शोध के उद्देश्य Research Objectives
किसी भी प्रकार का शोध किसी न किसी उद्देश्य का अनुगामी होता है। अतः यह बात स्पष्ट है कि अनुसन्धान उद्देश्यविहीन हो ही नहीं सकता। इस प्रकार अनुसन्धान के विषय में कहा जा सकता है कि,
अनुसन्धान नवीन तथ्यों की खोज करता है।
पुराने तथ्यों की जाँच तथा मूल्यांकन करता है।
किसी विशेष स्थिति का सही निर्णय कर समस्याओं का समाधान करता है।
सामान्यतः अनुसन्धान के उद्देश्यों को चार भागों में बाँटा गया है-
सैद्धान्तिक उद्देश्य
सत्यात्मक उद्देश्य
तथ्यात्मक उद्देश्य
व्यवहारिक उद्देश्य
1. सैद्धान्तिक उद्देश्य
सैद्धान्तिक उद्देश्यों के अन्तर्गत वैज्ञानिक विधियों को शामिल किया जाता है।
वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से नवीन सिद्धान्तों एवं नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।
सैद्धान्तिक उदेश्य पूर्ति के लिए किए गए कार्य व्याख्यात्मक प्रकृति के होते है।
2. सत्यात्मक उद्देश्य
सत्यात्मक उद्देश्य दार्शनिक प्रकृति के होते है, जिनमें दर्शन के आधार पर अन्तिम परिणाम की प्राप्ति की जाती है।
3. तथ्यात्मक उद्देश्य
तथ्यात्मक उद्देश्य वर्णात्मक प्रकृति के होते है, क्योंकि इनकी प्राप्ति विश्लेषण आधारित होती है।
इसमें ऐतिहासिक अनुसन्धानों का सहारा लिया जाता है।
4. व्यवहारिक उद्देश्य
व्यवहारिक उद्देश्यों को विकसात्मक अनुसन्धान की श्रेणी में रखा जाता है तथा इसकी प्राप्ति हेतु विभिन्न क्षेत्रों में क्रियात्मक अनुसन्धान का सहारा लिया जाता है।
इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए केवल उपयोगिता को महत्व दिया जाता है।
शोध की प्रकृति Nature of Research
अनुसन्धान या शोध वह क्रमबद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें वैज्ञानिक उपकरणों के प्रयोग के द्वारा वर्तमान ज्ञान का परिमार्जन किया जाता है। शोध का क्षेत्र बहुत व्यापक है फिर भी शोध की प्रकृति को निम्नलिखित आधार बिन्दुओं के द्वारा समझा जा सकता है-
अनुसन्धान अपनी प्रकृति में वस्तुनिष्ठ और तथ्यात्मक होता है।
शोध मूलतः वैज्ञानिक प्रकृति का होता है, जिसमें प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण कर निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है।
इसकी प्रकृति बौद्धिकता से युक्त एवं तार्किक होती है, जो पुरानी त्रुटियों को शुद्ध कर नए-नए ज्ञान एवं सिद्धान्तों को स्थापित करती है।
अनुसन्धान पूर्वाग्रहों से मुक्त और व्यक्तिपरक होता है।
अनुसन्धान अपनी प्रकृति में नवीनता को प्रदर्शित करता है, क्योंकि इसके द्वारा प्राचीन तथ्य, सिद्धान्त, विधि आदि में परिवर्तन कर नए तथ्यों, सिद्धान्तों और विधियों की खोज होती है।
अनुसन्धान की प्रकृति विश्लेषणात्मक होती है, क्योंकि इसमें सांख्यिकी की विधियों एवं आँकड़ों का प्रयोग कर निष्कर्ष निकाला जाता है।
शोध की विशेषताएं Characteristics of Research
अनुसन्धान वैज्ञानिक विधि की तरह कार्य करता है, जो पूर्वाग्रहों से मुक्त और व्यक्तिपरक होता है।
इस आधार पर अनुसन्धान की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है-
शोध का अर्थ एवं परिभाषाएं Meaning of Research
शोध अथवा अनुसंधान का सामान्य अर्थ “खोज करना” है।
यह खोज किसी उद्देश्य को आधार बनाकर क्रमबद्ध, व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीकों से की जाती है।
शोध को इंग्लिश में Research कहते है, जिसका सामान्य अर्थ,- “पुनः खोज करना” है।
शोध किसी न किसी समस्या के वैज्ञानिक या तार्किक समाधान के रूप में सामने आता है, क्योंकि समाधान के पश्चात उस समस्या या खोज से जुड़े कुछ नवीन सिद्धांत या अवधारणाएं सामने आती है।
