Saturday, October 12, 2019

हरबर्ट शिक्षण मॉडल Herbert Teaching Model


हरबर्ट शिक्षण मॉडल Herbert Teaching Model

      हरबर्ट शिक्षण मॉडल  को स्मृति स्तर या स्मरण शक्ति स्तर की शिक्षण व्यवस्था भी कहते है। स्मृति स्तर के शिक्षण की क्रियाएँ ऐसे अधिगम की परिस्थितियों को उत्पन्न करती हैं, जिसमें विषयवस्तु के तथ्यों को छात्र केवल कण्ठस्थ कर सके। इस स्तर पर, प्रत्यास्मरण की क्रिया पर जोर दिया जाता है। इस स्तर पर, सार्थक तथा सम्बन्धित पाठ्य-वस्तु आसानी से याद हो जाती है, जबकि निरर्थक वस्तुओं को याद करने में कठिनाई होती है। तथ्यों को कण्ठस्थ करने की क्षमता का बुद्धि से सीधा सम्बन्ध नहीं होता है। एक मन्द बुद्धि बालक भी तथ्यों को कण्ठस्थ करके अधिक समय तक याद रख सकता है तथा इसके विपरीत भी हो सकता है।

     स्मृति स्तर के शिक्षण की निष्पत्ति का बुद्धि से सह-सम्बन्ध नहीं होता है, परन्तु इस स्तर के शिक्षण से बौद्धिक व्यवहार के विकास में सहायता मिलती है। समस्या के समाधान में स्मृति स्तर भी सहायक होता है। कण्ठस्थ किए गए तथ्यों का छात्रों के विकास में ही योगदान होता है। कविता, पाठ, शब्दार्थ और उनका अभ्यास, संस्कृत में रूप, पहाड़े, गिनतियाँ, भाषा में वर्तनी, व्याकरण तथा ऐतिहासिक घटनाओं का शिक्षण, स्मृति स्तर पर ही अधिक प्रभावपूर्ण होता है।

     स्मृति स्तर का पूर्णरूप से बहिष्कार सम्भव नहीं है। इस स्तर का अपना मूल्य है, अपना क्षेत्र है। इस स्तर का ज्ञान पाए बिना बोध एवं चिन्तन स्तर ठीक कार्य नहीं कर सकते। यह स्तर, अन्य विचारवान स्तरों के लिए आधारशिला प्रदान करता है, क्योंकि स्मृति स्तर पर तथ्य काफी रटे हुए होते हैं अत: भूलने की क्रिया भी इसमें काफी सक्रिय रहती है। कक्षा में रटी हुई सामग्री छात्रों के दैनिक जीवन में उपयोगी सिद्ध नहीं होती अतः इस स्तर पर सोचने व तर्क करने के लिए कोई स्थान नहीं होता। इस मॉडल में छात्र निष्क्रिय रहते हैं और यान्त्रिक ढंग से कक्षा कार्य चलता रहता है। कक्षा का वातावरण काफी औपचारिक होता है तथा छात्र को शिक्षक से प्रेरणा नहीं मिल पाती।

स्मृति स्तर के शिक्षण में, संकेत अधिगम, श्रृंखला अधिगम तथा अनुक्रिया पर महत्त्व दिया जाता है। प्रश्नोत्तर विधि का इसमें कोई महत्व नहीं होता। हरबर्ट ने स्मृति स्तर के शिक्षण के मॉडल के प्रारूप का वर्णन चार पक्षों में किया है।

  1. उद्देश्य
  2. संरचना
  3. सामाजिक प्रणाली
  4. मूल्यांकन प्रणाली

1. उद्देश्य

  • स्मृति स्तर के शिक्षण का उद्देश्य छात्रों में निम्नांकित क्षमताओं का विकास करना है ।
  • मानसिक पक्षों का प्रशिक्षण
  • तथ्यों का ज्ञान प्रदान करना
  • सीखे हुए तथ्यों का प्रत्यास्मरण रखना
  • सीखे हुए ज्ञान का प्रत्यास्मरण करना तथा पुन: प्रस्तुत करना

2. संरचना

      हरबर्ट ने शिक्षण प्रक्रिया में प्रस्तुतीकरण पर अधिक बल दिया है। हरबर्ट की पंचपदी प्रणाली स्मृति स्तर के शिक्षण को संरचना का प्रारूप प्रदान करती है।

हरबर्ट के पाँच सोपान इस प्रकार हैं।
  1. तैयारी करना 
  2. प्रस्तुतीकरण
  3. तुलना एवं समरूपता
  4. सामान्यीकरण
  5. उपयोग

