उससे जन्म भर समाप्त न या होगा और तुम उसके हाथ से बच जाओगे |
यही दशा मनुष्य के मन की है । जिस समय उसे शुभ कार्य से छुट्टी मिलेगी उसी समय मनुष्य के नाश करनेवाले कार्यों में लग जायगा । इसलिये उस मन को परोपकार के कार्य में लगाये बिना संसार को बुराइयों से बच नहीं सकते और न बुरा का कार्य करके आपत्ति और दुःख को छोड़कर किसी शुभः परिणाम की आशा कर सकता है। मनुष्य के अपने कार्य इतने स्वल्प हैं कि मन उनको बहुत शीघ्र समाप्त कर लेता है । भगवान रामचन्द्रजी ने भी हनुमान को यही उपदेश किया था । कि इच्छा की नदी शुभ और अशुभ इच्छा रूप दो मागों पर जाती है । जो इच्छा ईश्वर की आज्ञा के अनुसार हो वह शुभ है और जो उसके विरुद्ध है, बुरी इच्छा है । इसलिये ईश्वर को सर्व-व्यापी समझकर और यह सोचकर कि उसकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करने से दुःख भोगना पड़ेगा स्वार्थता और दूसरों का अधिकार छीनने को छोड़कर परोपकार और दूसरों की भलाई के कार्य करना चाहिये । जो मनुष्य दूसरों को भलाई के कार्य करते हैं वह सदा सुख से रहते हैं । इसलिये परोपकार की इच्छा जो अच्छी है सदा मन में रखकर संसार के उपकार पर कमर बाँधनी चाहिये । जब तक प्राण रहें, कभी उस उपकार, के कार्य से पृथक् होकर जीवन न व्यतीत करना चाहिये, क्योंकि मनुष्य - जीवन इतना बहुमूल्य है कि उसका बार बार मिलना अत्यन्त कठिन है । जो मनुष्य ईश्वर की चिन्ता न करके मनुष्य-जीवन को व्यर्थ कार्यों में खो रहे हैं । उनसे बढ़कर मूर्ख कोई नहीं और जो दूसरों को हानि पहुँचाकर लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, वह पूरे पशु हैं । वहीं मनुष्य बुद्धिमान् कहलाते हैं, जो सदा परोपकार के कार्यों में लगे रहते हैं । जिनके जीवन का उद्देश्य ही दूसरों की भलाई करना है और जो बिना स्वार्थ संसार के उपकार में लगे रहते हैं । वही प्राणी ईश्वर-ज्ञान को पाते हैं, जो शुभ कार्य दूसरों की भलाई के लिये करते हैं । वह कभी बंधन का कारण नहीं होते । बंधन के कारण वही कर्म होते हैं, जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध किये जाते हैं और जिनमें दूसरों का अधिकार लेने का विचार उपस्थित है । बस, जो मनुष्य अपने जीवन को परोपकार में बितायेगे, वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कमों से मन को शुद्ध करके तत्वज्ञान को ग्रहण करके मुक्ति के अधिकारी होंगे ।
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--------------------------ऋषि दयानन्द कृत उपनिषद-प्रकाश से

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