समस्या का चयन Identify the Problem
अनुसन्धान के पहले चरण में सर्वप्रथम समस्या का चयन किया जाता है । जितनी जागरूकता, सतर्कता एवं जिज्ञासा के साथ समस्या का चयन किया जाता है, शोध समस्या का चयन उतने ही अच्छे ढंग से होता है ।
अनुसन्धान की समस्या का चयन करते समय निम्नलिखित बातें ध्यान रखनी चाहिए
अनुसन्धानकर्ता की रुचि शोध परियोजना में अवश्य होनी चाहिए ।
अवधारणाओं के सूचक, विधि तथा संकेतक आदि सभी पूर्णरूप से स्पष्ट होने चाहिए ।
शोधकर्ता को विषय की प्रासंगिकता का ध्यान रखनी चाहिए ।
शोध उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए ।
अनुसन्धानकर्ता को शोध कार्य के विषय में सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए ।
शोध के विषय को अन्तिम रूप देने के लिए अनुसन्धानकर्ता को उससे सम्बन्धित सभी प्रकार के डाटा की उपलब्धता सुनिश्चित कर लेनी चाहिए ।
अनुसन्धान समस्या के निरूपण से पूर्व उनके नैतिक मुद्दों और उनके समाधान को पहले ही सोच लेना चाहिए ।
समस्या के प्रकार
1- सैद्धान्तिक समस्या
2- व्यावहारिक समस्या
3- सर्वेक्षण सम्बन्धी समस्याएँ
4- सह-सम्बन्धात्मक समस्याएँ
5- प्रायोगिक समस्याएँ
समस्या की विशेषताएँ
1- समस्याएँ पूर्णतः स्पष्ट एवं मूर्त होनी चाहिए।
2- समस्याएँ ऐसी होनी चाहिए जिसका समाधान किया जा सके ।
3- समस्या को नवीन होना चाहिए।
4- समस्या को अनुसन्धानकर्ता के लिए रुचिकर होंआ चाहिए।
5- समस्या परिकल्पनाओं पर आधारित होनी चाहिए।
6- समस्या व्यावहारिक रूप से उपयोगी होनी चाहिए ।
7- समस्या समाधान में अत्यधिक धन , समय एवं परिश्रम का अपव्यय न हो इसका ध्यान रखना चाहिए।
8- समस्या समाज के लिए उपयोगी होनी चाहिए।
असुर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽ वृत्ताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥ शब्दार्थ -असुर्य्या नाम = प्रकाश रहित, ते = वे, लोकाः = लोक, अन्धेन = घोर, तमसा = अंधकार से, आवृताः = घिरे हुए हैं, तान् = उनको, ते - वे, प्रेत्य = मरकर, अभिगच्छन्ति = प्राप्त होते हैं, ये के च = जो कोई, आत्महनः = आत्मा के हनन करनेवाला, जनः = मनुष्य हैं । अर्थ - वे मनुष्य महा अन्धकारवाले लोकों में मरने के पश्चात् जाते हैं, जोकि अपनी आत्मा को मार डालते हैं । अन्धकारवाले लोकों से तात्पर्य उन लोकों से है जिनमें जीव की जानने की शक्ति बहुत ही न्यून हो जाती है; क्योंकि सूर्य प्रकाशवाली शक्ति है और प्रकाश का अर्थ ज्ञान भी है, इसलिये सूर्य से रहित अन्धकारवाले लोक का तात्पर्य ज्ञान से रहित योनि से है; क्योंकि ज्ञान का अर्थ भलाई और बुराई को जानकर उसके द्वारा दुःख से छूटकर सुख प्राप्त करना है । जिन योनियों में सुख के प्राप्त करने के लिये और दुःख से छूटने के लिये जो साधन हैं । उनका ज्ञान न हो वह सब योनियाँ ज्ञान के सूर्य से रहित हैं और ज्ञान के सूर्य से तात्पर्य वेदों की शिक्षा से है; क्योंकि वेद का अर्थ ज्ञान है और सृष्टि के प्रारम्भ में होने से उनका स्वतः प्रकाश अर्थात बिना किसी दूसरी शिक्षा के प्रकाशित होना भी माना हुआ है । इसलिये जिन लोकों में वेदों की शिक्षा नहीं हो सकती, वह लोक सूर्य अर्थात प्रकाश से रहित है । परन्तु वेद-मन्त्र ने अंधकार से पूर्ण होने का अनुमोदन किया है । कुछ मनुष्यों का यह विचार होगा कि जब सूर्य का प्रकाश नहीं होगा, तो मनुष्य स्वयं ही अन्धकार से भर - पूर होंगे । वेद में यह शब्द क्यों प्रकाशित किये गये; परन्तु बुद्धिमान