अक्षर - क्षर धातु से अच् प्रत्यय करने पर क्षर
शब्द बनता है। निषेधार्थक नञ् से संयुक्त होकर यह शब्द अक्षर कहलाता है।
‘न क्षरमिति अक्षरम्’ अर्थात् जो अपने स्वरूप से
विचलित नहीं होता, उसे अक्षर कहते हैं। यह वर्ण
के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। ‘अक्षर वर्ण निर्माणं वर्णमप्यक्षर विदुः’ ( वाच
स्पत्यम् )।
बृहदारण्यक उपनिषद् ( ३ . ८ . ६ ) में कहा गया है — एतस्य अक्षरस्य
प्रशासने मागि द्यावापृथिव्यो विधतेतिष्ठतः। आशय यह है कि इस अक्षर के प्रशासन
में सूर्य और चन्द्रमा अपने-अपने पक्ष में स्थित रहते हैं। यहां पर यह शब्द
परमात्मा के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है।
मुण्डकोपनिषद् ( १ . १ . ७ ) में इस अक्षर के
द्वारा ही जगत की रचना का वर्णन है — ‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च, यथापृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथासतः पुरुषात्केशलोमानि, तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्। अर्थात् मकड़ी जैसे अपने शरीर के भीतर
विद्यमान जाले को बाहर निकाल कर बुनती है और फिर निगल लेती है, पथ्वी जैसे विभिन्न प्रकार की औषधियां उत्पन्न करती है, मनुष्य से जैसे केश और लोम प्रकट होते हैं, वैसे ही
इस अक्षर से विश्व प्रकट होता है।
वेदान्त दर्शन में भी अक्षर शब्द को इसी रूप में
ग्रहण किया गया है- अक्षरनम्बरान्तधतेः ( ब्र०सू० , १. ३.
१० ) आशय यह है कि अक्षर परमात्मा ही है। यह आकाश पर्यन्त समस्त पदार्थों को धारण
किये हुए है। वाक्यपदीयकार ने इस ग्रन्थ के प्रथम श्लोक में ही अक्षर के द्वारा
सम्पूर्ण सृष्टि की संरचना की बात कही है-
अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थ भावेन प्रक्रिया जगतोयतः ॥ ( वा०प०
,
१ . १ )
श्रीमदभगवद्गीता में अक्षर रूप ब्रह्म से ही परम
गति की प्राप्ति का उपाय बताया गया है-
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं सयाति परमां गतिम् ॥ (
गी० ,
८ . १३ )
अर्थात् जो पुरुष ॐ ऐसे उस एक अक्षर रूप ब्रह्म
को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थ स्वरूप मेरे को (श्रीकृष्ण का) चिन्तन करता हुआ
शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परमगति को प्राप्त
होता है।