#वेद - प्रमेय या अप्रमेय
#मनुस्मृति से
जब आदि ऋषि मनु ने संसार के कल्याण के लिए उपदेश दिया था तब उस समय वेद को अपौरुषेय, अचिन्त्य तथा अप्रमेय माना जाता था। इसका प्रमाण मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के तीसरे श्लोक में मिलता है, जब बहुत से ऋषिगण महर्षि मनु के पास अपनी जिज्ञासा लेकर गए थे और महर्षि मनु ने उन्हें मानव कल्याण का उपदेश दिया था ।
उस समय वेद को लेकर शायद ही किसी प्रकार का कोई भ्रम रहा होगा और न ही किसी प्रकार की कोई शंका रही होगी। उस समय वेद का न कोई भाष्य था और न ही किसी को वेद मंत्रों के अर्थ करने की आवश्यकता थी । उस समय सब वेद से भली प्रकार परिचित थे और मंत्रों का साक्षात आत्मसात् किया जाता था । जो ऋषि वेद मंत्रों का साक्षात्कार कर लेते थे उन्हें उस मंत्र का दृष्टा कहते थे और जो मंत्र का आत्मसाक्षात्कार नहीं कर पाते थे उनके लिए वेद श्रुति के रूप में जीवन्त था।
आज अनेकों लोग आ गए जो वेद की साक्षात्कार प्रणाली तो बहुत दूर की बात उसकी श्रुति प्रणाली को भी चरितार्थ नहीं करते । उन्होंने वेद को केवल भाष्य तक सीमित कर दिया और वेद को प्रमेय की श्रेणी में डाल दिया, जबकि वेद को अप्रमेय कहा जाता था ।
आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि प्रमेय उस ज्ञान को कहते है जिसकी प्राप्ति इन्द्रियों के द्वारा या प्रमाणों से होती है । न्याय-सूत्र का भाष्य करने वाले वात्स्यायन ने स्वयं स्वीकार किया है कि “योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्” अर्थात जो अर्थ समझा जाता है वह प्रमेय है । आप यहीं नहीं रुकते आप अर्थ को भी स्पष्ट करते हुए लिखते है कि "अर्थस्तु –सुखं सुखहेतुश्च , दुःखं दुःखहेतुश्च" अर्थात जो सुख, सुख का हेतु और दुःख, दुःख का हेतु है वह अर्थ है।"
स्वयं महर्षि गौतम ने एक सूत्र में प्रमेय को परिसीमित और परिभाषित करते हुए "प्रमेयप्रकरणम्' दिया तो उसमे १२ प्रमेय बताई जो कि प्रमाण आदि से जानने योग्य है। इनमे वेद को नहीं रखा गया- "आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।१.१.९।।"
------------------------------
अब मुझे एक बात कभी समझ नहीं आई कि आदि ऋषि मनु से लेकर महर्षि गौतम तक, जब किसी ने भी वेद को प्रमेय नहीं माना तो आज तथाकथित विद्वान वेद को प्रमेय की श्रेणी में क्यों रख रहे है, और क्यों वेद मंत्रों का अर्थ व्याकरण आदि के आधार पर इन्द्रियगम्य करने पर लगे पड़े है। आज भाष्यकारों के वेद मंत्रों के अर्थ को अन्तिम परिणिती माना जा रहा है और एक होड सी लग गई है कि किसका अर्थ सुगम और बुद्धिगम्य हो। जब वेद इन्द्रियों का विषय है ही नहीं तो क्यों इसके नाम पर अपनी विद्वत्ता सिद्ध की जा रही है। जब वेद की या तो श्रुति प्रणाली या फिर साक्षात प्रणाली है तो क्यों इसके मंत्रों के अर्थ करने की एक लाभहीन प्रणाली का विकास किया जा रहा है? सोचो वेद स्वयं में पूर्ण है उसे किसी की आवश्यकता नहीं अपने आपको सिद्ध करने के लिए या फिर अर्थ करने के लिए। हमने वेद नहीं खोए हमने उसकी प्रणाली खो दी है, जिसे प्रयोग में लाए बिना वेद का कोई महत्व सिद्ध ही नहीं होता। --- विकास विद्यालंकार
-----------------------
