कार्यक्रम अनुदेश विधि
कार्यक्रम अनुदेश विधि शिक्षण की उच्च स्तर पर संचरित पद्धति का एक सामान्य उदाहरण है।
यह तार्किक क्रम पर आधारित शिक्षण विधि है, जिसमें छात्र प्रत्येक चरण के पश्चात तुरन्त प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने में सक्षम होता है। कार्यक्रम अनुदेश विधि के गुण
शिक्षण की यह विधि शैक्षणिक कार्य की प्रगति को जानने के लिए नियमित प्रतिपुष्टी के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
इसके माध्यम से शिक्षार्थी की सक्रिय भूमिका को सरलतापूर्वक सुनिश्चित किया जा सकता है।
शिक्षण के कार्यक्रम अनुदेश विधि को किसी भी विषय के अध्ययन-अध्यापन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
कार्यक्रम अनुदेश विधि के दोष
तार्किक और उच्च स्तर पर संचरित प्रणाली होने के कारण यह शिक्षण विधि विद्यार्थीयों के मध्य अरुचिपूर्ण साबित हो सकती है।
इस विधि में कुछ समय उपरान्त शिक्षार्थियों में प्रेरणा का स्तर कम होने की सम्भावना बनी रहती है।
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियाँ
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियों के अन्तर्गत शिक्षार्थी का केन्द्रीय स्थान होता है। इसमें विद्यार्थीयों के मनोविज्ञान को समझते हुए शिक्षण की व्यवस्था की जाती है और उनकी समस्याओं का निराकरण किया जाता है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थीयों की अभिरुचि, अभिवृत्ति और क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करना है। इस विधि के द्वारा छात्रों में स्वतन्त्र चिन्तन धार और मनन को जन्म दिया जाता है। शिक्षार्थी केन्द्रित शिक्षण विधि में व्यक्तिगत शिक्षण को महत्व दिया जाता है। इस विधि में शिक्षक का मुख्य ध्यान शिक्षार्थियों की कल्पनाओं, जिज्ञासाओं एवं कठिनाइयों को सुलझाने के प्रति होता है। इस शिक्षण विधि के समर्थक शिक्षा मनोवैज्ञानिक ‘जॉन डीवी’ है।
शिक्षार्थी केन्द्रित विधियों का वर्गीकरण 9 प्रकार से किया जाता है, जो निम्न प्रकार से है-
1- कार्यक्रम अनुदेश विधि
2- सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि
3- कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि
4- परस्पर संवादी वीडियो विधि
5- मुक्त अधिगम विधि
6- निरीक्षण विधि
7- खेल शिक्षण विधि
8- अन्वेषण विधि
9- प्रयोगशाला विधि कार्यक्रम अनुदेश विधि
कार्यक्रम अनुदेश विधि शिक्षण की उच्च स्तर पर संचरित पद्धति का एक सामान्य उदाहरण है। यह तार्किक क्रम पर आधारित शिक्षण विधि है, जिसमें छात्र प्रत्येक चरण के पश्चात तुरन्त प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक प्राप्त करने में सक्षम होता है। सुपुर्द नियत अधिन्यास कार्य विधि
इस विधि का उपयोग विशेष प्रयोजन की पूर्ति हेतु किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थीयों की सुविधा के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को अनेक खण्डों में विभाजित कर दिया जाता है। इस विधि के माध्यम से छात्रों का सर्वेक्षण करना, संख्यात्मक समस्याओं का समाधान करना, अतिरिक्त जानकारी एकत्रित करना, जैसे अनेक कार्यों का सम्पादन किया जाता है। कम्प्यूटर आधारित शिक्षण विधि
कम्प्यूटर आधारित शिक्षण प्रणाली का उद्देश्य कम्प्यूटर के माध्यम से शिक्षा पद्धति को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करना है। इस विधि के द्वारा सूचना प्रवाह को गत्यात्मक रूप दिया जाता है और शिक्षण प्रणाली को अधिक वैज्ञानितपूर्वक करने पर बल दिया जाता है। परस्पर संवादी वीडियो विधि