3. सामाजिक प्रणाली

  • शिक्षण एक सामाजिक एवं व्यावसायिक प्रक्रिया है। इसमें सामाजिक व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। 
  • छात्र और शिक्षक इसके सदस्य होते हैं।
  • स्मृति स्तर पर शिक्षक अधिक क्रियाशील रहता है। 
  • शिक्षक का व्यवहार अधिकारपूर्ण रहता है।
  • शिक्षक का मुख्य कार्य पाठ्य-वस्तु का प्रस्तुतीकरण करना, छात्रों की क्रियाओं को नियन्त्रित करना, उनको अभिप्रेरण प्रदान करना है।
  • छात्र का स्थान शिक्षण में गौण होता है, वह केवल श्रोता का कार्य करता है और शिक्षक को आदर्श मानकर उसका अनुसरण करता है।
  • स्मृति स्तर पर अभिप्रेरण का बाह्य रूप ही अधिक प्रयुक्त किया जाता है। शाब्दिक प्रेरणा, पुरस्कार आदि विशेष रूप से प्रयुक्त किए जाते हैं।

4. मूल्यांकन प्रणाली

  • स्मृति स्तर के शिक्षण का मूल्यांकन मौखिक तथा लिखित परीक्षाओं द्वारा किया जाता है। परीक्षा में रटने की (स्मरण करने) क्षमता पर ही अधिक बल दिया जाता है।
  • इसके लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण में प्रत्यास्मरण पद, अभिमान पद आदि का प्रयोग किया जाता है। निबन्धात्मक परीक्षा अधिक उपयोगी नहीं होती है।

स्मृति स्तर के शिक्षण के लिए सुझाव

स्मृति स्तर के शिक्षण को अधिक उपादेय एवं एवं प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नांकित सुझाव दिये जा सकते है-

  • पुनरावृति एक लय में होनी चाहिए
  • पाठ्य-वस्तु को सार्थक बनाया जाए 
  • प्रत्यास्मरण तथा पुनः प्रस्तुतीकरण का अधिक अभ्यास किया जाना चाहिए
  • पाठ्य-वस्तु क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत की जाए
  • थकान के समय शिक्षण नहीं करना चाहिए
  • समग्र-पद्धति का प्रयोग करना चाहिए 
  • शिक्षण के सभी बिन्दुओं को समग्र रुप में प्रस्तुत करना चाहिए
  • अभ्यास के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए
  • स्मृति स्तर का शिक्षण केवल तथ्यों को रटने तथा ज्ञान उद्देश्यों की प्राप्ति की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं, अपितु बोध तथा चिन्तन स्तर के शिक्षण में भी सहायक होता है। 
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शिक्षण के स्तर Level of teaching


शिक्षण के स्तर Level of teaching

          शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है या कह सकते हैं कि यह कक्षा में विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करने की एक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य छात्रा को सोचने के लिए प्रेरित करना है। शिक्षण और सीखने का घनिष्ट सम्बन्ध है, यहाँ तक कि शिक्षण सीखने का ही एक प्रत्यय माना जाता है, एक ही पाठ्य-वस्तु को विद्यालय के विभिन्न स्तरों पर पढ़ाया जाता है, क्योंकि पाट्य वस्तु का अपना स्वरूप होता है, जिससे शिक्षण के विभिन्न उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है और अधिगम के विभिन्न स्तरों को प्रभावित किया जाता है। शिक्षण के उद्देश्य अत्यन्त स्पष्ट होने चाहिए तभी शिक्षक प्रभावशाली साधनों का प्रयोग कर इसे अधिक शक्तिवान बना सकता है। शिक्षण की प्रक्रिया की परिस्थितियों को हम एक सतत क्रम, विचारशील क्रियाओं की अवस्थाओं या स्तरों में विभाजित कर सकते हैं। नीचे की अवस्थाएँ उच्च अवस्थाओं के लिए पूरक का कार्य करती हैं; जैसे—उद्देश्यों की प्राप्ति में ज्ञान उद्देश्यपूर्वक का कार्य करता है।

शिक्षण के इस सतत क्षेत्र को प्रमुख रूप से तीन स्तरों में विभाजित किया गया है।
1. स्मृति स्तर या स्मरण शक्ति स्तर की शिक्षण व्यवस्था
2. बोध स्तर या समझ स्तर की शिक्षण व्यवस्था
3. चिन्तन स्तर की शिक्षण व्यवस्था

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गैग्ने और ब्रिग्स द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Gagnes and Briggs Classification


गैग्ने और ब्रिग्स द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Gagnes and Briggs Classification