मनुष्य जान सकते हैं कि सूर्य के न होने की अवस्था में नितान्त अन्धकार ही नहीं रहता; किन्तु दीपक के प्रकाश की अवस्था में भी सूर्य नहीं होता । इसलिये वेद ने बता दिया कि जिन लोकों में सूर्य ( ईश्वरीय प्रकाश और दीपक अर्थात् मानुषो शिक्षा भावार्थ किसी प्रकार का प्रकाश ) नहीं होता; आत्मा को नाश करनेवाले मनुष्य उन लोकों में प्रवेश करते हैं । प्रश्न - जबकि तुम आत्मा की उत्पत्ति नहीं मानते; तो नाश भी किसी प्रकार हो नहीं सकता । यह उपदेश जो कि आत्मा को नाश करने के अध्याय में है । किस प्रकार ठीक हो सकते हैं, क्योंकि अविनाशी आत्मा का नाश हो हो नहीं सकता । जबकि इस अपराध का होना असम्भव है, तो उसका दण्ड बताना सरासर मूर्खता है ? उत्तर - नाश करने से तात्पर्य उसके अधिकार नाश करने से है, क्योंकि जीवात्मा को मन इत्यादि पर परमात्मा ने राज्य दिया है और यह सब इन्द्रिय मन और शरीर आत्मा को नियत स्थान तक पहुँचाने के लिये साधन दिये । अतएव - जो मनुष्य आत्मा को इस स्थान से गिराकर मन, इन्द्रिय और शरीर का दास बना देते हैं, वह सचमुच आत्मा का नाश करते हैं । प्रश्न - जब कि परमात्मा ने आत्मा को अधिकारी और मन इत्यादि को दास बनाया है, तो मनुष्य उसके विरुद्ध किस प्रकार कार्य कर सकता है ? उत्तर - मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, परन्तु जिस समय परमात्मा के विरुद्ध करता है, तो उसे दुःख मिलता है और जब परमात्मा की आज्ञा के अनुसार चलता है, तो उसे सुख मिलता है । प्रश्न - तुम जो नाश करने का अर्थ अधिकार का नाश लेते हो, इसमें क्या प्रमाण है । क्योंकि मन्त्र में तो आत्मा का हनन लिखा है | उत्तर - यहाँ अर्थ करने के लिये लक्षणा शक्ति का आधार किया है क्योंकि जहाँ अक्षरों से असम्भव अर्थ निकले वहाँ लक्षणा शक्ति से काम लिया जाता है । जैसे किसी ने कहा "मचान पुकारते हैं" । क्योंकि मचान में पुकारने की शक्ति का होना असम्भव है, इसलिये वहाँ यह लक्षणा करते हैं कि मचान पर बैठे हुए मनुष्य पुकारते हैं प्रश्न - तुम्हारा यह प्रमाण ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा हमने कभी नहीं सुना । दृष्टान्त वह होता है । जिसे प्रत्येक मनुष्य मान ले । उत्तर - जब मनुष्य रेलगाड़ी पर बैठे हुये कहते हैं कि मेरठ आ गया, तो बुद्धिमान् मनुष्य जानता है कि मेरठ तो जड़ पदार्थ है उसमें आने के कार्य का होना असम्भव है इसलिये वह उसके अर्थ यह समझता है कि रेलगाड़ो मेरठ पहुंच गयी और आने की क्रिया मेरठ को छोड़कर रेलगाड़ी पर लगा देता है । प्रश्न - यदि इस प्रकार मन-माना अर्थ किया जाय, तो किसी शब्द का ठीक अर्थ कुछ भी न होगा, परन्तु जहाँ जो चाहो कर लो । उत्तर - नहीं, शब्दों के ठीक अर्थ समझने के लिये ही यह शक्तियाँ नियत की गई हैं । जिससे कि कहने वालों का ठीक-ठीक अभिप्राय समझ में आ जाय और मनुष्य भ्रम-जाल में न पड़े रहें । प्रश्न - तुमने लोक शब्द का अर्थ शरीर किस प्रकार किया । क्योंकि किसी कोष में लोक का अर्थ शरीर नहीं किया गया । उत्तर - लोक शब्द का अर्थ दृश्य पदार्थ है । शरीर को दृश्य होने से और पिंड अर्थात जगत की समता दी जाती है । इसलिये लोक शब्द का अर्थ शरीर करना ठीक है और प्रेत्य ! शब्द अर्थात मरने के पश्चात् प्राप्त होने से दूसरे शरीर का नाम भी लोक ठीक हो सकता है ।
--------------------------महर्षि दयानन्द कृत उपनिषद-प्रकाश से
प्रश्न - क्या ईश्वर के भय से वैराग्य ग्रहण करके कर्मों को नितान्त त्याग देना चाहिये ?