परस्पर संवादी वीडियो विधि शिक्षण विधि में शिक्षार्थी को किसी विषय से सम्बन्धित जानकारी, क्रमरहित ढंग से आसानी से प्राप्त हो जाती है। यह विधि छात्र को एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर कई विषयों, मुद्दों या समस्याओं की जानकारी और उनके संशोधात्मक उपाय सरलता से आपूर्ति करने में सक्षम है। इस विधि में शिक्षार्थी अपने परिणामों की प्रतिपुष्टी अर्थात फीडबैक तत्काल प्राप्त कर सकते है मुक्त अधिगम विधि
मुक्त अधिगम विधि शिक्षण की एक सरल, लचीली और प्रभावी विधि है। इस विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी को सीखने के लिए मानवीय संसाधन, सामग्री, उपकरण व आवास की आवश्यकता न्यूनतम स्तर पर होती है या नहीं होती है। इस शिक्षण विधि में विद्यार्थी पर शिक्षण में प्रवेश के लिए किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। निरीक्षण विधि
शिक्षार्थी केन्द्रित निरीक्षण विधि में विषय के सभी पहलुओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है। यह विधि शिक्षण की एक रोचकपूर्ण पद्धति है, जो विद्यार्थीयों की पूर्ण सक्रियता को सुनिश्चित करती है। यह विधि कला और विज्ञान संकाय दोनों ही विषयों में लोकप्रिय है, किन्तु विज्ञान में इसका प्रचलन सर्वाधिक लोकप्रिय है। खेल शिक्षण विधि
शिक्षण में खेलों को सर्वाधिक महत्व ‘फ्रॉबेल’ ने दिया और खेल विधि की दार्शनिक व्याख्या भी दी। इस विधि के जनक ब्रिटेन के गणितज्ञ ‘कोल्ड़वेल कुक’ थे, इन्होंने ही सर्वप्रथम गणित विषय में खेल विधि का उपयोग किया था। यह विधि सभी आयु के विद्यार्थीयों के लिए उपयोगी है। अन्वेषण विधि
अन्वेषण विधि को अनुमानी विधि भी कहा जाता है। इस विधि में शिक्षार्थी बिना सहायता प्राप्त किए अपनी समस्या का समाधान ढूंढते है। शिक्षण की यह विधि प्रतिभागियों को सक्रिय रखती है और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है। इस विधि के जनक ‘एच ई आर्मस्ट्रांग’ को माना जाता है। प्रयोगशाला विधि
यह विधि खोज के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसके द्वारा किसी परिमाण पर पहुँचने के लिए खोज द्वारा तथ्यों का उल्लेख होता है। इस विधि में छात्र प्रयोगशाला में प्रयोग द्वारा स्वयं ही निष्कर्ष निकालकर अवधारणा विकसित करते है। यह विधि आगमन विधि का ही वृहत एवं विकसित प्रयोगात्मक स्वरूप है।
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि एक अच्छे स्तर की शिक्षण विधि है, जिसके द्वारा शिक्षण गतिविधि को अच्छे तरीके से शिक्षार्थी तक संप्रेषित किया जा सकता है। टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि के गुण
शिक्षण की इस विधि द्वारा कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों या अध्यापकों को कक्षा में किसी विषय की प्रस्तुति का अवसर मिलता है, जिससे छात्रों का अधिक लाभ होता है।
यह भौतिक रूप से उपस्थिति के बगैर शिक्षण कार्य को विधिवत संचालन करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
यह मूलतः वयस्क शिक्षार्थियों के लिए उपयोगी है।
इस विधि के अन्तर्गत चित्रमय व्याख्यान प्रस्तुति और अन्य शिक्षण सहायक सामग्री जैसे; मॉडल, स्लाइड आदि का प्रयोग होता है, जिससे विषय की बोधगम्यता बढ़ जाती है।
इससे दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा मिलता है।