#मनुस्मृति से
जब आदि ऋषि मनु ने संसार के कल्याण के लिए उपदेश दिया था तब उस समय वेद को अपौरुषेय, अचिन्त्य तथा अप्रमेय माना जाता था। इसका प्रमाण मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के तीसरे श्लोक में मिलता है, जब बहुत से ऋषिगण महर्षि मनु के पास अपनी जिज्ञासा लेकर गए थे और महर्षि मनु ने उन्हें मानव कल्याण का उपदेश दिया था ।
उस समय वेद को लेकर शायद ही किसी प्रकार का कोई भ्रम रहा होगा और न ही किसी प्रकार की कोई शंका रही होगी। उस समय वेद का न कोई भाष्य था और न ही किसी को वेद मंत्रों के अर्थ करने की आवश्यकता थी । उस समय सब वेद से भली प्रकार परिचित थे और मंत्रों का साक्षात आत्मसात् किया जाता था । जो ऋषि वेद मंत्रों का साक्षात्कार कर लेते थे उन्हें उस मंत्र का दृष्टा कहते थे और जो मंत्र का आत्मसाक्षात्कार नहीं कर पाते थे उनके लिए वेद श्रुति के रूप में जीवन्त था।
आज अनेकों लोग आ गए जो वेद की साक्षात्कार प्रणाली तो बहुत दूर की बात उसकी श्रुति प्रणाली को भी चरितार्थ नहीं करते । उन्होंने वेद को केवल भाष्य तक सीमित कर दिया और वेद को प्रमेय की श्रेणी में डाल दिया, जबकि वेद को अप्रमेय कहा जाता था ।
आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि प्रमेय उस ज्ञान को कहते है जिसकी प्राप्ति इन्द्रियों के द्वारा या प्रमाणों से होती है । न्याय-सूत्र का भाष्य करने वाले वात्स्यायन ने स्वयं स्वीकार किया है कि “योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्” अर्थात जो अर्थ समझा जाता है वह प्रमेय है । आप यहीं नहीं रुकते आप अर्थ को भी स्पष्ट करते हुए लिखते है कि "अर्थस्तु –सुखं सुखहेतुश्च , दुःखं दुःखहेतुश्च" अर्थात जो सुख, सुख का हेतु और दुःख, दुःख का हेतु है वह अर्थ है।"
स्वयं महर्षि गौतम ने एक सूत्र में प्रमेय को परिसीमित और परिभाषित करते हुए "प्रमेयप्रकरणम्' दिया तो उसमे १२ प्रमेय बताई जो कि प्रमाण आदि से जानने योग्य है। इनमे वेद को नहीं रखा गया- "आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।१.१.९।।"
------------------------------
अब मुझे एक बात कभी समझ नहीं आई कि आदि ऋषि मनु से लेकर महर्षि गौतम तक, जब किसी ने भी वेद को प्रमेय नहीं माना तो आज तथाकथित विद्वान वेद को प्रमेय की श्रेणी में क्यों रख रहे है, और क्यों वेद मंत्रों का अर्थ व्याकरण आदि के आधार पर इन्द्रियगम्य करने पर लगे पड़े है। आज भाष्यकारों के वेद मंत्रों के अर्थ को अन्तिम परिणिती माना जा रहा है और एक होड सी लग गई है कि किसका अर्थ सुगम और बुद्धिगम्य हो। जब वेद इन्द्रियों का विषय है ही नहीं तो क्यों इसके नाम पर अपनी विद्वत्ता सिद्ध की जा रही है। जब वेद की या तो श्रुति प्रणाली या फिर साक्षात प्रणाली है तो क्यों इसके मंत्रों के अर्थ करने की एक लाभहीन प्रणाली का विकास किया जा रहा है? सोचो वेद स्वयं में पूर्ण है उसे किसी की आवश्यकता नहीं अपने आपको सिद्ध करने के लिए या फिर अर्थ करने के लिए। हमने वेद नहीं खोए हमने उसकी प्रणाली खो दी है, जिसे प्रयोग में लाए बिना वेद का कोई महत्व सिद्ध ही नहीं होता। --- विकास विद्यालंकार
-----------------------

No comments:
Post a Comment