Skip to main content

II ईशोपनिषद् II मनुष्य ईश्वर के विरुद्ध किस प्रकार कार्य कर सकता है ?


असुर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽ वृत्ताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
शब्दार्थ - असुर्य्या नाम = प्रकाश रहित, ते = वे, लोकाः = लोक, अन्धेन = घोर, तमसा = अंधकार से, आवृताः = घिरे हुए हैं, तान् = उनको, ते - वे, प्रेत्य = मरकर, अभिगच्छन्ति = प्राप्त होते हैं, ये के च = जो कोई, आत्महनः = आत्मा के हनन करनेवाला, जनः = मनुष्य हैं ।
अर्थ - वे मनुष्य महा अन्धकारवाले लोकों में मरने के पश्चात् जाते हैं, जोकि अपनी आत्मा को मार डालते हैं । अन्धकारवाले लोकों से तात्पर्य उन लोकों से है जिनमें जीव की जानने की शक्ति बहुत ही न्यून हो जाती है; क्योंकि सूर्य प्रकाशवाली शक्ति है और प्रकाश का अर्थ ज्ञान भी है, इसलिये सूर्य से रहित अन्धकारवाले लोक का तात्पर्य ज्ञान से रहित योनि से है; क्योंकि ज्ञान का अर्थ भलाई और बुराई को जानकर उसके द्वारा दुःख से छूटकर सुख प्राप्त करना है । जिन योनियों में सुख के प्राप्त करने के लिये और दुःख से छूटने के लिये जो साधन हैं । उनका ज्ञान न हो वह सब योनियाँ ज्ञान के सूर्य से रहित हैं और ज्ञान के सूर्य से तात्पर्य वेदों की शिक्षा से है; क्योंकि वेद का अर्थ ज्ञान है और सृष्टि के प्रारम्भ में होने से उनका स्वतः प्रकाश अर्थात बिना किसी दूसरी शिक्षा के प्रकाशित होना भी माना हुआ है । इसलिये जिन लोकों में वेदों की शिक्षा नहीं हो सकती, वह लोक सूर्य अर्थात प्रकाश से रहित है । परन्तु वेद-मन्त्र ने अंधकार से पूर्ण होने का अनुमोदन किया है । कुछ मनुष्यों का यह विचार होगा कि जब सूर्य का प्रकाश नहीं होगा, तो मनुष्य स्वयं ही अन्धकार से भर - पूर होंगे । वेद में यह शब्द क्यों प्रकाशित किये गये; परन्तु बुद्धिमान मनुष्य जान सकते हैं कि सूर्य के न होने की अवस्था में नितान्त अन्धकार ही नहीं रहता; किन्तु दीपक के प्रकाश की अवस्था में भी सूर्य नहीं होता । इसलिये वेद ने बता दिया कि जिन लोकों में सूर्य ( ईश्वरीय प्रकाश और दीपक अर्थात् मानुषो शिक्षा भावार्थ किसी प्रकार का प्रकाश ) नहीं होता; आत्मा को नाश करनेवाले मनुष्य उन लोकों में प्रवेश करते हैं ।
प्रश्न - जबकि तुम आत्मा की उत्पत्ति नहीं मानते; तो नाश भी किसी प्रकार हो नहीं सकता । यह उपदेश जो कि आत्मा को नाश करने के अध्याय में है । किस प्रकार ठीक हो सकते हैं, क्योंकि अविनाशी आत्मा का नाश हो हो नहीं सकता । जबकि इस अपराध का होना असम्भव है, तो उसका दण्ड बताना सरासर मूर्खता है ?
उत्तर - नाश करने से तात्पर्य उसके अधिकार नाश करने से है, क्योंकि जीवात्मा को मन इत्यादि पर परमात्मा ने राज्य दिया है और यह सब इन्द्रिय मन और शरीर आत्मा को नियत स्थान तक पहुँचाने के लिये साधन दिये । अतएव - जो मनुष्य आत्मा को इस स्थान से गिराकर मन, इन्द्रिय और शरीर का दास बना देते हैं, वह सचमुच आत्मा का नाश करते हैं ।
प्रश्न - जब कि परमात्मा ने आत्मा को अधिकारी और मन इत्यादि को दास बनाया है, तो मनुष्य उसके विरुद्ध किस प्रकार कार्य कर सकता है ?
उत्तर - मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, परन्तु जिस समय परमात्मा के विरुद्ध करता है, तो उसे दुःख मिलता है और जब परमात्मा की आज्ञा के अनुसार चलता है, तो उसे सुख मिलता है ।
प्रश्न - तुम जो नाश करने का अर्थ अधिकार का नाश लेते हो, इसमें क्या प्रमाण है । क्योंकि मन्त्र में तो आत्मा का हनन लिखा है |
उत्तर - यहाँ अर्थ करने के लिये लक्षणा शक्ति का आधार किया है क्योंकि जहाँ अक्षरों से असम्भव अर्थ निकले वहाँ लक्षणा शक्ति से काम लिया जाता है । जैसे किसी ने कहा "मचान पुकारते हैं" । क्योंकि मचान में पुकारने की शक्ति का होना असम्भव है, इसलिये वहाँ यह लक्षणा करते हैं कि मचान पर बैठे हुए मनुष्य पुकारते हैं
प्रश्न - तुम्हारा यह प्रमाण ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा हमने कभी नहीं सुना । दृष्टान्त वह होता है । जिसे प्रत्येक मनुष्य मान ले ।
उत्तर - जब मनुष्य रेलगाड़ी पर बैठे हुये कहते हैं कि मेरठ आ गया, तो बुद्धिमान् मनुष्य जानता है कि मेरठ तो जड़ पदार्थ है उसमें आने के कार्य का होना असम्भव है इसलिये वह उसके अर्थ यह समझता है कि रेलगाड़ो मेरठ पहुंच गयी और आने की क्रिया मेरठ को छोड़कर रेलगाड़ी पर लगा देता है ।
प्रश्न - यदि इस प्रकार मन-माना अर्थ किया जाय, तो किसी शब्द का ठीक अर्थ कुछ भी न होगा, परन्तु जहाँ जो चाहो कर लो ।
उत्तर - नहीं, शब्दों के ठीक अर्थ समझने के लिये ही यह शक्तियाँ नियत की गई हैं । जिससे कि कहने वालों का ठीक-ठीक अभिप्राय समझ में आ जाय और मनुष्य भ्रम-जाल में न पड़े रहें ।
प्रश्न - तुमने लोक शब्द का अर्थ शरीर किस प्रकार किया । क्योंकि किसी कोष में लोक का अर्थ शरीर नहीं किया गया ।
उत्तर - लोक शब्द का अर्थ दृश्य पदार्थ है । शरीर को दृश्य होने से और पिंड अर्थात जगत की समता दी जाती है । इसलिये लोक शब्द का अर्थ शरीर करना ठीक है और प्रेत्य ! शब्द अर्थात मरने के पश्चात् प्राप्त होने से दूसरे शरीर का नाम भी लोक ठीक हो सकता है ।