शिक्षण की यह विधि मूलतः खगोल विज्ञान, भूगोल विज्ञान जैसे विषयों के लिए अधिक उपयोगी होती है।
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि के दोष
इस शिक्षण विधि में द्विमार्गीय संचार की सम्भावना नहीं रहती।
इसमें पाठ्य सम्बन्धी जटिल प्रसारण अवधि को समायोजित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
समूह शिक्षण विधि
समूह शिक्षण विधि बड़े स्तर पर अध्यापन का एक कार्य है, जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक मिलकर कार्य योजना का निर्माण एवं उसका क्रियान्वयन करते है।
पैनल चर्चा, विचार गोष्ठी आदि शिक्षण सम्बन्धी क्रियाएं इसी समूह शिक्षण के अन्तर्गत आती है। समूह शिक्षण विधि के गुण
यह विधि शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
इसमें शिक्षण तकनीकों और उपकरणों का उपयोग कर शिक्षार्थी के व्यावहारिक पक्ष को मजबूत किया जाता है।
इस विधि के द्वारा छात्रों को एक ही प्लेटफ़ॉर्म में अच्छे और कुशल शिक्षकों से जुडने का अवसर मिलता है।
समूह शिक्षण विधि के दोष
इस शिक्षण विधि से विशेष दक्षतापूर्ण शिक्षकों को ढूँढना जटिल हो जाता है।
इसमें शिक्षण कार्य के लिए अधिक शिक्षकों की आवश्यकता होती है।
इसे सभी विषयों के अध्यापन के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है।
इसमें समय निर्धारण योजना निर्माण और प्रबन्धन के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।
व्याख्यान-प्रदर्शन विधि
भारतीय शिक्षा के अनुरूप यह सर्वाधिक उपयुक्त, व्यवहारिक एवं उपयोगी विधि है। यह विधि किसी भी वस्तु की रचना व कार्यप्रणाली का वास्तविक रूप में ज्ञान करती है। किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु आदि को दृश्यरूप में विद्यार्थी के समक्ष प्रदर्शित कर उसे स्पष्ट करना ही इस विधि का ध्येय होता है। व्याख्यान-प्रदर्शन विधि के गुण
यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित शिक्षण विधि है।
यह समय व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है।
इस विधि सफलता यह है कि कोई वस्तु सुनने की अपेक्षा देखने से ज्यादा समय तक याद रहती है।
इस विधि में विद्यार्थी वैज्ञानिक विधि व वैज्ञानिक सत्यता की ओर प्रेरित होता है। व्याख्यान-प्रदर्शन विधि के दोष
इस विधि में ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की अवहेलना की जाती है।
इसमें विद्यार्थी केवल रुचिकर प्रदर्शन में ही सक्रिय रहता है।
इसमें शिक्षक ही सभी कार्य करते है, अतः यह शिक्षक केन्द्रित विधि है।
इसमें व्यक्तिगत भिन्नता के सिद्धान्त की अवहेलना की जाती है एवं सभी स्तर के विद्यार्थी एक ही गति से विकास करते है।
प्रदर्शन पूर्व तैयारी न होने से या फिर उपकरण खराब होने से शिक्षण कार्य रुक जाता है।
शिक्षक द्वारा कठिन भाषा का प्रयोग किए जान, इस विधि को कमजोर बना देता है।
इस विधि में प्रमुख तथ्यों के स्थान पर आंशिक तथ्यों पर अधिक बल दिया जाता है।
व्याख्यान विधि
व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है।
यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है।
थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।” व्याख्यान विधि के गुण
यह विषय-वस्तु की क्रमबद्धता की उत्तम विधि है।
यह प्रभावशाली व आकर्षक, प्रेरणात्मक शिक्षण विधि है।
यह उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी है।
यह समय, परिश्रम व धन की दृष्टि से कम खर्चीली है।
इसके द्वारा एक समय में विद्यार्थीयों के बड़े समूह का शिक्षण सम्भव है।