मूल्यांकन प्रणाली में नवाचार Innovation in Evaluation System
मूल्यांकन शिक्षण एवं सीखने दोनों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । इसमें नवाचार का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । यह वर्तमान की जरूरतों व वर्तमान पद्धतियों में नई तकनीकों का समावेश कर मूल्यांकन की प्रक्रिया को सरल व पारदर्शी तथा त्रुटिहीन तथा गुणवत्ता पूर्ण बनाता है । अतः कुछ महत्त्वपूर्ण नवाचार विधि इस प्रकार हैं
प्रश्नावली को जटिल व प्रासंगिक मुद्दे आधारित बनाकर मूल्यांकन करना । इसमें उन मुद्दों को शामिल करना , जिससे शिक्षार्थी प्रभावित होते हैं । इससे शिक्षार्थी की बौद्धिकता तथा उद्देश्यों दोनों का मूल्यांकन सम्भव है । शिक्षार्थी या बच्चों को साक्षात्कार के माध्यम से मूल्यपरक मूल्यांकन कर , इस समूह में विद्यार्थियों को शामिल कर व प्रश्नों को पूछकर भी मूल्यांकन किया जा सकता है , जिससे बौद्धिकता के आत्मविश्वास को बढ़ावा मिलेगा और शिक्षण मूल्यांकन भी सकारात्मक होगा । विद्यार्थियों से किसी पत्र के बारे में जानकर और उनका उस पर पक्ष जानकर भी बौद्धिकता को मापा जा सकता है । ऐसे ही किसी अन्य घटना को उनके प्रोजेक्ट कार्य में समाहित कर भी शिक्षण प्रक्रिया में मूल्यांकन को प्रभावी बनाया जा सकता है । शिक्षण कार्य को दृश्यपरक तन्त्रों की सहायता से एक प्रकार से रुचिकर बनाकर , नवीन तकनीकों को सहायक सामग्री बनाकर , शिक्षार्थी की रुचि को पैदाकर शिक्षण में योगदान को बढ़ाकर , तुलनात्मक परियोजनाओं , कार्यकुशलताओं एवं व्यक्तिगत प्रभाव डालकर भी शिक्षण प्रक्रिया में मूल्यांकन को प्रभावी बनाया जा सकता है । शिक्षण में शिक्षार्थी के लक्ष्य उन्मुखी प्रयोजनों के माध्यम से भी मूल्यांकन किया जा सकता है । इस प्रकार वर्तमान में नवीन तकनीकों ; जैसे - ऑडियो - वीडियो द्वारा संचालित तकनीकी , कम्प्यूटर आधारित तकनीकों , व्यक्तिगत प्रभावों आदि का उपयोग मूल्यांकन को प्रभावी बनाने में किया जा सकता है ।
कम्प्यूटर आधारित जाँच Computer Based Testing
कम्प्यूटर आधारित जाँच डिजिटल संसाधनों के माध्यम से होती है । इसमें इण्टरनेट आधारित कम्प्यूटर पर जाँच होती है । इसके साथ ही इण्टरनेट वातावरण में ही इसका मूल्यांकन भी होता है । कम्प्यूटर आधारित जाँच में विद्यार्थी को यूजर आईडी और पासवर्ड आवण्टित किया जाता है । यह पूर्व व्यवस्थित कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर में दर्ज भी होता है । जाँच के समय विद्यार्थी निर्धारित जाँच केन्द्र पर पहुँचकर जाँच देता है । इसमें विद्यार्थी यूजर आईडी और पासवर्ड की सहायता व निर्देशित मानक के अनुरूप निर्धारित समय हेतु परीक्षा प्रारम्भ करता है ।
जाँच प्रारम्भ होते ही समय की गणना प्रारम्भ हो जाती है । इसमें अगले प्रश्न तथा सेव करने हेतु ' सेव एण्ड नेक्स्ट बटन ' का प्रयोग करना होता है । इसमें भिन्न रंगों के बटनों का भी उपयोग होता है , जो यह बताते हैं कि आपने कितना प्रश्न किया , कितना बाकी है आदि । जाँच समाप्त होते ही सबमिट बटन का प्रयोग करना होता है , जिससे आपकी जाँच प्रति कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर में सेव हो जाती है । सबमिट बटन के प्रयोग के बाद कम्प्यूटर की स्क्रीन पर जाँच का विवरण आ जाता है , जिसमें यह विवरण होता है कि आपने कितने प्रश्न किए , कितने छोड़े आदि । कम्प्यूटर आधारित जाँच का मूल्यांकन
