आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः
तु प्रमेयम् ।।१.१.९।।
इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि
आत्मनः लिङ्गमिति ।।१.१.१०।।
चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः
शरीरम् ।।१.१.११।।
घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि
इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ।।१.१.१२।।
पृथिवी
आपः तेजः वायुः आकाशमिति भूतानि ।।१.१.१३।।
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः
पृथिव्यादिगुणाः तदर्थाः ।।१.१.१४।।
बुद्धिः
उपलब्धिः ज्ञानमिति अनर्थान्तरम् ।।१.१.१५।।
युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः
मनसः लिङ्गम् ।।१.१.१६।।
प्रवृत्तिः
वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ।।१.१.१७।।
प्रवर्त्तनालक्षणाः
दोषाः ।।१.१.१८।।
पुनरुत्पत्तिः
प्रेत्यभावः ।।१.१.१९।।
प्रवृत्तिदोषजनितः
अर्थः फलम् ।।१.१.२०।।
बाधनालक्षणं
दुःखम् ।।१.१.२१।।
तदत्यन्तविमोक्षः
अपवर्गः ।।१.१.२२।।
सूत्रार्थ - आत्म शरीरेन्द्रियार्थ = आत्मा,
शरीर, इन्द्रिय, अर्थ,
बुद्धि, मन, प्रवृत्ति,
दोष, प्रेत्यभाव, फल,
दुःख और मोक्ष, तु = यह बारह, प्रमेयम प्रमेय कहे गये हैं । इच्छाद्वेषप्रयत्न सुखदुःख ज्ञानान्य -
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान, इति = यह,
आत्मानः = आत्मा के, लिङ्गम् = लक्षण कहे गये
हैं । चेष्ट - इन्द्रियार्थ - आश्रयः = जो चेष्टा, इन्द्रिय
और उसके विषयों के लिये आधार रूप है, उसे , शरीरम् = शरीर अथवा देह कहा जाता है । घ्राणरसनचक्षुः = घ्राण, रसना, चक्षु, त्वक् श्रोत्राणि
- त्वचा और श्रोत्र, यह पाँचों, इन्द्रियाणि
- इन्द्रियाँ, भूतेभ्यः = भूतों से उत्पन्न हुई हैं । पृथिवी
= पृथिवी, आपः = जल, तेजः = अग्नि,
वायुः - वायु, आकाशम् = आकाश, इति = यह पांच, भूतानि = भूत कहे जाते है । गन्धरसरूपस्पर्शशब्द
: - गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द यह पाँचों, पृथिव्यादिगुणाः = पृथिवी
आदि पंचभूतों के गुण हैं और, तदर्थाः = उन पंच
ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं । बुद्धिः = बुद्धि, उपलब्धिः =
प्राप्ति, ज्ञानम् =
ज्ञान, इत्यनर्थान्तरम् = यह पर्यायवाची शब्द हैं । युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिः
= इन्द्रियों का अपने विषयों से जो सम्बन्ध है, उससे भिन्न
ज्ञान को उत्पत्ति, मनसः = मन के, लिङ्गम्
= लक्षण समझने चाहिये । वाग्बुद्धि शरोरारम्भः = वाणी , मन
और शरीर से होने वाला कर्म, इति = यह, प्रवृत्तिः
= प्रवृत्ति द्वारा ही होना समझना चाहिये । प्रवर्त्तना = प्रवृत्ति के, लक्षणा =
लक्षण वाला, दोष : = दोष कहा गया है । पुनः = बारम्बार,
उत्पत्तिः = जन्म लेना, मरना, प्रेत्यभावः = प्रेत्यभाव कहा गया है । प्रवृत्तिदोषजनितः = प्रवृत्ति और
दोष से उत्पन्न हुआ, अर्थः = विषय, फलम्
= फल है । बाधना = इच्छित वस्तु की प्राप्ति में बाधा, दुःखम्
= दुःख का, लक्षणम् = लक्षण है । तदत्यन्त विमोक्षः = उस
दुःख की अत्यन्त निवृत्ति का नाम ही, अपवर्गः = मोक्ष है ।

व्याख्या
- आत्मा, शरीर आदि बारह प्रकार के प्रमेय बताये हैं । परन्तु, यथार्थ रूप में जिसके ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति हो, और