यह विद्यार्थीयों को सुनने व ध्यान लगाने में प्रशिक्षित करती है।
यह विद्यार्थीयों में तर्कशक्ति का विकास करती है। इसमें विषय का तार्किक क्रम बना रहता है। व्याख्यान विधि के दोष
यह छोटी कक्षाओं के लिए अनुपयोगी है।
इसमें विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता बने रहते है तथा यह ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त की पूर्ण अवहेलना करती है।
यह केवल स्मृति केन्द्रित विधि है।
इसमें विद्यार्थी अधिक समय तक ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते, जिससे उनमें शिक्षण के प्रति रुचि कम हो जाती है। इसमें सैद्धान्तिक ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है, यह एक प्रभुत्ववादी विधि है।
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ
इस विधि में शिक्षक जटिल संप्रत्ययों की व्याख्या करते है तथा शिक्षार्थी उन्हें समझने का प्रयास करते है। इस विधि में अध्यापन के दौरान कक्षा का वातावरण पूर्णतः औपचारिक और कठोर होता है। शिक्षक केन्द्रित विधि को अनुदेशात्मक विधि भी कहा जाता है।
शिक्षक केन्द्रित विधियाँ छः प्रकार की होती है, जो निम्न प्रकार है-
1- व्याख्यान विधि
2- व्याख्यान प्रदर्शन विधि
3- समूह शिक्षण विधि
4- टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
5- समीक्षा नीति सम्बन्धी विधि
6- प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि व्याख्यान विधि
व्याख्यान विधि से आशय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाए जाने वाले नियोजित कार्य योजना से है। यह विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है, यह एक प्रकार से मौखिक शिक्षा का ही रूप है। थॉमस एम रिस्क के अनुसार, “व्याख्यान, तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का प्रतिपादन है, जिनको शिक्षक अपने सुनने वालों को समझना चाहता है।” व्याख्यान प्रदर्शन विधि
भारतीय शिक्षा के अनुरूप यह सर्वाधिक उपयुक्त, व्यवहारिक एवं उपयोगी विधि है। यह विधि किसी भी वस्तु की रचना व कार्यप्रणाली का वास्तविक रूप में ज्ञान करती है। किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु आदि को दृश्यरूप में विद्यार्थी के समक्ष प्रदर्शित कर उसे स्पष्ट करना ही इस विधि का ध्येय होता है। समूह शिक्षण विधि
समूह शिक्षण विधि बड़े स्तर पर अध्यापन का एक कार्य है, जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक मिलकर कार्य योजना का निर्माण एवं उसका क्रियान्वयन करते है। पैनल चर्चा, विचार गोष्ठी आदि शिक्षण सम्बन्धी क्रियाएं इसी समूह शिक्षण के अन्तर्गत आती है। टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि
टेलीविजन या वीडियो प्रस्तुति विधि एक अच्छे स्तर की शिक्षण विधि है, जिसके द्वारा शिक्षण गतिविधि को अच्छे तरीके से शिक्षार्थी तक संप्रेषित किया जा सकता है। समीक्षा नीति सम्बन्धी विधि
शिक्षण सम्बन्धी शिक्षक केन्द्रित सभी विधियों का पुनरावलोकन करने ही समीक्षा नीति कहलाता है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य कक्षा में चल रहे अध्ययन-अध्यापन की प्रगति का लेखा-जोखा लेना होता है, जिससे शिक्षण विधि की कमियों को जानकार उसका उपचार किया जा सके। प्रश्नोत्तर शिक्षण नीति विधि
इस विधि को सुकरती विधि भी कहा जाता है। यह विधि मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित होती है।
इस विधि के मूलतः तीन सोपान होते है-