--------------------------महर्षि दयानन्द कृत उपनिषद-प्रकाश से 

Comments

Popular posts from this blog

भारत के प्रमुख स्थानों के भौगोलिक उपनाम

भारत के प्रमुख स्थानों के भौगोलिक उपनाम ईश्वर का निवास स्थान    प्रयाग पांच नदियों की भूमि      पंजाब सात टापुओं का नगर     मुंबई बुनकरों का शहर पानीपत अंतरिक्ष का शहर बेंगलुरू डायमंड हार्बर     कोलकाता इलेक्‍ट्रॉनिक नगर बेंगलुरू त्योहारों का नगर मदुरै स्वर्ण मंदिर का शहर      अमृतसर महलों का शहर   कोलकाता नवाबों का शहर   लखनऊ इस्पात नगरी     जमशेदपुर पर्वतों की रानी    मसूरी रैलियों का नगर   नई दिल्ली भारत का प्रवेश द्वार      मुंबई पूर्व का वेनिस    कोच्चि भारत का पिट्सबर्ग       जमशेदपुर...

शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-साधन Audio tools in the teaching process

शिक्षण प्रक्रिया में श्रव्य-साधन के अन्तर्गत उन सामग्रीयों को रखा जाता है, जिनके द्वारा सुनकर ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसे- फोनोग्राफ रिकॉर्ड, रेडियो प्रसारण तथा मैग्नेटिक टेपरिकॉर्डर आदि। शिक्षण में श्रव्य साधन तीन प्रकार से सहायक होते है- रेडियो  टेप रिकॉर्डर  ग्रामोफोन   रेडियो  रेडियो शिक्षा प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण अंग है। भारत में वर्ष 1936 में सर्वप्रथम आकाशवाणी से समाचार बुलेटिन का प्रसारण हुआ था। वर्ष 1957 में विविध भारती की शुरुआत हुई थी।  टेप रिकॉर्डर  टेपरिकॉर्डर के माध्यम से विषय-वस्तु को विद्यार्थी के लिए आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया जा सकता है। यह निदानात्मक और उपचरात्मक दोनों ही शिक्षण विधियों में प्रयुक्त किया जा सकता है।   ग्रामोफोन  ग्रामोफोन रेडियो की तरह ही शिक्षण का प्राचीन माध्यम है। इसके द्वारा छात्रों को उच्चारण के शुद्धिकरण में सहायता मिलती है।

गुरुत्व के अधीन गति Motion under Gravity

पृथ्वी का वस्तुओं पर आकर्षण बल, गुरुत्व बल कहलाता है। इस गुरुत्व बल के कारण वस्तु में त्वरण उत्पन्न होता है जिसे गुरुत्वीय त्वरण कहते है। इसे g से प्रदर्शित करते है। वायु प्रतिरोध की अनुपस्थिति में सभी वस्तुएं पृथ्वी सतह पर समान त्वरण से गिरती है। किसी ऊँचाई h < < R से पृथ्वी की ओर गिरती वस्तु की गति, मुक्त गति कहलाती है। गुरुत्व के अधीन गति, एकविमीय गति का आदर्श उदाहरण है जिसमें वायु प्रतिरोध तथा ऊँचाई के साथ त्वरण में सूक्ष्म परिवर्तन को नगण्य मान लेते है। गुरुत्व के अधीन गति को हम तीन प्रकार से समझ सकते है- 1- किसी ऊँचाई से यदि किसी वस्तु को गिराया जाए। 2- यदि वस्तु ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर कुछ प्रारम्भिक वेग से फेंकी जाए। 3- यदि वस्तु को ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेंका जाए। 1- किसी ऊँचाई से यदि किसी वस्तु को गिराया जाए- माना कोई वस्तु h ऊँचाई से प्रारम्भिक वेग शून्य से छोड़ी जाती है, तब इस स्थिति में, उपरोक्त समीकरण से स्पष्ट है कि मुक्त रूप से गिरते किसी कण द्वारा क्रमागत सेकन्डों में चली गई दूरियाँ क्रमशः 1:3:5: …. अर्थात विषम पूर्णकों के अनुपात में होगी।  प्र...