जिसके ज्ञान में विपरीतता होने पर बन्धन की प्राप्ति हो, वही
प्रमेय है । जैसे आत्मा और परमात्मा इस प्रकार आत्मा के दो भेद हैं । इनमें
परमात्मा तो निर्लिप्त है और आत्मा अपने कर्म का फल भोगने वाला है । उन कर्मों के
फल को भोगने के साधन रूप में इन्द्रियाँ हैं और भोगने योग्य पदार्थ इन्द्रियों के
विषय हैं, इनका अनुभव इन्द्रियों से ही होता है । परन्तु,
इन्द्रियों से सब पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, इसलिये परोक्ष पदार्थों का ज्ञान कराने वाला मन है । मन में राग और द्वेष
दो प्रकार के भावों की उत्पत्ति होती रहती है । यह दोनों दोष हैं, जिनमें पदार्थों को त्यागने और ग्रहण करने की प्रवृत्ति होती रहती है ।
जन्म - मरण प्रेत्यभाव हैं और अच्छे या बुरे कर्मों का उपभोग ही फल है । यह फल भी
दो प्रकार का है - बुरे कर्मों से दुःख और अच्छे कर्मों से सुख की प्राप्ति होती
है । अत्यधिक सुख की प्राप्ति ही मोक्ष है, जिसमें दुःख का
अत्यन्त अभाव हो जाता है । आत्मा के छः लक्षण हैं –
(१)
इच्छा - जिस वस्तु से पहिले सुख मिला, उसी वस्तु की प्राप्ति का विचार
इच्छा कहा जाता है ।
(२)
द्वष - जिस वस्तु से पहिले कष्ट प्राप्त हुआ हो, उस वस्तु को देखकर उससे
बचने के विचार को द्वेष कहा गया है ।
(३)
प्रयत्न - दुःख के कारणों को दूर करने और सुख के कारणों को प्राप्त करने वाले
कार्य को प्रयत्न कहते हैं ।
(४)
सुख - जो शरीर को कष्ट न दे वह सुख है ।
(५)
दुःख - जिसकी प्राप्ति से शरीर को कष्ट हो वह दुःख और
(६)
ज्ञान - आत्मा या देह के अनुकूल तथा प्रतिकूल पदार्थों का जानना ही ज्ञान कहा गया
है ।
जीव
को अपने प्रारब्ध कर्म का भोग करने के लिये जन्म धारण करना होता है । सुख और दुःख
की प्राप्ति को भोग कहा गया है और जिस आधार में रहकर आत्मा उस भोग को प्राप्त कर
सके, वह आधार ही शरीर है । पांचों इन्द्रियाँ पंचभूतों से बनी कही जाती हैं ।
यह इन्द्रियां ही शरीर के आश्रित आत्मा को विभिन्न विषयों का ग्रहण कराती हैं ।
घ्राण अर्थात् नासिका का कार्य सूघना और गन्ध ग्रहण करना है, इसके द्वारा आत्मा को गन्ध का ज्ञान होता है । रसना अर्थात् जिह्वा खाद्य
पदार्थों का स्वाद ग्रहण करती है । नेत्र उपस्थित दृश्य को देखते हैं । त्वचा से
स्पर्श का ज्ञान होता है । श्रोत्र अर्थात् कान शब्द को ग्रहण करते हैं । इस
प्रकार यह पांचों इन्द्रियां आत्मा को गन्ध, रस, दृश्य, स्पर्श और शब्द का ज्ञान कराती रहती हैं । यह
पाँचों भूत परस्पर समवाय सम्बन्ध अर्थात् संयुक्त रूप से रहते हैं । यह पंचभूत
बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होकर आत्मा को अपने - अपने गुण का ज्ञान कराने में
समर्थ हैं ।
पांच
भूतों के पाँच गुणं हैं । पृथिवी का गुण गन्ध है, जल का गुण रस है,
अग्नि का गुण रूप है, वायु का गुण स्पर्श है
और आकाश का गुण शब्द है । यह पाँचों गुण ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं नासिका का
विषय गन्ध, जिह्वा का विषय रस, नेत्र
का विषय रूप, त्वचा का विषय स्पर्श और कान का विषय शब्द है ।
बुद्धि, उपलब्धि और ज्ञान इन तीनों के अर्थ में कोई अन्तर
नहीं है । यह घट है, यह पट है इस प्रकार का ज्ञान कराने वाली
वृत्ति बुद्धि का धर्म है और इसी को ज्ञान कहा जाता है । ‘मैं’ घड़े को जानता हूँ 'इस प्रकार का बोध उपलब्धि' है । इससे सिद्ध होता है