उत्तर -कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत ने समाः । एवं त्वयि नान्यतोऽस्ति न कर्म तालिप्यते नरे ॥ २ ॥ शब्दार्थ - कुर्वन् = करता हुआ, एव = निश्चय, इह = इस संसार में, कर्माणि = कामों को, जिजीविषेत् = जीना चाहे, शतम = सौ, समाः = वर्षे, एवम = इस प्रकार, स्वाय = तुझमें, न = नहीं, अन्यथा = दूसरी तरह, इतम् = इसके सिवाय, अस्ति = है, न = नहीं, कम्म = काम, लिप्यते = चिपटता है, नरे = मनुष्य में, अर्थ = इस वेद-मंत्र में परमात्मा जीव को इस बात का उपदेश करते हैं कि हे जीव ! तुम इस संसार में सौ वर्ष तक कार्य करते हुए जीने को इच्छा करो अर्थात् पूर्ण आयु पर्यंत कार्य करते रहो । तुम्हारे लिये सबसे अच्छा मार्ग यही है, क्योंकि अच्छे कर्म जीव के बन्धन का कारण नहीं होते । बहुत से मनुष्य यह कहेंगे कि मंत्र में तो केवल कर्म लिखे हैं, तुम अच्छे किस प्रकार कहते हो, तो इसका उत्तर यह है कि ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध दूसरों का अधिकार लेनेवाले कर्मों के करने का निषेध वेद-मंत्रों में मिलता है । उनको छोड़कर जो कर्म हैं, वह सब ईश्वर की आज्ञा के अनुसार होने से शुभ ही हैं । किसी प्रकार की बुराई हो नहीं सकती, क्योंकि ईश्वर कभी दुःखदायक कर्म के करने का उपदेश जीव को नहीं करते और कर्म के उपदेश का तात्पर्य भी यही है । मनुष्य सदा अच्छा या बुरा कुछ न कुछ कार्य करता रहता है, इसलिये कर्म के उपदेश की कोई आवश्यकता न थी; परन्तु किसी का अधिकार न लेनेवाले कर्मों का उपदेश वेद-मंत्रों मैं इसलिये किया कि बिना शुभ कर्मों के किये मनुष्य बुरे कर्मों से बच नहीं सकता । बुरे कर्मों से सदा दुःख उत्पन्न होता है और कोई मनुष्य दुःख की इच्छा से कोई कार्य नहीं करता। इस सब बुराई को दूर करने के लिये उपदेश किया कि किसी समय भी शुभ कार्य से वंचित न रहो, जिससे अवकाश मिलने से बुरे कार्य का विचार ही उत्पन्न न हो; क्योंकि मन सदा कर्म करता रहता है । वह किसी समय भी कर्म से पृथक् नहीं होता । ऐसी अवस्था में जबकि मन की शक्ति को समाधि या सुषुप्ति के द्वारा नितान्त रोक दिया जाय, मनुष्य का सबसे बढ़कर कर्तव्य यह है कि वह मन को अवकाश न दे । इसलिये एक दृष्टांत लिखते हैं । दृष्टांत - एक समय किसी धनी के पास एक मनुष्य ने आकर कहा कि मैं नौकरी चाहता हूँ । धनी ने पूछा " क्या वेतन लोगे ? " सेवक ने कहा " मेरा वेतन यही है कि मुझे सदा ' कार्य करने को रहे । जब कार्य न दोगे मैं तुम्हें मार डालूंगा । " ; धनी ने सोचा कि सेवक तो बहुत अच्छा है, जो कुछ वेतन नहीं माँगता और कार्य करने के लिये सदा उद्यत है और कभी विश्राम लेने का नाम नहीं लेता । हमें अपने कार्यों के लिये बहुत से मनुष्यों की आवश्यकता पड़ती है । जब कार्य देखेंगे उसको कार्य देते रहेंगे । शेष मनुष्यों को निकाल देंगे । तात्पर्य यह है कि उस धनी ने सेवक को प्रतिज्ञा मान ली । सेवक बड़ा फुर्तीला था । काम - जिह्वा से निकला नहीं कि पूर्ण हुआ ---- एक दो दिन में ही धनी के कार्य समाप्त हो गये । अब उसे चिन्ता हुई कि यदि इसे कार्य नहीं देते, तो अवश्य मार डालेगा । यदि कार्य दें, तो इतना कार्य कहाँ से लायें । इस चिन्ता ने धनी के चित्त को नितान्त अशान्त कर दिया । खाना-पीना सब बन्द हो गया । एक दिन किसी विद्वान ने धनी से पूछा कि आपके पास इतना धन है, तो भी आप इतने निर्बल क्यों होते जाते है । धनी ने सब वृतान्त कह सुनाया । विद्वान् ने कहा कि तुम अपने कार्यों पर ही उसे निर्भर क्यों रखते हो ? उसे मुहल्ले और शहर के मनुष्यों के कार्यों पर लगा दो । यदि वह उसे भी पूरा कर दिखाये, तो सब मनुष्यों की भलाई के कार्य पर लगा दो । यदि इससे भी छुटकारा पा जाय, तो प्रत्येक जीव की सेवा का काम लो । यह सीमा रहित कार्य उससे जन्म भर समाप्त न या होगा और तुम उसके हाथ से बच जाओगे |