कम्प्यूटर आधारित जाँच का मूल्यांकन कम्प्यूटर में सॉफ्टवेयर के माध्यम से होता है । जाँच का मूल्यांकन कम समय में हो जाता है । छात्र भी सन्तुष्ट होता है , उसका विवरण उसे खण्डवार कम समय में मिल जाता है । छात्रो की संख्या की अधिकता का इस पर दबाव नहीं पड़ता है । मूल्यांकन में त्रुटियों की सम्भावना कम होती है ।
पारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है । एकसाथ अधिक विद्यार्थियों की जाँच सम्भव है । विद्यार्थी द्वारा माँगी गई जाँच रिपोर्ट की पूर्ति एवं पुन : मूल्यांकन में आसान होती है ।
विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली
विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली पाठ्यक्रम की वह प्रणाली है , जिसमें छात्रों को पाठ्यक्रमों को चुनने का विकल्प होता है अर्थात् इसमें विज्ञान के विद्यार्थी को कला , वाणिज्य आदि अन्य विषयों को चुनने का विकल्प होता है । दिल्ली विश्वविद्यालय ने सत्र 2015 - 16 से इस पाठ्यक्रम को स्नातक के पाठ्यक्रमों में शामिल किया है ।इसका मूल विचार छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखना है , ताकि भारत व विदेशों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आधुनिकता बनी रहे । इसमें पाठ्यक्रम मूल , निर्वाचित या मृदु कौशल पाठ्यक्रम के रूप में सन्दर्भित होता है ।
यह प्रणाली सभी केन्द्रीय , राज्य और मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों के लिए एकसमान होता है । इसके तीन मुख्य पाठ्यक्रम होते हैं ,
मूल ,
वैकल्पिक और
बुनियादी
एक प्रभावी और सन्तुलित परिणाम प्रदान करने हेतु तीनों मुख्य पाठ्यक्रमों का मूल्यांकन और उपयोग किया जाता है । यह प्रणाली निम्न प्रकार से कार्य करती है
सेमेस्टर
क्रेडिट प्रणाली
क्रेडिट हस्तान्तरण
व्यापक निरन्तर मूल्यांकन
ग्रेडिंग
सेमेस्टर
मूल्यांकन सेमेस्टर के अनुसार होता है । इसमें एक छात्र विज्ञान , कला , वाणिज्य के लिए तीन साल और अभियान्त्रिकी के चार साल के पाठ्यक्रमों के आधार पर प्रगति करता है । इसके तहत प्रत्येक सेमेस्टर में 15 - 18 सप्ताह का शैक्षणिक कार्य होता है , जो 90 शिक्षण दिवस के रूप में होता है । क्रेडिट प्रणाली
प्रत्येक पाठ्यक्रम को एक निश्चित क्रेडिट सौंपा जाता है । जब छात्र पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करता है , तो उसे पाठ्यक्रम पर आधारित क्रेडिट प्राप्त होता है । यदि एक छात्र एक सेमेस्टर उत्तीर्ण करता है , तो उसे दोहराना नहीं होता है । क्रेडिट हस्तान्तरण
यदि कुछ कारणों से छात्र यदि अध्ययन का भार सहन नहीं कर पाता है , तो वह कम क्रेडिट प्राप्त करने का अधिकार रखता है , किन्तु अगले सेमेस्टर में इस क्रेडिट की भरपाई करने की पूरी आजादी होती है । व्यापक निरन्तर मूल्यांकन
इसमें छात्रवृत्ति का मूल्यांकन न केवल शिक्षकों द्वारा बल्कि छात्रों द्वारा स्वयं भी सम्भव होता है ।
ग्रेडिंग यूजीसी ने 10 अंक ग्रेडिंग प्रणाली शुरू की है , जो मूल्यांकन में सहायक होती है , जैसे
ग्रेड 1 . 0 ( सर्वोत्तम ) 10
2 . A ' ( अति उत्कृष्ट )
3 . A ( बहुत अच्छा )
4 . B ' ( अच्छा )
5 . B ( औसत से ऊपर )
6 . C ( औसतन )
7 . P ( पास )
8 . F ( अनुत्तीर्ण )
9 . AB ( अनुपस्थित )
इस प्रकार विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली का क्रियान्वयन एक छात्र के समग्र प्रदर्शन को सिंगल सिस्टम के सार्वभौमिक तरीके से मूल्यांकन करने की दिशा में अच्छी प्रणाली है । क्रेडिट की गणना
इसमें क्रेडिट प्रति सेमेस्टर के एक घण्टे के शिक्षण के बराबर होता है , जिसमें शिक्षण ( 1 ) , व्याख्यान ( L ) तथा क्षेत्र कार्य ( P ) प्रति सप्ताह दो घण्टा शामिल होता है । इसमें प्रत्येक सेमेस्टर में एक का कल क्रेडिट L + T + P का कुल योग होता है ।