कि बुद्धि, उपलब्धि और ज्ञान में कोई भेद नहीं है । आत्मा की
प्रेरणा से ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों का सम्बन्ध रूप, रस, गंध आदि गुणों के साथ समान ज्ञान होना ही विषय
ज्ञान है । तात्पर्य यह है कि मन को एक समय में दो ज्ञान नहीं हो सकते । जब गंध का
ज्ञान होगा, तब अन्य गुणों का नहीं होगा, रूप का होगा तब गंध आदि का नहीं होगा । इस प्रकार एक समय में एक विषय का
ज्ञान होना मन का लक्षण है । इच्छापूर्वक होने वाले शरीर आदि के कार्यों को
प्रवृत्तिजनक समझना चाहिये । क्योंकि यह कार्य मन, वाणी और
शरीर से होता है । जो कार्य केवल मन मे होता है, उसे मानसिक
कार्य कहते हैं, मन और वाणी दोनों के संयोग से होने वाला
कर्म वाचिक है, तथा मन, इन्द्रिय और
शरीर के संयोग से जो कार्य होता है, वह शारीरिक कहा गया है ।
जिस कर्म का फल सुख रूप हो, वह पुण्य कर्म है और जिमका फलं
दुःख रूप हो उमे पाप कर्म समझना चाहिये । इस प्रकार पुण्य और पाप भेद वाली दश
वृत्तियाँ होती हैं । धर्म या अधर्म के हेतु प्रवृत्ति का होना दोष है अर्थात् जिस
प्रवृत्ति से धर्म या अधर्म कार्य की सिद्धि होती हो, उसे
दोष मानना चाहिये । प्रवृत्ति के कारण रूप राग, द्वेष और मोह
हैं । इनके होने पर ही धर्म या या अधर्म कार्यों में प्रवृत्ति होती है । एक शरीर
को छोड़कर दूसरे शरीर में जन्म लेना प्रेत्यभाव है । पुनर्जन्म या पुनरुत्पत्ति
पर्यायवाची शब्द हैं । शरीर से इन्द्रिय और मन का सम्बन्ध टूट जाने को प्रेत कहते
हैं । पुनः जन्म लेने को प्रेत्यभाव अर्थात् मर कर जन्म लेना कहते हैं । तात्पर्य
यह है कि सूक्ष्म शरीर सहित जीवात्मा का शरीर से निकलना प्रयाण है और प्रयाण करने
वाले को प्रेत कहते हैं और उस प्रेत का दूसरे शरीर से सम्बन्ध हो जाना प्रेत्यभाव
है । सुख या दुःख की प्राप्ति को ही फल कहते हैं, इसकी
उत्पत्ति प्रवृत्ति और दोष से होती है । धार्मिक प्रवृत्ति से किया गया कार्य सुखदायक
और अधार्मिक प्रवृत्ति वाला कार्य दुःख उत्पन्न करने वाला होता है । मन जिस किसी
वस्तु को प्राप्त करना चाहे और वह वस्तु न मिले तो उससे दुःख होता है ।
दुःख
के तीन भेद हैं आध्यात्मिक,
आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों प्रकार के दुःखों से अत्यन्त छुटकारा
मिल जाय, वही मोक्ष है । इन दुःखों से छुटकारा तभी हो सकता
है, जब जन्म - मरण का चक्र समाप्त हो जाय और यह चक्र तभी
समाप्त होगा जबकि प्रारब्ध कर्मों का क्षय हो जायगा । कुछ लोग शंका करते हैं कि
सुषुप्ति को ही मुक्ति क्यों न मानले ? क्योंकि उसमें भी
दुःखों से निवृत्ति हो जाती है तो इसका समाधान यह है कि सुषुप्ति में दुःखों का
आधार सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है, मुक्तावस्था में
सूक्ष्म शरीर भी नहीं रहता ।
*विशेष
- प्रमा अर्थात् यथार्थ अनुभव में जो दिखलाई पड़े वही प्रमेय ( Knowable ) है । इसके बारह भेद हैं - आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि,
मन, प्रवृत्ति, दोष,
प्रेत्यभाव, फल, दुःख और
अपवर्ग । विशेष - प्रमेयों के लक्षण न्यायसूत्र में प्रथम अध्याय में नवम सूत्र से
लेकर २२ वे सूत्र तक दिये गये है । तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में इनकी परीक्षा हुई
है ।
(१)
आत्मा ( Soul