यही दशा मनुष्य के मन की है । जिस समय उसे शुभ कार्य से छुट्टी मिलेगी उसी समय मनुष्य के नाश करनेवाले कार्यों में लग जायगा । इसलिये उस मन को परोपकार के कार्य में लगाये बिना संसार को बुराइयों से बच नहीं सकते और न बुरा का कार्य करके आपत्ति और दुःख को छोड़कर किसी शुभः परिणाम की आशा कर सकता है। मनुष्य के अपने कार्य इतने स्वल्प हैं कि मन उनको बहुत शीघ्र समाप्त कर लेता है । भगवान रामचन्द्रजी ने भी हनुमान को यही उपदेश किया था । कि इच्छा की नदी शुभ और अशुभ इच्छा रूप दो मागों पर जाती है । जो इच्छा ईश्वर की आज्ञा के अनुसार हो वह शुभ है और जो उसके विरुद्ध है, बुरी इच्छा है । इसलिये ईश्वर को सर्व-व्यापी समझकर और यह सोचकर कि उसकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करने से दुःख भोगना पड़ेगा स्वार्थता और दूसरों का अधिकार छीनने को छोड़कर परोपकार और दूसरों की भलाई के कार्य करना चाहिये । जो मनुष्य दूसरों को भलाई के कार्य करते हैं वह सदा सुख से रहते हैं । इसलिये परोपकार की इच्छा जो अच्छी है सदा मन में रखकर संसार के उपकार पर कमर बाँधनी चाहिये । जब तक प्राण रहें, कभी उस उपकार, के कार्य से पृथक् होकर जीवन न व्यतीत करना चाहिये, क्योंकि मनुष्य - जीवन इतना बहुमूल्य है कि उसका बार बार मिलना अत्यन्त कठिन है । जो मनुष्य ईश्वर की चिन्ता न करके मनुष्य-जीवन को व्यर्थ कार्यों में खो रहे हैं । उनसे बढ़कर मूर्ख कोई नहीं और जो दूसरों को हानि पहुँचाकर लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, वह पूरे पशु हैं । वहीं मनुष्य बुद्धिमान् कहलाते हैं, जो सदा परोपकार के कार्यों में लगे रहते हैं । जिनके जीवन का उद्देश्य ही दूसरों की भलाई करना है और जो बिना स्वार्थ संसार के उपकार में लगे रहते हैं । वही प्राणी ईश्वर-ज्ञान को पाते हैं, जो शुभ कार्य दूसरों की भलाई के लिये करते हैं । वह कभी बंधन का कारण नहीं होते । बंधन के कारण वही कर्म होते हैं, जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध किये जाते हैं और जिनमें दूसरों का अधिकार लेने का विचार उपस्थित है । बस, जो मनुष्य अपने जीवन को परोपकार में बितायेगे, वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कमों से मन को शुद्ध करके तत्वज्ञान को ग्रहण करके मुक्ति के अधिकारी होंगे ।
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--------------------------ऋषि दयानन्द कृत उपनिषद-प्रकाश से
अनुसन्धान एक क्रमिक प्रक्रिया है , जिसमें प्रत्येक प्रकार के अनसन्धान को कुछ विशिष्ट पदों के अन्तर्गत क्रमानुसार पूर्ण किया जाता है । यह एक वैज्ञानिक विधि है , जिसमें अनुसन्धानकर्ता किसी समस्या के समाधान के लिए तार्किक रूप से प्रयोग करता है ।
सामान्यत : अनुसन्धान या शोध के आठ चरण निर्धारित किए गए हैं-