गैग्ने और ब्रिग्स द्वारा शिक्षण के उद्देश्यों को निम्नलिखित स्तरों पर विभाजित किया गया है-
  1. ज्ञानात्मक रणनीतियाँ
  2. बौद्धिक कौशल
  3. मनोदृष्टि
  4. मौखिक सूचना
  5. संचालन तन्त्र और शारीरिक क्षमता

ज्ञानात्मक रणनीतियाँ

       इस श्रेणी में किसी व्यक्ति के स्वयं के शिक्षण, स्मरण शक्ति एवं विचार कौशल को विकसित करने हेतु नई तकनीकों एवं विधियों को समावेशित किया जाता है।

बौद्धिक कौशल

बौद्धिक कौशल किसी समस्या को सुलझाने, सीखने की अवधारणा और नियम सीखने में महत्वपूर्ण होता है।

मनोदृष्टि

यह किसी व्यक्ति की आंतरिक या मानसिक स्थिति को व्यक्त करता है।

मौखिक सूचना

मौखिक सूचना का उपयोग किसी व्यक्ति द्वारा ज्ञान का आयोजन करने के सन्दर्भ में होता है।

संचालन तन्त्र और शारीरिक क्षमता

इस स्तर पर मस्तिष्क, तन्त्रिका प्रणाली और स्नायु तन्त्र एकसाथ कार्य करते है एवं उनमें सामंजस्य कैसे स्थापित करना है, इसके बारे जानकारी दी जाती है।

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ब्लूम द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Bloom's Classification



ब्लूम द्वारा शिक्षा का वर्गीकरण Bloom's Classification

        ब्लूम ने शिक्षण को तीन भागों में बाँटा, जिसे अंग्रेजी भाषा में 3H भी कहा गया है। ये 3H है-
  1. Head (ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र)
  2. Heart (भावात्मक ज्ञान क्षेत्र)
  3. Hand (मनोसंचालित ज्ञान क्षेत्र)

Head (ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र)-

ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र बौद्धिक क्षमता के विकास से संदर्भित है, इसे 6 मुख्य स्तर पर विभाजित किया गया है-
  1. ज्ञान --ज्ञान का सम्बन्ध वस्तु की जानकारी से है।
  2. बोध -बोध का अर्थ समझने की क्षमता से है।
  3. उपयोग -यह स्तर अमूर्त ज्ञान को मूर्त रूप में लाना है।
  4. विश्लेषण -इस स्तर में प्राप्त सूचना को घटकों में विभाजन है।
  5. संश्लेषण -यह सूचना घटकों का समावेशित स्तर है।
  6. मूल्यांकन  -मूल्यांकन सतत प्रक्रिया के रूप में होता है। यह विशेष प्रयोजनों में प्रयुक्त तरीके और सामग्री के बारे में किया गया निर्णय है।

Heart (भावात्मक ज्ञान क्षेत्र)

   इस ज्ञान क्षेत्र में मनोभाव या मनोदृष्टि प्रेरणा, शिक्षण की सहभागिता, अनुशासन एवं इनके जैसे अन्य मूल्यों को समावेशित किया जाता है। इसके भी पाँच मुख्य स्तर है-

  1. आकलन -जो हम सीखते है उसकी महत्ता
  2. आग्रहण -सुनने की इच्छा
  3. प्रतिक्रिया -सहभागिता की इच्छा
  4. संयोजन -मिलान करना
  5. निरूपण -अन्तर करना या अभिव्यक्त करना 

Hand (मनोसंचालित ज्ञान क्षेत्र)

      इस ज्ञान क्षेत्र को मनोगत्यात्मक, मनोप्रेरक या क्रियात्मक ज्ञान क्षेत्र भी कहा जाता है।  यह तकनीकी कौशल के अभिग्रहण से सम्बन्धित है।

इस ज्ञान क्षेत्र के भी पाँच स्तर है-
  1. हस्तकौशल - इसमें मशीनरी, उपकरण आदि का प्रयोग की कुशलता है
  2. प्रतिरूपता - इस स्तर पर शिक्षार्थी के कौशल को निखारा जाता है।
  3. स्पष्ट अभिव्यक्ति - यह स्तर सतत अभ्यास पर निर्भर करता है।
  4. परिशुद्धता - इस स्तर पर बार-बार अभ्यास कर सुधार एवं शुद्धता आती है।
  5. प्राकृतिकरण - इस स्तर पर शिक्षार्थी, शिक्षण के अनुरूप कौशल को आत्मसत् करना, संशोधन करना, नई तकनीकों को नियत करना इत्यादि को आत्मसत् करता है।
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शिक्षण के उद्देश्य Objectives of Teaching



शिक्षण के उद्देश्य Objectives of Teaching

       शिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिक्षार्थियों में अधिगम उत्पन्न करना है। शिक्षण के विभिन्न उद्देश्यों को दिये गए फ्लो चार्ट की सहायता से समझा जा सकता है-