)- ज्ञान से युक्त आत्मा है, यह सबों को देखने
वाली, सर्वज्ञ तथा सबों का अनुभव करने वाली है । यह विभु और
नित्य है । ईश्वर और जीव के रूप में इसके दो भेद हैं । सर्वज्ञ ईश्वर एक ही है, जीव प्रत्येक शरीर के लिए भिन्न-भिन्न है । आत्मा के लिए कुछ चिह्न हैं
जैसे- इच्छा ( जिस तरह की वस्तु से आत्मा को सुख मिलता है उसी तरह की वस्तु की
इच्छा उसे होती है ), द्वेष, प्रयत्न,
सुख, दुःख और ज्ञान । दुःखप्रद वस्तु से द्वेष
होता है, उन्हें हटाने या सुखद पदार्थों को लाने के लिए
प्रयत्न होता है । भोग करने पर या बोध होने पर यह मालूम होता है कि यह अमुक पदार्थ
है ।
(२)
शरीर ( Body
)- आत्मा के भोग का अधिष्ठान ( आधार ) शरीर है । शरीर विभिन्न
चेष्टाओं, इन्द्रियों और उनके अर्थों का भी आश्रय हैं । किसी
वस्तु को छोड़ने या पाने के लिए चेष्टायें शरीर में ही होती हैं । शरीर के अनुग्रह
से इन्द्रियाँ अनुगृहीत होती हैं, उसी में कोई उपघात होने पर
ये भी उपहत होती हैं अपने-अपने अच्छे या बुरे विषयों की प्रवृत्ति दिखलाती हैं,
उन इन्द्रियों का आश्रय भी शरीर ही है । शरीररूपी आयतन में
इन्द्रियों और उनके अर्थों के संनिकर्ष से उत्पन्न होने वाले सुख और दुःख की
संवेदना होती है । इसीलिए शरीर अर्थों का भी आश्रय है ।
(३)
इन्द्रियाँ ( Senses
) - इन्द्रियाँ भोग का साधन हैं जो शरीर से संयुक्त रहती हैं । ये
पाँच है- घ्राण, रसन, चक्षु, त्वचा और श्रोत्र जिनसे क्रमशः सूंघना, स्वाद लेना,
देखना, छूना, और सुनना -
ये काम होते हैं । इन इन्द्रियों में शक्तिदान करने वाले ये हैं - पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश
जिन्हें भूत भी कहते हैं ।
(४)
अर्थ ( Objects
) - उपर्युक्त इन्द्रियों के द्वारा भोग्य ( Enjoyable ) वस्तुओं को अर्थ कहते हैं । प्राणेन्द्रिय का अर्थ गन्ध है, रसनेन्द्रिय का रस, चक्षुरिन्द्रिय का रूप, त्वगिन्द्रिय का स्पर्श और श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द ।
(५)
बुद्धि ( Intellect
)- बुद्धि, ज्ञान और उपलब्धि ( Understanding
) इन तीनों को गौतम अनर्थान्तर अर्थात् पर्याय मानते हैं। यह चेतन
है और शरीर तथा इन्द्रियों के संघात से पृथक है ।
(६)
मन ( Mind
)- सुखादि ज्ञानों का साधन इन्द्रिय मन है । इसी को अन्तःकरण
अर्थात् आन्तरिक भावों को जानने वाली इन्द्रिय भी कहते हैं। इसका चिह्न ( लिङ्ग
या पहचान ) है एक साथ कई ज्ञान की उत्पत्ति न होने देना । केवल
इन्द्रियार्थसंनिकर्ष से यदि ज्ञान उत्पन्न होता तो घ्राणेन्द्रिय का सम्बन्ध गन्ध
से तथा श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द से एक ही साथ होकर दोनों ज्ञान ( गन्धज्ञान और
शब्दज्ञान ) साथ-साथ उत्पन्न होने पर ऐसा नहीं होता क्योंकि मन नियामक रूप से
पृथक् करने के लिए प्रस्तुत रहता है । मन गन्धज्ञान कराने पर ही शब्द का ज्ञान करा
सकता है ।
(७)
प्रवृत्ति ( Volition
)- वाचिक, मानसिक और शारीरिक क्रिया को
प्रवृत्ति कहते हैं । फिर शुभ और अशुभ के भेद से छह प्रकार की हो जाती है ।
वात्स्यायन शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों में प्रत्येक के दस-दस भेद मानते हैं । अशुभ
प्रवृत्तियों में शरीर से प्रवृत्त हिंसा, अस्तेय और
प्रतिषिद्ध मैथुन, वचन से प्रवृत्त अनृत, परुष, सूचन ( चुगली, शिकायत,