1- समस्या का चयन ( Identify the Problem )
2- परिकल्पनाओं का निर्माण ( Making of Hypothesis )
3- शोध प्रारूप या शोध अभिकल्प का विकास ( Development of Research Design )
4- न्यायदर्श या प्रतिदर्श चयन ( Selecting Samples )
5- अनुसन्धान प्रस्ताव लेखन ( Writing a Research Proposal )
6- प्रदत्तों का एकत्रीकरण ( Collection of Data )
7- प्रदत्तों का संस्करण और विश्लेषण ( Processing and Analysis Data )
8- अनुसन्धान रिपोर्ट लेखन ( Writing a Research Report ) समस्या का चयन Identify the Problem
अनुसन्धान के पहले चरण में सर्वप्रथम समस्या घटना , व्यवहार या प्रश्न का चयन किया जाता है और जितनी जागरूकता , सतर्कता , जिज्ञासा के साथ समस्या का चयन किया जाता है , शोध समस्या का चयन उतने ही अच्छे ढंग से होता है । परिकल्पनाओं का निर्माण Making of Hypothesis
अनुसन्धान के दूसरे चरण में सभी समस्याओं की पहचान के बाद उससे सम्बन्धित परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाता है । यह शोध के विकास का उद्देश्यपूर्ण आधार है । शोध प्रारूप या शोध अभिकल्प का विकास Development of Research Design
शोध अभिकल्प एक प्रश्न का उत्तर जानने , परिस्थिति का वर्णन करने या परिकल्पना के निरीक्षण से सम्बन्धित होता है , जो योजनानुसार कार्य करके सम्पूर्ण अनुसन्धान पर नियन्त्रण करता है । न्यायदर्श या प्रतिचयन Selecting Samples
मिडेड पार्टेन के अनुसार , “ समग्र में से निश्चित संख्या में व्यक्ति , घटना अथवा निरीक्षणों को पृथक् करने की प्रक्रिया एवं पद्धति के अध्ययन के लिए सम्पूर्ण समूह में से एक अंश का चयन करना ही न्यायदर्श / प्रतिदर्श कहलाता है । " वस्तुत : जनसंख्या की समस्त इकाइयों में से अध्ययन के लिए कुछ निश्चित इकाइयों की एक निश्चित विधि के चयन को न्यायदर्श / प्रतिदर्श / प्रतिचयन कहा जाता है । अनुसन्धान प्रस्ताव लेखन Writing a Research Proposal
किसी भी अनुसन्धान परियोजना को मानने या स्वीकार करने से पहले उसका प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाए , यह अवधारणा कई संस्थान अनिवार्य कर देते हैं । इसके द्वारा शोध परियोजना का मूल्यांकन करने का आधार भी प्राप्त हो जाता है । यह तीन से सात पृष्ठों का एक दस्तावेज ( Document ) होता है जो शोधकर्ता द्वारा लिखा जाता है । यह दस्तावेज सम्पूर्ण अनुसन्धान प्रक्रिया की रूपरेखा एवं विस्तृत विवरण होता है प्रदत्तों का एकत्रीकरण Collecting Data
शोधकर्ता जाँच की प्रकृति , उसका क्षेत्र , उद्देश्य , वित्तीय लागत , समय की उपलब्धता इत्यादि को देखकर प्रदत्त एकत्रित करने की विधि का चयन करता है । प्राथमिक प्रदत्त सर्वेक्षण या प्रयोग के द्वारा एकत्र किए जाते हैं । यदि शोधकर्ता किसी प्रयोग को आयोजित करता है , तो वह उसके लिए परिमाणात्मक मापन या प्रदत्त का चयन करता है एवं उन प्रदत्तों का परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए विश्लेषण किया जाता है । प्रदत्तों का प्रसंस्करण एवं विश्लेषण Processing and Analysing Data
प्रदत्त एकत्रित करने के बाद अनुसन्धान प्रक्रिया के अगले चरण में प्रदत्तों । का विश्लेषण किया जाता है । प्रदत्तों के विश्लेषण के लिए उन्हें कुछ प्रबन्धनीय समूहों या तालिका में संघटित किया जाना चाहिए और ऐसा प्रदत्तों का प्रासंगिक एवं उद्देश्यपूर्ण श्रेणियों में वर्गीकरण करके ही किया जा सकता है शोध / अनुसन्धान रिपोर्ट लेखन Writing a Research Report