ब्लूम द्वारा शिक्षण का वर्गीकरण

  • ज्ञानात्मक ज्ञान क्षेत्र

  1. ज्ञान
  2. बोध
  3. उपयोग
  4. विश्लेषण
  5. संश्लेषण
  6. मूल्यांकन

  • भावात्मक ज्ञान क्षेत्र

  1. आकलन
  2. आग्रहण
  3. प्रतिक्रिया
  4. संयोजित करना
  5. निरूपण

  • मनोसंचलित ज्ञान क्षेत्र

  1. हस्तकौशल
  2. प्रतिरूपता
  3. स्पष्ट अभिव्यक्ति
  4. परिशुद्धता
  5. प्राकृतिकरण

गैग्ने और ब्रिग्स के द्वारा वर्गीकरण

  1. ज्ञानात्मक रणनीतियाँ
  2. बौद्धिक कौशल
  3. मनोदृष्टि
  4. मौखिक सूचना
  5. संचालन तन्त्र और शारीरिक क्षमता
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शिक्षण की प्रकृति Nature of Teaching




शिक्षण की प्रकृति Nature of Teaching

         शिक्षण की प्रकृति सकारात्मक होती है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी में संज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक पक्षों को अभिप्रेरित किया जाता है। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जिसके गहन विश्लेषण पर ही शिक्षार्थी को शिक्षण की प्रकृति का बोध होता है।  शिक्षण की प्रकृति को निम्न रूपों में समझा जा सकता है-
  • शिक्षण कला एवं विज्ञान है। 
  • शिक्षण एक त्रिध्रुवीय प्रक्रिया है, जिसके तीन ध्रुव शिक्षक, बालक और पाठ्यक्रम है। 
  •  शिक्षण उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। 
  • शिक्षण अन्तःप्रक्रिया है। 
  • शिक्षण उपचरात्मक प्रक्रिया है। 
  • शिक्षण विकासात्मक प्रक्रिया है। 
  • शिक्षण एक भाषायी प्रक्रिया है।
      शिक्षण में विद्यार्थियों की पाठ्यचर्या तथा विषयवस्तु का विश्लेषण तार्किक आधार पर ही किया जाता है।
शिक्षण की निर्देशन प्रक्रिया का प्रारूप छः स्तरों पर किया जाता है, जो कि निम्नलिखित है-
  1. अन्वेषण 
  2. संलग्नता 
  3. विस्तार
  4. व्याख्या 
  5. मूल्यांकन 
  6. मानक 

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शिक्षण की अवधारणा Concept of Teaching


शिक्षण की अवधारणा Concept of Teaching

         शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें बहुत से कारक शामिल होते है, और सीखने वाला इस प्रक्रिया के माध्यम से ज्ञान और कौशल को अर्जित करता है।  शिक्षण का सामान्य अर्थ ‘शिक्षा प्रदान करना है’ जबकि इसका शाब्दिक अर्थ ‘सीखना या सीख देना है’। यह एक सामाजिक प्रक्रिया है, जो शिक्षण के मानवीय मूल्यों को विकसित करती है।
विस्तृत रूप से शिक्षा का तात्पर्य औपचारिक या अनौपचारिक रूप से आजीवन सीखते-सिखाते रहना है, किन्तु संकुचित रूप से शिक्षा का अर्थ औपचारिक रूप से किसी शिक्षण संस्थान में शिक्षा ग्रहण करने से है।
       वर्तमान शिक्षा परिवेश में शिक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में अधिगंम उत्पन्न करके सिखाना है न की बलपूर्वक ज्ञान को मस्तिष्क में बिठाना। शिक्षण के द्वारा शिक्षार्थी नवीन ज्ञान का अर्जन करता है, इस सन्दर्भ में विद्वानों ने शिक्षण की निम्नलिखित परिभाषाएं दी है-
  • रियान्स के अनुसार, “दूसरों को सीखाने, दिशा-निर्देश देने एवं उन्हें निर्देशित करने की प्रक्रिया ही शिक्षण है”।
  • गेज के अनुसार, “शिक्षण एक पारस्परिक प्रभाव है, जिसका उद्देश्य दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों में अपेक्षित परिवर्तन लाना है”।
  • बी ओ स्मिथ के अनुसार, “अधिगम को अभिप्रेरित करने वाली क्रिया शिक्षण है”।
  • जॉन डीवी के अनुसार, “शिक्षण एक त्रिमुखी प्रक्रिया है”।
  • स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही विराजमान पूर्णता का आविर्भाव है”।

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