निन्दा ) और असम्बद्ध भाषण करना; मन से
प्रवृत्त परद्रोह, परधन को हडपने की इच्छा और नास्तिकता ।
शुभ प्रवृत्तियों में शरीर के द्वारा दान, रक्षा और सेवा;
वचन से सत्य, हित, प्रिय
और स्वाध्याय; मन से दया, अस्पृहा और
श्रद्धा । प्रवृत्तियों के ही कारण जन्म लेना पड़ता है ।
(८)
दोष ( Faults
) - प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले दोष कहलाते हैं । ये तीन हैं- राग,
द्वेष और मोह । ये ही ज्ञाता को पुण्य या पाप की ओर प्रवृत्त करते
हैं । जहाँ मिथ्याज्ञान होता है वहाँ राग और द्वेष रहते हैं । इन दोषों की संवेदना
प्रत्येक आत्मा को होती है । राग, द्वेष या मोह के वश में
प्राणी वह काम करता है जिससे सुख या दुःख मिलता है ।
(९)
प्रेत्यभाव ( Transmigration
)- उत्पन्न होने के बाद मर कर फिर जन्म लेना ही प्रेत्यभाव है ।
उत्पन्न प्राणी का सम्बन्ध देह, इन्द्रिय, बुद्धि और संवेदना के साथ होता है । मर जाने पर ये सम्बन्ध छूट जाते हैं ।
जब पुनः उत्पत्ति होती है तब दूसरे शरीरादि का सम्बन्ध स्थापित होता है । जन्म मरण
के प्रबन्ध का यह अभ्यास ( आवृत्ति ) तब तक चलता रहता है जब तक अपवर्ग की प्राप्ति
न हो जाय ।
(१०)
फल ( Fruit
) - प्रवृत्तियों और दोषों से उत्पन्न होने वाले अर्थ को फल कहते
हैं । फल में सुख और दुःख की संवेदना होती है । हम जो भी कर्म करते हैं उनमें कुछ
तो सुख का फल देते हैं, कुछ दुःख का । देह, इन्द्रिय, विषय और बुद्धि के होने पर ही फल मिलता है
इसलिए इन सबों को फल में गिन लेते हैं । इन फलों को लेने या त्यागने में ही सारा
संसार व्यस्त है । इनका अन्त नहीं है ।
(११)
दुःख ( Pain
) - जिससे पीड़ा या सन्ताप हो वही दुःख है । जब लोग देखते हैं कि
सारा संसार ही दुःख से पूर्ण है तो दुःख को हटाने की इच्छा से जन्म को दुख के रूप
में समझ कर निर्विण्ण ( निर्मम ) हो जाते हैं, तब विरक्त
होते हैं और विरक्त होने पर मुक्त भी हो जाते हैं । दुःख तीन प्रकार के हैं-
आध्यात्मिक, आधिभौतिकऔर आधिदैविक । वात, पित्त और कफ के
दोषों की विषमता से उत्पन्न शारीरिक अथवा काम, क्रोधादि से
उत्पन्न मानसिक दुःखों को आध्यात्मिक कहते हैं । आन्तरिक उपायों से ही इसका निवारण
सम्भव है । सर्प, व्याघ्र आदि जीवों से उत्पन्न दुःख
आधिभौतिक है । यक्ष, राक्षस, ग्रहादि
के आवेश से आया हुआ दुःख आधिदैविक है । ये दोनों दुःख बाहरी उपाय से ही हटाये जा
सकते हैं । दूसरे मत से दुःख इक्कीस तरह के हैं- शरीर, छह
इन्द्रियाँ, छह विषय, छह बुद्धियाँ,
सुख और दुःख । दुःख से सम्बन्ध होने के कारण सुख भी दुःख ही है ।
शरीरादि दुःख के साधन हैं, इसलिए दुःख के ही अन्दर हैं ।
दूसरे स्थान में बाहरी दुःखसाधन १६ प्रकार के माने गये हैं- परतन्त्रता, आधि ( मनःकष्ट ), व्याधि, मानच्युति,
शत्रु, दरिद्रता, दो
स्त्री होना, अधिक पुत्रियाँ होना, दुष्ट
स्त्री, दुष्ट नौकर, कुग्रामवास,
कुस्वामिसेवा, वार्धक्य, परगृह में रहना, वर्षा में परदेश रहना, बुरे हल से खेती । वस्तुतः दर्शनों का मूल ही दुःख है ।
(१२)
अपवर्ग ( Emancipation
)- दुःखों से बिलकुल मुक्त हो जाना अपवर्ग है । मिला हुआ जीवन जब
नष्ट हो जाय और अप्राप्त जीवन न मिले तभी अपवर्ग है । इस प्रकार नैयायिक अपवर्ग की
व्याख्या निषेधात्मक शब्दों में करते हैं ।
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