अनुसन्धान का समापन होने के पश्चात् शोध रिपोर्ट बनाई जाती है ।
" मंत्र - ईशावास्यमिदsसर्व्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ १ ॥
शब्दार्थ - यत = जो, किञ्च = कुछ, जगत्याम् = संसार में, जगत् = समष्टि व्यष्टि रूप से विद्यमान है, इदम् = यह, सर्वम् = सब, ईशावास्यम् = ईश्वर से रहने योग्य है, तेन = उस ईश्वर से, त्यक्तेन = दी हुई वस्तुओं से, भुञ्जीथाः = भोग करो, कस्यस्वित = किसी का, धनम् = धन, मा गृधः = मत ग्रहण करो ।
अर्थ - जो कुछ इस नाशवाले संसार में भाग या पूर्ण वस्तुएँ हैं, वह सब ईश्वर के रहने का घर है या ईश्वर से ढकी हुई हैं अर्थात् प्रत्येक वस्तु में विद्यमान है । कोई पर्वत की गहरी से गहरी गुफा नहीं, जिसमें ईश्वर विद्यमान न हो, कोई समुद्र की गहरी से गहरी तह नहीं, जहाँ परमात्मा न हो । कोई पर्वत की चोटी ऐसी नहीं जहाँ परमात्मा न हो। सूर्यलोक, चन्द्रलोक, तारागण इत्यादि जितने भी लोक लोकान्तर हैं, सब स्थानों में परमात्मा व्यापक है । किसी स्थान पर मनुष्य परमात्मा से छिप नहीं सकता । जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध करते हैं अर्थात् ईश्वर को छोड़ देते हैं । वे जन्म-मरण के दुःखों को भोगते हैं । इसलिये प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि परमात्मा को सब जगह व्यापक जाने, तो उसके विरुद्ध करने से दुःख की उत्पत्ति को समझकर कभी पाप करने के लिये उद्यत न हो । किसी का धन लेने की इच्छा न करे, क्योंकि परमात्मा का नियम है कि प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार भोग मिलता है और कोई मनुष्य उसके विरुद्ध अपनी इच्छा से भोग प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिये दूसरे का धन लेने की इच्छा से पाप तो अवश्य होगा और भोग में कुछ भी अन्तर नहीं आयेगा । इसीको बिना लाभ का पाप कहते हैं। प्रश्न - यद्यपि इस वेद-मंत्र से ईश्वर का सर्व-व्यापी होना पाया जाता है, परन्तु हम ईश्वर को कहीं नहीं देखते। अब हम तुम्हारे इस वेद मंत्र को माने या अपनी आँखों से देखी हुई वस्तुओं का विश्वास करें । यदि ईश्वर है, तो बताओ कहाँ है ? उत्तर - बहुत सी वस्तुएँ हैं, जो सूक्ष्मता और दूरी इत्यादि के कारण प्रतीत नहीं होती और उनकी सत्ता को सब मनुष्य मानते हैं जैसे बुद्धि, आत्मा, दुख इत्यादि हैं । इससे सिद्ध है कि संसार में ऐसी वस्तुएँ विद्यमान हैं, जिनको मनुष्य इन्द्रियों से नहीं जान सकते, उनमें से एक ईश्वर है । यह प्रश्न कि ईश्वर कहाँ है? नितान्त अशुद्ध है; क्योंकि कहाँ का शब्द एक देशी के लिये आता है और वेद-मंत्र ने ईश्वर को सर्वव्यापक बताया है । जैसे कोई कहे कि दूध में घी या मिश्री में मिठास कहाँ है । तो उत्तर होगा सर्वत्र । इससे कहाँ का आक्षेप एक देशी वस्तुओं के लिये उचित प्रतीत होता है, सर्वव्यापी के लिये नहीं । प्रश्न - जो मनुष्य ईश्वर को नहीं मानते, वे अधिक धनी प्रतीत होते हैं, जैसे चोनी इत्यादि नास्तिक जातियाँ । इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर के मानने से दरिद्रता और दुख प्राप्त होते हैं । उत्तर - प्रथम तो यह प्रश्न ठोक नहीं कि नास्तिक मनुष्य अधिक धनी होते हैं; क्योंकि ईसाई, यहूदी जो ईश्वर की सत्ता को मानते हैं, बड़े-बड़े धनी देखे जाते हैं । दूसरे धनी होना कोई अच्छी बात नहीं; किन्तु जितने धनी देखे जाते हैं, उन सबमें और अधिक बुराइयाँ देखी जाती हैं । वेदों के मानने वाले तो इस प्रकार के धन को जिससे मुक्ति के मार्ग में बाधा के अतिरिक्त अन्य कोई लाभ प्राप्त नहीं होता, बुरा मानते हैं । प्रश्न - क्या कोई मनुष्य बिना धन के सिद्ध मनोरथ हो सकता है ? उत्तर - संसार में तो मनुष्य के लिये धन की आवश्यकता प्रतीत होती है, परन्तु उससे मनुष्य अपने नियत स्थान से नितान्त दूर हो जाता है । जो लोग संसार और दीन दोनों एक साथ प्राप्त करना चाहते हैं, वे बड़े मूर्ख है । प्रश्न - क्या वेदों में धन कमाने की आज्ञा नहीं है ? उत्तर - वेदों में प्रत्येक वस्तु के विषय में, जिससे जीवन का काम पड़ता है वर्णन है । नीच मनुष्य ही धन की इच्छा भी करते है । परन्तु वेदों में धन को कहीं मुक्ति का कारण नहीं लिखा; किन्तु योगाभ्यास और वैराग्य को मुक्ति का कारण बताया है । वैराग्य का अर्थ सब सांसारिक वस्तुओं की इच्छा छोड़ना है । जो मनुष्य सांसारिक वस्तुओं की इच्छा में फँसे हैं, वही ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं । जितने झगड़े संसार में फैले हैं; उन सबका कारण दूसरों का अधिकार लेना है । यदि मनुष्य केवल इसी वेद-मंत्र के समान आचरणवाले हो जावें, तो लड़ाई-झगड़े सब दूर हो जावें; चोरी, लूट-मार और ठगी का नितान्त अन्त हो जावे; पुलिस और सेना की आवश्यकता न रहे, अदालतें बन्द दिखाई दें । तात्पर्य यह है कि जितनी बुराइयाँ आज संसार में दिखाई देती हैं, कहीं उनका चिन्ह भी न दिखाई दे और प्रत्येक मनुष्य संसार में स्वर्ग से बढ़कर आनन्द उठाये ।
------ ऋषि दयानन्द कृत उपनिषद् - प्रकाश से
#मनुस्मृति से जब आदि ऋषि मनु ने संसार के कल्याण के लिए उपदेश दिया था तब उस समय वेद को अपौरुषेय, अचिन्त्य तथा अप्रमेय माना जाता था। इसका प्रमाण मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के तीसरे श्लोक में मिलता है, जब बहुत से ऋषिगण महर्षि मनु के पास अपनी जिज्ञासा लेकर गए थे और महर्षि मनु ने उन्हें मानव कल्याण का उपदेश दिया था । उस समय वेद को लेकर शायद ही किसी प्रकार का कोई भ्रम रहा होगा और न ही किसी प्रकार की कोई शंका रही होगी। उस समय वेद का न कोई भाष्य था और न ही किसी को वेद मंत्रों के अर्थ करने की आवश्यकता थी । उस समय सब वेद से भली प्रकार परिचित थे और मंत्रों का साक्षात आत्मसात् किया जाता था । जो ऋषि वेद मंत्रों का साक्षात्कार कर लेते थे उन्हें उस मंत्र का दृष्टा कहते थे और जो मंत्र का आत्मसाक्षात्कार नहीं कर पाते थे उनके लिए वेद श्रुति के रूप में जीवन्त था। आज अनेकों लोग आ गए जो वेद की साक्षात्कार प्रणाली तो बहुत दूर की बात उसकी श्रुति प्रणाली को भी चरितार्थ नहीं करते । उन्होंने वेद को केवल भाष्य तक सीमित कर दिया और वेद को प्रमेय की श्रेणी में डाल दिया, जबकि वेद को अप्रमेय कहा जाता था । आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि प्रमेय उस ज्ञान को कहते है जिसकी प्राप्ति इन्द्रियों के द्वारा या प्रमाणों से होती है । न्याय-सूत्र का भाष्य करने वाले वात्स्यायन ने स्वयं स्वीकार किया है कि “योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्” अर्थात जो अर्थ समझा जाता है वह प्रमेय है । आप यहीं नहीं रुकते आप अर्थ को भी स्पष्ट करते हुए लिखते है कि "अर्थस्तु –सुखं सुखहेतुश्च , दुःखं दुःखहेतुश्च" अर्थात जो सुख, सुख का हेतु और दुःख, दुःख का हेतु है वह अर्थ है।" स्वयं महर्षि गौतम ने एक सूत्र में प्रमेय को परिसीमित और परिभाषित करते हुए "प्रमेयप्रकरणम्' दिया तो उसमे १२ प्रमेय बताई जो कि प्रमाण आदि से जानने योग्य है। इनमे वेद को नहीं रखा गया- "आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।१.१.९।।" ------------------------------ अब मुझे एक बात कभी समझ नहीं आई कि आदि ऋषि मनु से लेकर महर्षि गौतम तक, जब किसी ने भी वेद को प्रमेय नहीं माना तो आज तथाकथित विद्वान वेद को प्रमेय की श्रेणी में क्यों रख रहे है, और क्यों वेद मंत्रों का अर्थ व्याकरण आदि के आधार पर इन्द्रियगम्य करने पर लगे पड़े है। आज भाष्यकारों के वेद मंत्रों के अर्थ को अन्तिम परिणिती माना जा रहा है और एक होड सी लग गई है कि किसका अर्थ सुगम और बुद्धिगम्य हो। जब वेद इन्द्रियों का विषय है ही नहीं तो क्यों इसके नाम पर अपनी विद्वत्ता सिद्ध की जा रही है। जब वेद की या तो श्रुति प्रणाली या फिर साक्षात प्रणाली है तो क्यों इसके मंत्रों के अर्थ करने की एक लाभहीन प्रणाली का विकास किया जा रहा है? सोचो वेद स्वयं में पूर्ण है उसे किसी की आवश्यकता नहीं अपने आपको सिद्ध करने के लिए या फिर अर्थ करने के लिए। हमने वेद नहीं खोए हमने उसकी प्रणाली खो दी है, जिसे प्रयोग में लाए बिना वेद का कोई महत्व सिद्ध ही नहीं होता। --- विकास विद्यालंकार -----------------------
आर्यावर्त की तर्कविद्या में छः दर्शन प्रसिद्ध
हैं ,
जिनमें - वेदों को प्रमाण माना है , और
वेदोक्त सिद्धान्तों पर तर्क से विचार किया है, अतएव इनको
वेदों के उपांग कहते हैं । इनसे अतिरिक्त तीन दर्शन और हैं, जिनमें
न वेदों को प्रमाण माना है, न वेदोक्त सिद्धान्तों पर विचार
किया है, प्रत्युत आक्षेप किये हैं, और
अपने-अपने स्वतन्त्र सिद्धान्तों को तर्क से स्थापन किया है । इस दृष्टि से
दर्शनों के दो भेद हो जाते हैं, वैदिक और अवैदिक ।
वैदिक छः दर्शन यह हैं – वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त । अवैदिक तीन दर्शन यह हैं - चार्वाक, बौद्ध और आर्हत । इनमें से चार्वाक दर्शन, नास्तिकदर्शन
क्योंकि उसमें परलोक को नहीं माना है, शेष सारे दर्शन आस्तिक
दर्शन हैं, क्योंकि उनमें परलोक को माना है । पर वैदिक लोगों
की दृष्टि से बौद्ध और आर्हत भी नास्तिकदर्शन ही हैं, क्योंकि
वह वेदबाह्य हैं, और वेद के निन्दक हैं ।
भारतीय दर्शनों के अध्ययन में इन दर्शनों का क्रम
यह रहेगा,
पहले अवैदिक, फिर वैदिक, क्योंकि अवैदिकदर्शन वैदिक दर्शनों के पूर्वपक्षी हैं, और वैदिकदर्शन सिद्धान्त के स्थापक हैं । अवैदिकों में भी पहले नास्तिक
फिर आस्तिक, क्योंकि नास्तिक सबका पूर्वपक्षी है । और
वैदिकदर्शनों में जो क्रम है, वह उनके विषय की अपेक्षा से है,
न कि पूर्वपक्ष की अपेक्षा से, क्योंकि वह सभी
सिद्धान्त के व्यवस्थापक हैं ।
आस्तिक
और नास्तिक आधार पर भारतीय दर्शनों का वर्गीकरण
नास्तिक
दर्शन
1-चार्वाक
2-जैन
3-बौद्ध
आस्तिक
दर्शन
1-न्याय
2-वैशेषिक
3-सांख्य
4-योग
5-मीमांसा
6-वेदान्त
ईश्वरवादी
और अनीश्वरवादी आधार पर भारतीय दर्शनों का वर्गीकरण